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बंदूक के साये में लोकतंत्र का तमाशा: टूटता म्यांमार, जुंटा की साजिश और चीन का बढ़ता शिकंजा

के.एस. तोमर Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Tue, 23 Dec 2025 06:13 AM IST
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सार
28 दिसंबर को म्यामांर में होने वाला चुनाव लोकतांत्रिक बदलाव कम और सैन्य शासन को वैधता दिलाने की सोची-समझी कोशिश ज्यादा है, जिससे अस्थिरता बढ़ने और भारत, चीन व पूरे क्षेत्र के लिए रणनीतिक समीकरण बदलने की आशंका है।
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spectacle of democracy under shadow of gun Myanmar crumbling junta s machinations and China s growing grip
म्यामांर में सैन्य जुंटा के शासन को चुनाव के जरिए वैधता दिलाने की कोशिश हो रही है। - फोटो : ANI

विस्तार

आगामी 28 दिसंबर को म्यांमार में होने वाला चुनाव सैन्य जुंटा के इरादों को जाहिर करता है। आंग सान सू की की निर्वाचित सरकार के 2021 में तख्तापलट के बाद जुंटा एक ऐसे चुनाव के जरिये खुद को स्थापित करना चाह रहा है, जिस पर साफ तौर पर हेरफेर की छाप है। जिन इलाकों में लड़ाई चल रही है या जहां विद्रोही ताकतों का नियंत्रण है, उन्हें चुनाव कार्यक्रम से बाहर कर दिया गया है। सात में से एक संसदीय क्षेत्र में तो मतदान होगा ही नहीं। नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी सहित दर्जनों पार्टियों को प्रतिबंधित कर दिया गया है, ताकि कोई


चुनौती ही न रहे। सेना का 'लोकतंत्र बहाली' का वादा उसके गिरते हुए शासन को वैधता देने के राजनीतिक नाटक से अधिक कुछ नहीं है। इस घोषणा ने एक ऐसे देश में उम्मीद के बजाय, लोगों में निराशा ही पैदा की है, जो अब भी संघर्ष से जूझ रहा है।


कड़ी निगरानी में चुनाव प्रचार शुरू हो गया है। सार्वजनिक सभाओं पर पाबंदियां हैं और नए चुनावी कानूनों के तहत मामूली आलोचना भी अपराध बन सकती है। भागीदारी को बढ़ावा देने के बजाय, इस अभियान ने लोगों के शक को और बढ़ा दिया है। म्यांमार के नागरिक यही सवाल पूछ रहे हैं कि जब मतदान पर उसी ताकत का नियंत्रण हो, जिसने देश को इस हालात में पहुंचाया है, तो देश अपनी असली इच्छा कैसे जाहिर कर सकता है?

भारत के लिए यह चुनावी माहौल एक कठिन रणनीतिक समीकरण पेश करता है। वहां की अस्थिरता का सीधा असर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर पड़ रहा है। म्यांमार से हजारों शरणार्थी मिजोरम आ चुके हैं। संघर्ष के कारण भारत की अहम परियोजनाएं-जैसे कलादान
मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट और सितवे बंदरगाह, खतरे में पड़ गई हैं। शुरुआत में नई दिल्ली ने अपने संपर्क गलियारे को बचाने और चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए जुंटा के साथ व्यावहारिक कामकाजी संबंध बनाए। लेकिन जैसे-जैसे विद्रोही ताकतों ने बड़े इलाकों पर कब्जा किया और जुंटा की सत्ता कमजोर हुई, भारत ने जातीय सशस्त्र संगठनों और राष्ट्रीय एकता सरकार के साथ संपर्क बढ़ाया। बचाव की यह रणनीति दुविधा को दिखाती है कि जुंटा का खुले तौर पर समर्थन करने से लोकतांत्रिक ताकतें भारत से दूर हो सकती हैं, जबकि सू की के सहयोगियों का समर्थन करने से जुंटा शासन चीन की गोद में जा सकता है। भारत ने अपनी लोकतांत्रिक छवि की कीमत पर निरंतरता बनाए रखी है।

म्यांमार की उथल-पुथल से सबसे ज्यादा फायदा चीन को हुआ है। बीजिंग एक ओर मिन आंग हलिंग को कूटनीतिक और सैन्य समर्थन देता है, तो दूसरी ओर उत्तर में ताकतवर जातीय सशस्त्र समूहों से भी रिश्ते बनाए हुए है। क्यौकप्यू गहरे समुद्र का बंदरगाह और चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के मुख्य स्तंभ हैं, जिनसे उसे बंगाल की खाड़ी तक सीधी पहुंच मिलती है। जुंटा चीनी हथियारों, कर्ज और कूटनीतिक मदद पर निर्भर है, इसलिए चीन का दबदबा है। जैसे-जैसे विद्रोही सेनानी विभिन्न शहरों पर कब्जा करते जा रहे हैं, चीन का असर बढ़ता जा रहा है, क्योंकि जुंटा और विद्रोही, दोनों उसका समर्थन चाहते हैं। चीन के लिए म्यांमार लोकतंत्र का युद्धक्षेत्र नहीं, बल्कि हिंद महासागर तक पहुंचने का पुल है।

डोनाल्ड ट्रंप के नए कार्यकाल में, वाशिंगटन की पॉलिसी मानवाधिकारों के बजाय अमेरिका-चीन मुकाबले के नजरिये से तय होगी। ट्रंप यह देखना चाहेंगे कि क्या चीन की हिंद महासागर तक पहुंच को सीमित करने के लिए दबाव के तौर पर म्यांमार का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए विद्रोही समूहों को समर्थन देना एक तरीका हो सकता है, लेकिन इससे हालात और ज्यादा तनावपूर्ण होने का खतरा भी है। म्यांमार को नजरअंदाज करने से चीन का दबदबा निर्बाध बढ़ सकता है। ट्रंप की लेन-देन वाली सोच बताती है कि विचारधारा ज्यादा मायने नहीं रखेगी, रणनीतिक अहमियत ही अमेरिका का रुख तय करेगी।

उधर, आसियान, जिससे कभी यह उम्मीद की जा रही थी कि वह म्यांमार को स्थिर करने में अहम भूमिका निभाएगा, की पांच-सूत्री सहमति वाली योजना महज प्रतीकात्मक बनकर रह गई है। 58वीं आसियान विदेश मंत्रियों की बैठक में भी सदस्य देशों ने पुरानी बातें ही दोहराईं। इस निष्क्रियता ने जुंटा को और मजबूत किया तथा लोकतांत्रिक ताकतों का मनोबल गिरा दिया। एनयूजी या जातीय सशस्त्र संगठनों से संवाद करने से मना करके आसियान ने म्यांमार का संकट बढ़ा दिया है, जिससे क्षेत्रीय नेतृत्व पर उसका अपना ही दावा कमजोर हुआ है। आगामी चुनाव इस संस्थागत विफलता को और उजागर करेंगे।

थ्री ब्रदरहुड अलायंस (यानी अराकान आर्मी, म्यांमार नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस आर्मी और ताआंग नेशनल लिबरेशन आर्मी) ने देश के बड़े हिस्सों पर कब्जा कर लिया है, जिसमें अकेले रखाइन के 70 में से लगभग 40 शहर शामिल हैं। भारत और चीन के साथ सीमा व्यापार चौकियां अब विद्रोहियों के कब्जे में हैं, जिससे जुंटा को आर्थिक नुकसान हो रहा है और उसकी वैधता कम हो रही है। सेना और लोकतांत्रिक विपक्ष, दोनों के लिए मुख्य चुनौती एक ही है: दर्जनों सशस्त्र समूहों के साथ बातचीत कैसे की जाए, जिनमें से हर एक की अलग-अलग राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और क्षेत्रीय दावे हैं। भले ही जुंटा गिर जाए, पर एक सुसंगत संघीय लोकतांत्रिक संघ का रास्ता जटिल बना हुआ है। जैसे-जैसे मतदान का दिन पास आ रहा है, म्यांमार अधिक विखंडन की ओर बढ़ रहा है। जुंटा की कमजोर होती सत्ता, चीन की आक्रामक रणनीतिक चाल, ट्रंप की अनिश्चित भागीदारी, आसियान की निष्क्रियता, और जातीय ताकतों का सशक्तीकरण एक खतरनाक राजनीतिक भंवर में बदल रहा है। सीमा पर बढ़ती अस्थिरता न केवल भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती है, बल्कि उसकी कनेक्टिविटी परियोजनाओं को भी जोखिम में डाल रही है।

म्यांमार के लोगों को यह दिखावटी चुनाव न तो शांति की उम्मीद देते हैं, न ही सम्मानजनक जीवन का भरोसा। आखिरकार, यह कृत्रिम जनादेश न तो वैधता बहाल करेगा और न ही गृहयुद्ध खत्म करेगा। इसके बजाय, यह म्यांमार के सैन्य शासन, जातीय स्वायत्तता और विदेशी प्रभाव के क्षेत्रों में टूटने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है। आंग सान सू की के साथ लोकतंत्र चुपचाप एक ऐसे पल का इंतजार कर रहा है, जो अभी क्षितिज पर दिखाई नहीं दिया है।

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