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थ्यूसिडिडीज ट्रैप: ढाई हजार साल पुराने सवाल में फंसे शी और ट्रंप, पहले 16 बार इस जाल में फंस चुकी है दुनिया

Sun, 24 May 2026 07:43 AM IST
Anshuman Tiwari अंशुमान तिवारी
Updated Sun, 24 May 2026 07:43 AM IST
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सार
शी जिनपिंग ने डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपनी हालिया मुलाकात में एक 2,457 साल पुराना सवाल पूछा, जिसे सुनकर दुनिया के हर रक्षा विश्लेषक की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। सवाल कुछ यों था-‘क्या चीन व अमेरिका ‘थ्यूसिडिडीज ट्रैप’ से बच सकते हैं?’ आखिर कौन था यह थ्यूसिडिडीज, जो  करीब ढाई हजार साल पहले एथेंस में बैठकर जिंदगी की सबसे बड़ी जंग लिख रहा था। क्या हम तबाही के मुहाने पर खड़े हैं? दुनिया इस जाल में सोलह बार फंस चुकी है, बारह बार तो खून बहा है। थ्यूसिडिडीज की आवाज समय के चक्र को भेदती हुई हर ओर गूंज रही है। क्या शी सचमुच तैयार हैं और क्या ट्रंप इसे समझ पा रहे हैं?
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Thucydides Trap: Xi Jinping and Donald Trump are trapped in a 2,500-year-old question
शी, ट्रंप और एक पुराना सवाल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

14 मई, 2026। बीजिंग। ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल। दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतों के सरदार आमने-सामने बैठे हैं। शी जिनपिंग ने माइक उठाया और ट्रंप से एक सवाल पूछा, जो 2,457 साल पुराना है, ‘क्या चीन और अमेरिका थ्यूसिडिडीज ट्रैप से बच सकते हैं?’ ट्रंप ने शायद यह नाम पहली बार सुना होगा, पर शी जिनपिंग की इस चेतावनी से दुनिया के हर रक्षा विश्लेषक की रीढ़ में सिरहन दौड़ गई। जिनपिंग सवाल नहीं कर रहे थे, बल्कि चेतावनी दे रहे थे, करीब 2,500 साल पुरानी चेतावनी। शी ने कहा, ‘ताइवान पर कोई ऊंच-नीच महंगा पड़ेगा।’


बाहर ईरान की जंग चल रही है। होर्मुज बंद है। ट्रंप सब देख-सुन रहे थे। खैर... टाइम मशीन के यात्रियो, यह दुनिया इस ट्रैप, यानी थ्यूसिडिडीज के जाल में सोलह बार फंसी है और बारह बार खून बहा है। आइए! सीट पकड़िए, हम एथेंस की तरफ उड़ रहे हैं।


हार्वर्ड के प्रोफेसर ग्राहम एलिसन ने 2012 में एक शब्द गढ़ा था-थ्यूसिडिडीज ट्रैप। यह नाम है एक यूनानी इतिहासकार का, जो 2,400 साल पहले एथेंस में बैठकर जिंदगी की सबसे बड़ी जंग लिख रहा था। एलिसन ने 500 साल का इतिहास खंगाला। सोलह बार ऐसा हुआ कि एक उभरती ताकत ने पहले से बनी हुई ताकत को चुनौती दी। फॉर्मूला सीधा है-जब नई ताकत पुरानी ताकत की कुर्सी हिलाती है, तो पुरानी ताकत को डर लगता है। और डरा हुआ बादशाह सबसे खतरनाक होता है। और ये लीजिए, हम आ पहुंचे हैं एथेंस। साल 431 ईसा पूर्व। सामने एक्रोपोलिस की सफेद चट्टानें चमक रही हैं। भूमध्यसागर का हर बंदरगाह एथेंस की जेब में। मगर 200 किलोमीटर दूर स्पार्टा में बेचैनी है। स्पार्टा पुरानी ताकत है-अनुशासित सैनिक और जमीन की ताकत। एथेंस नई ताकत है-व्यापारी, जहाजी, समुद्र की ताकत। एथेंस की बढ़ती ताकत से स्पार्टा में पैदा हुए डर ने जंग शुरू की। पेलोपोनेशियन वार 27 साल चली। एथेंस तबाह हुआ। स्पार्टा जीता, मगर इतना टूटा कि फिर कभी खड़ा नहीं हो सका। जीतने वाला भी हारा। अब हम सीधे 15वीं सदी में उतरे हैं।

पुर्तगाल ने वह कर दिखाया है, जो कोई यूरोपीय देश नहीं कर सका-अफ्रीका का तट नापा, हिंदुस्तान का मसाला उठाया, ब्राजील की जमीन छुई। छोटा-सा देश-दुनिया का पहला समुद्री साम्राज्य। मगर बगल में स्पेन जग रहा है। कोलंबस 1492 में अमेरिका पहुंचा और खेल बदल गया। दो कैथोलिक पड़ोसी-एक बैठी ताकत और एक उभरती ताकत। जंग की नौबत आई, तो दोनों ने एक तीसरे आदमी को बुलाया-पोप अलेक्जेंडर VI। पोप ने दुनिया का नक्शा उठाया, बीच में एक लकीर खींची और कहा-इधर तुम्हारा, उधर तुम्हारा।

सात जून, 1494। टॉर्डेसिलास, स्पेन। संधि पर दस्तखत हुए। अटलांटिक के बीचोंबीच एक काल्पनिक रेखा। रेखा के पूरब का सब कुछ पुर्तगाल का। पश्चिम का स्पेन का। दो राजाओं की लड़ाई रोकने के लिए खींची गई एक लकीर ने तय कर दिया कि अगले 500 साल तक कौन-सा महाद्वीप कौन-सी जबान बोलेगा, कौन-सा चर्च जाएगा, कौन-सा खाना खाएगा। थ्यूसिडिडीज ट्रैप टल गया, मगर दुनिया बंट गई। वह लकीर आज भी बोलती है।

अब हम 16वीं सदी में हैं। वह देखिए, वियना की दीवारों के बाहर ऑटोमन सेना खड़ी है। सुलेमान द मैग्निफिसेंट। इस्तांबुल से चलकर यूरोप के दरवाजे तक। अब सदियों तक खून बहेगा। इस ट्रैप ने दोनों को निगल लिया। अब सौ साल आगे, टाइम मशीन एम्स्टर्डम के बंदरगाह पर उतर रही है। दुनिया का सबसे अमीर शहर। डच ईस्ट इंडिया कंपनी-इतिहास की पहली मल्टीनेशनल। हिंदुस्तान का मसाला, इंडोनेशिया का लौंग, जापान का चांदी-सब हॉलैंड के गोदामों में। मगर टेम्स नदी के किनारे इंग्लैंड उभर रहा है। ऑलिवर क्रॉमवेल ने नेविगेशन एक्ट बना कर डच जहाजों को ब्रिटिश बंदरगाहों से बाहर कर दिया है। अब तीन एंग्लो-डच जंगें लड़ी गईं। हॉलैंड हारा। लंदन नया एम्स्टर्डम बन गया।

टाइम मशीन अब वाटरलू के मैदान के ऊपर मंडरा रही है। नेपोलियन का घोड़ा कीचड़ में फंसा है। यूरोप का सबसे खतरनाक आदमी अपनी आखिरी जंग लड़ रहा है। फ्रांस उभरती ताकत थी। ब्रिटेन पुरानी ताकत। सौ साल में सात बड़ी जंगें लड़ी गईं। ट्रेफलगर में नेल्सन की जीत। वाटरलू में वेलिंग्टन की। नेपोलियन सेंट हेलेना में मरा। थ्यूसिडिडीज ट्रैप ने फ्रांस को निगल लिया। अब हम सबसे खूनी जंग की तरफ बढ़ रहे हैं। यहां थ्यूसिडिडीज ट्रैप अपने सबसे भयानक चेहरे के साथ सामने आएगा। टाइम मशीन बर्लिन में उतर रही है। 1900 का साल। कैसर विल्हेम द्वितीय। जर्मनी की तरक्की ब्रिटेन को पछाड़ रही है। कैसर ने नौसेना बनानी शुरू की। ब्रिटेन ने ड्रेडनॉट बनाए। फिर 1914 में सर्बिया में एक गोली चली (आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनांड की हत्या) और पूरा यूरोप जल उठा। पहला विश्वयुद्ध। दो करोड़ मरे। जंग खत्म। वर्साय की संधि ने जर्मनी को अपमानित किया। और पैदा हुआ हिटलर। दूसरा विश्वयुद्ध। होलोकॉस्ट। हिरोशिमा। दुनिया का नक्शा बदल गया। एक ट्रैप। दो विश्वयुद्ध। दस करोड़ लाशें।

अगला पड़ाव 1930-1945। टाइम मशीन प्रशांत महासागर के ऊपर मंडरा रही है। सात दिसंबर, 1941। नीचे पर्ल हार्बर। जापान ने 1868 में मेजी रेस्टोरेशन के बाद अपने आपको बदल लिया था। खेती का देश औद्योगिक ताकत बना। मंचूरिया लिया, कोरिया लिया और चीन पर हमला किया। प्रशांत महासागर में अमेरिका से टकराव तय था। अमेरिका ने तेल बैन किया। जापान ने पर्ल हार्बर पर बम गिराए। चार साल बाद हिरोशिमा और नागासाकी। जाल ने दोनों को खाया, मगर जापान को ज्यादा। टाइम मशीन अब बीसवीं सदी में है। जाल बिछा, मगर जंग नहीं हुई। कभी क्यूबा, तो कभी ईस्ट जर्मनी। 1945 से 1991 तक कभी कैनेडी और ख्रुश्चेव आमने-सामने, तो कभी दुनिया परमाणु जंग से 13 दिन दूर रह गई। यह थ्यूसिडिडीज के जाल का चौथा अपवाद है, जहां उभरती ताकत और बैठी ताकत में सीधी जंग नहीं हुई। क्यों? क्योंकि दोनों के पास परमाणु बम थे। म्यूचुअल एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन (एमएडी) ने जाल तोड़ दिया। दोनों जानते थे कि लड़े, तो दोनों मरेंगे। प्रॉक्सी वार हुए। 46 साल का शीतयुद्ध 1991 में खत्म हुआ। सोवियत संघ टूट गया, बिना सीधी जंग के।

टाइम मशीन वापस बीजिंग लौट आई है। शी ने जो सवाल पूछा, वह सिर्फ अकादमिक नहीं था। उन्होंने 2013 से यही शब्द दोहराया है। हर बार कहा-थ्यूसिडिडीज ट्रैप कभी भी सक्रिय हो सकता है। चीन ने हर बार ताइवान का नाम लिया। हर बार चेतावनी दी। ताइवान आज वही है, जो 1914 में सर्बिया था-छोटी जगह, जहां से बड़ी आग लग सकती है। एलिसन के 16 उदाहरणों में 12 बार सीधी जंग हुई। चार बार टकराव नहीं हुआ, जब पुरानी ताकत ने नई को जगह दी या जब दोनों के पास परमाणु बम थे। अमेरिका और चीन के पास परमाणु बम हैं। पर यह संतुलन तभी काम करता है, जब दोनों तरफ समझदार लोग बैठे हों। थ्यूसिडिडीज 2,400 साल पहले एथेंस की गली में बैठकर यही लिख रहा था-डर ने जंग को अटल बनाया। आज उसकी आवाज ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में गूंज रही है। क्या शी सचमुच तैयार हैं और क्या ट्रंप इसे समझ पा रहे हैं? फिर मिलते हैं अगले सफर पर...
 
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