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दुनिया भर में धाक जमाने का समय, भारत के लिए रहीं ये उपलब्धियां

शशांक Published by: शशांक पूर्व विदेश सचिव Updated Fri, 01 Jan 2021 02:04 AM IST
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Time to make an impact on world, India had these achievements
नरेंद्र मोदी -अमित शाह - फोटो : पीटीआई

कोरोना के कारण गुजरा साल पूरी दुनिया के लिए संकटपूर्ण रहा। उस लिहाज से हमारे लिए विदेश नीति के मोर्चे पर बीता साल कमोबेश उपलब्धि भरा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय संबंध आगे बढ़ाने की नीति के कारण अमेरिका के साथ हमारे संबंध तेजी से आगे बढ़े। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में क्वाड का नया अवतार सामने आया है। इसे पहले सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता था, अब आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाने लगा है। एशिया-प्रशांत की परिभाषा में केवल पैसिफिक क्षेत्र और हिंद महासागर का थोड़ा-सा हिस्सा ही नहीं, बल्कि पूरा हिंद महासागर क्षेत्र आ गया है। एक उपलब्धि यह भी है कि एशियाई मुल्कों पर चीन के हावी होने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगने लगा है। 


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हालांकि भारत के साथ सीमा विवाद को लेकर चीन गतिरोध बनाए हुए है। उसने लद्दाख में यथास्थिति बदलने की कोशिश की। इससे संबंधों में नई कड़वाहट पैदा हुई, पर पूरी दुनिया ने भारत के रुख को सराहा। उम्मीद करनी चाहिए कि इस मामले में अंततः भारत को ही सफलता मिलेगी। पाकिस्तान की जनता में चीन के प्रति नाराजगी बढ़ रही है। अन्य देशों में भी जिस तरह चीन ने भारी कर्ज देकर उस पर हावी होने की रणनीति अपनाई है, उसके खिलाफ भी आवाजें उठने लगी हैं। भारत के प्रति अन्य देशों का भरोसा बढ़ा है कि यह एक लोकतांत्रिक विकल्प दे सकता है और अन्य लोकतांत्रिक देशों-जैसे जापान या अमेरिका के साथ मिलकर उनके हित में सोच सकता है। इसे भारत की विदेश नीति के लिहाज से उपलब्धि मानी जा सकती है। श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव, अफगानिस्तान के साथ भारत के संबंध कमोबेश ठीक-ठाक ही रहे हैं। हालांकि अफगानिस्तान से अमेरिका अपनी सेना को वापस बुलाना चाहता है, इसलिए वहां उसने पाकिस्तान को ज्यादा तरजीह दी। नेपाल में भी चीन तेजी से अपनी पैठ बनाता जा रहा है। लेकिन जब चीन ने नेपाल के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया, तब फिर नेपाल का मोहभंग हुआ और भारत की तरफ उसका झुकाव बढ़ा है। 

उम्मीद है कि नए वर्ष में नेपाल में एक ऐसी सरकार का गठन होगा, जो भारत के साथ बेहतर संबंध बनाने की हिमायती होगी। यह भी उम्मीद है कि अमेरिका में जब नई सरकार सत्ता संभालेगी, तो वह फिर से अपनी एशिया नीति पर पुनर्विचार करेगी कि वह क्वाड को कितना आगे बढ़ाएगी, आतंकवाद के मुद्दे पर किस तरह पाकिस्तान पर दबाव बनाए रखेगी। यह भी देखना होगा कि फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (फाटा) अपनी अगली बैठक में पाकिस्तान को काली सूची में डालता है या नहीं। नए वर्ष में भारत के लिए यह अवसर भी और चुनौती भी है कि वह पाकिस्तान पर किस तरीके से दबाव बढ़ाए, कि वह आतंकवाद को बढ़ावा न दे सके।

वर्ष 2020 में भारत ने आसियान देशों के मुक्त व्यापार समझौते (आरसीईपी) में शामिल न होने का फैसला किया, जो मेरी समझ से ठीक फैसला नहीं था। क्योंकि एशिया के बाकी मुल्क भारत को साथ लेकर चलना चाहते थे, ताकि चीन पर अंकुश रखा जा सके। आरसीईपी में भारत के शामिल न होने पर उन देशों को यह खतरा लग रहा है कि अब चीन अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश करेगा। ऐसे में नए साल में भारत के लिए यह चुनौती रहेगी कि एशिया के बाकी देशों से वह किस तरह से आपूर्ति शृंखला स्थापित करे, क्योंकि अगर हम भारत को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं, तो एशिया की, अफ्रीका की, जापान की जो कंपनियां चीन से निकलना चाहती हैं, उन्हें अपने यहां आकर्षित करने की चुनौती होगी।

अमेरिका में इस साल नई सरकार आएगी। ऐसे में भारत को अमेरिका के साथ और बेहतर संबंध बनाने के लिए कोशिश करनी होगी, ताकि क्वाड और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका का साथ मिल सके, और चीन की बढ़ती आक्रामकता पर अंकुश लगाया जा सके तथा आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बनाया जा सके। एशिया-अफ्रीका को साथ लेकर अपने आर्थिक एवं सामरिक हितों को आगे बढ़ाने की चुनौती भी नए वर्ष में भारत के समक्ष होगी। चीन जिस तेजी से अपनी परियोजनाएं पूरी करता है, हम वैसा नहीं कर पाते। अगर हम इस दिशा में सुधार करें, तो इसका काफी आर्थिक लाभ हमें मिल सकता है।

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