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मन के मैल धोकर उत्साह से नववर्ष का स्वागत करें

मुरारी बापू Published by: मुरारी बापू Updated Fri, 01 Jan 2021 08:07 AM IST
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Welcome the new year with enthusiasm and washing your mind
हैप्पी न्यू ईयर 2021 - फोटो : iStock

मैंने कथाओं में कई बार कहा है कि पहले रात होती है, फिर सुबह होती है। कई महापुरुषों ने कहा है, मुख भोग का प्रतीक है और तप संयम का प्रतीक है। उपनिषदीय भाषा में कहूं, तो मुख प्रेय है। संसार के रस, राग, स्वाद, भोग उसकी जरूरत हैं। दूसरा है श्रेय। परम कल्याण, परम सत्य, परम प्रेम और परम करुणा का मार्ग। कोई विरला ही प्रेय और श्रेय में संतुलन कर सकता है। एक अर्थ में जिसने भोग को पकड़ा, उसका भगवान छूट गया और जिसने भगवान को पकड़ा, उसका भोग छूट गया। रावण के दस मुख में एक है निंदा मुख। वह निंदा करता है। गौर से सुनिए और हो सके, तो मैं और आप इस मुख से बाज आएं। व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की निंदा करता है। मैं आपको कभी नहीं कहूंगा कि निद्रा छोड़ो। पूरी नींद लो, आराम करो। 


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हां, प्रेम से कहूंगा कि निंदा छोड़ो। रावण का दूसरा मुख है-मुखरता। जिसमें मुखरता बढ़ जाती है, उसमें संवाद की मात्रा कम हो जाती है। हमारे जीवन का अनुभव भी यही कहता है। हमें कभी किसी महापुरुष के पास बैठने का अवसर मिले, तो बस शांत बैठे रहें और सुनें। रावण का तीसरा मुख है जलपन यानी वितंड बोल। मानस में लिखा है, जिसमें जलपना ज्यादा है, उसकी कीर्ति नष्ट हो जाती है। रावण का चौथा मुख है अहं गर्जन। जिस मुख से अपने अहंकार का गर्जन होता है, वह अहं गर्जन मुख है। रावण का पांचवां मुख है प्रलाप, जिसमें निंदा के शब्द होते हैं, क्रोध होता है। उस समय वह जो बोलता है, वह प्रलाप करता है। छठा मुख बहुत सरल असत्य है। रावण झूठ बोलता है।

रावण का सातवां मुख है-दुर्मुख। जब प्रतिशोध की, बदला लेने की वृत्ति होती है, तो उस समय चेहरे पर जो विकृति आती है, उसे दुर्मुख कहते हैं। आठवां है-ग्रास मुख। रावण इतना बड़ा भोगी है कि सबको अपना भोजन बनाना चाहता है। रावण का नौवां मुख है-भीममुख। ऐसा भयानक, भयंकर मुख, कि हाहाकार मच जाए। रावण का दसवां मुख है-वेदमुख। मैं इसे प्रणाम करूंगा, नमन करूंगा। हम चिंतन करें कि हमारे में रावण वाले कितने मुख हैं? हम मानव हैं या दानव? मानव, दानव, देव की परिभाषा उपनिषद में है। पितामह ब्रह्मा ने देव, मानव और दानव की परीक्षा के लिए 'द' अक्षर दिया और कहा, इसका अर्थ लगाओ। दानवों के लिए ब्रह्मा जी का संदेश था- दया करो, हिंसा न करो। देवताओं को जो 'द' दिया, इसके पीछे यही शिक्षा थी, तुम्हारे पास जो भोग हैं, उनका दमन करो। 

थोड़ा संयम में रहो। ब्रह्मा जी ने हम मानवों को जो 'द' दिया था, उसका अर्थ था तुम्हारे पास है, तो दान करो। जितना संभव हो, दूसरों के लिए करें। देश और दुनिया पुनः तन, मन और धन का आरोग्य प्राप्त करे, इसलिए संयम बरतने की आवश्यकता है। यह तपस्या का पर्व है। नया साल हमें संदेश देता है कि हमारे मन में जो भी मैल हों, उन्हें धो डालें और ताजगी और उत्साह के साथ नए साल का स्वागत करें।
 

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