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काम, संपत्ति और कल्याण...2020 को कभी न भूलें

पी चिदंबरम Published by: पी. चिदंबरम Updated Sun, 27 Dec 2020 05:46 AM IST
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सार
  • मैं जॉर्ज सानतयाना के शब्दों को दोहराते हुए आपसे आग्रह करता हूं कि 2020 को कभी न भूलें, ताकि हम 2020 की पुनरावृत्ति न कर सकें। इसके बजाय गर्व करने वाले निडर और स्वतंत्रता प्रेमी भारतीय बनें। मैं कामना करता हूं कि 2021 आपको खुश, स्वस्थ और खुशहाल रखे।
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Work, property and welfare… never forget 2020
Lockdown during covid 19 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सौभाग्य से 2020 समाप्त हो रहा है। हर देश को चोट पहुंची है, कुछ पस्त हो गए हैं। कोविड-19 अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन अब यह कम खतरनाक है और जो टीके वितरित किए जाने हैं, उनसे हममें उम्मीद जगी है। जहां तक भारत की बात है, तो हमारी अर्थव्यवस्था पस्त हो गई और लाखों लोगों (विशेष रूप से प्रवासी और वे लोग जिनकी नौकरियां चली गईं) का जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इसके अलावा, अमित शाह और आदित्यनाथ के विभाजनकारी और ध्रुवीकरण वाले बयानों ने सामाजिक ताने-बाने को तोड़ दिया है। 2020 का सबक यह है कि यदि तीन पैमानों, काम, संपत्ति और कल्याण में गिरावट हो, तो देश को कष्ट भुगतना पड़ेगा। मैं इस साल के अपने आखिरी कॉलम को इस सबक पर केंद्रित करना चाहूंगा।


काम
अंततः यह काम ही है, जो एक व्यक्ति को दूसरे से अलग करता है। ऐसे हजारों लोग हैं, जिन्हें काम करने की जरूरत नहीं है, फिर भी, वे काम करते हैं, क्योंकि इसमें आनंद आता है, इससे सम्मान बढ़ता है, पारितोषिक मिलता है और यह सहयोगियों के बीच तथा व्यापक रूप में समाज में किसी की हैसियत तय करता है। दूसरी ओर लाखों ऐसे लोग हैं जिन्हें काम की जरूरत है, लेकिन उन्हें काम नहीं मिल पाता; ऐसे लोग बेरोजगार हैं। अंतिम गणना (सीएमआईई, 22 दिसंबर, 2020) के मुताबिक भारत में बेरोजगारी दर 8.7 फीसदी थी। इनके बीच में ऐसे लोग हैं, जो कार्यबल में शामिल नहीं होना चाहते और ऐसे लोग भी हैं, जो घर में काम करते हैं और जिनकी गिनती कार्यबल के हिस्से के रूप में नहीं होती। 


भारत जैसे विकासशील देश में बेरोजगारी हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। विकास दर में तेज गिरावट (2018-19 और 2019-20) ने बेरोजगारी बढ़ा दी, महामारी ने इसे और बदतर कर दिया और अनियोजित लॉकडाउन से स्थिति बिगड़ गई। इसके चरम में 13 करोड़ लोग नौकरियों और आजीविका से हाथ धो बैठे। नौकरियां धीमे से लौट रही हैं, लेकिन कुछ रोजगार तो स्थायी तौर पर खत्म हो गए। आंकड़े खुद ही बयान करते हैं (टेबिल देखिए)

संपत्ति
किसी भी देश की संपत्ति को मापने का सबसे आसानी से समझ आने वाला पैमाना है सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)। यदि जीडीपी बढ़ता है, तो संपत्ति में भी वृद्धि होती है और इससे प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से नागरिक का औसत हिस्सा भी बड़ा होगा। मैंने सबसे सरल पैमाना लिया है : स्थिर मूल्यों पर जीडीपी। 2017-18 के बाद से धीमी विकास दरों को देखिए और 2020-21 में संपत्ति के क्षरण पर गौर कीजिए (टेबिल देखिए)। किसी ऐसे विकासशील देश के लिए यह उत्साहजनक नहीं है, जहां लाखों लोग गरीब हैं। क्या यह कोई आश्चर्य है कि लोगों में भविष्य को लेकर निराशा है?

कल्याण
बेरोजगारी और धीमे (या नकारात्मक) विकास का युग्म कल्याण पर प्रभाव डालेगा। मेरी चिंता अकेले आर्थिक कल्याण को लेकर नहीं है। भोजन, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा सचमुच महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कल्याण भौतिकता और मूर्त वस्तुओं और सेवाओं से परे है। खुद से जरा कुछ सवाल कीजिएः क्या लोग सोचते हैं कि वे स्वतंत्र लोग हैं? क्या उनमें भय की भावना बढ़ रही है? क्या लोग डरते हैं कि सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग, एनसीबी और एनआईए जैसी संभवतः स्वतंत्र एजेंसियां उन्हें तंग करेंगी और सताएंगी? क्या लोगों को भरोसा है कि अदालतें सुलभ हैं और वे तेजी से न्याय प्रदान करेंगी? क्या दो युवा लोग दोस्त बन सकते हैं, एक साथ बाहर जा सकते हैं, प्रेम में पड़ सकते हैं और फिर शादी कर सकते हैं? क्या कोई अपनी पसंद से खाना खा सकता है, कपड़े पहन सकता है, बोल सकता है, लिख सकता है और दूसरे लोगों से जुड़ सकता है? 'कल्याण' इन सबका योग है। कुछ संकेतक जहां भारत सापेक्षिक रूप से खड़ा है, वे हैं मानव विकास सूचकांक, स्वतंत्रता सूचकांक और प्रेस की स्वतंत्रता इत्यादि हैं। (टेबिल देखिए)। कुल मिलाकर गिरावट दिखती है।

तीन न भूली जाने वाली छवियां एक लोकतंत्र में, अच्छा हो या बुरा, इसके लिए बाहरी कारक हों या आंतरिक घटनाक्रम, सरकार को जवाबदेही लेनी होती है। सरकार के इरादे शायद अच्छे हो सकते हैं, उसने उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ सलाह भी ली हो या उससे गैरइरादतन गलतियां हो जाएं, लेकिन जिम्मेदारी अंततः सरकार की होती है। अच्छी हों या बुरी, सरकारें बदलनी चाहिए। इसीलिए अनेक देशों में राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल नियत होते हैं। स्थायित्व की भावना पतन की शुरुआत का कारण बनती है। अब जबकि हम साल के अंत की ओर हैं, 2020 की तीन न भूली जाने वाली छवियां हैं :

1. लाखों प्रवासी-थके-हारे, भूखे और बीमार-अपने मामूली सामानों के साथ हाई-वे और रेल लाइनों के सहारे सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर वहां पहुंचना चाहते थे, जिसे वे अपना घर मानते हैं।

2. लंबे और शांतिपूर्ण प्रदर्शन-पहले शाहीन बाग में और अब दिल्ली की सीमाओं पर-जिनकी मांग है कि सरकार उन्हें सुने और न्याय की उनकी अपील पर गौर करे।

3. कश्मीर घाटी में हुआ जबर्दस्त मतदान, जिसने व्यापक रूप में पांच अगस्त, 2019 को सरकार द्वारा किए गए असांविधानिक बदलाव को खारिज कर दिया।

कुल मिलाकर काम, संपत्ति और कल्याण को 2020 में हुए नुकसान ने इसे भूल जाने वाले साल में बदल दिया। लेकिन मैं जॉर्ज सानतयाना के शब्दों को दोहराते हुए आपसे आग्रह करता हूं कि 2020 को कभी न भूलें, ताकि हम 2020 की पुनरावृत्ति न कर सकें। इसके बजाय गर्व करने वाले निडर और स्वतंत्रता प्रेमी भारतीय बनें। मैं कामना करता हूं कि 2021 आपको खुश, स्वस्थ और खुशहाल रखे।

वर्ष के अंत में   कार्यबल (करोड़ में)    बेरोजगारी दर     जीडीपी (स्थिर मूल्य)    एचडीआई रैंक (189 में)    मानव स्वतंत्रता सूचकांक (162में)   विश्व प्रेस स्वतंत्रत सूचकांक(180 में)

2004-05          43.8                        2.3                  2,42,209  करोड़ रु         0                                    0                                         120 

2013-14         47.2                         0                    105,27,673 करोड़ रु     130                                 0                                          140

2017-18        48.4                         4.7                 131,75,160 करोड़ रु      131                                102                                       136

2018-19       48.7                         6.3                   139,81425 करोड़ रु      130                                110                                        138

2019-20       49.4                         8.5                   145,65,951  करोड़ रु    129                                140                                        140

2020-21 (पहली तिमाही) 0             18.9                  26,89556 करोड़ रु         0                                   0                                            0

2020-21 (दूसरी तिमाही) 50           7.3                     33,14,166 करोड़ रु     131                                 142                                        142
 
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[16] => [17] => [18] => भारत जैसे विकासशील देश में बेरोजगारी हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। विकास दर में तेज गिरावट (2018-19 और 2019-20) ने बेरोजगारी बढ़ा दी, महामारी ने इसे और बदतर कर दिया और अनियोजित लॉकडाउन से स्थिति बिगड़ गई। इसके चरम में 13 करोड़ लोग नौकरियों और आजीविका से हाथ धो बैठे। नौकरियां धीमे से लौट रही हैं, लेकिन कुछ रोजगार तो स्थायी तौर पर खत्म हो गए। आंकड़े खुद ही बयान करते हैं (टेबिल देखिए) [19] =>
[20] => [21] => [22] =>
[23] => [24] => [25] => संपत्ति [26] =>
[27] => [28] => [29] => किसी भी देश की संपत्ति को मापने का सबसे आसानी से समझ आने वाला पैमाना है सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)। यदि जीडीपी बढ़ता है, तो संपत्ति में भी वृद्धि होती है और इससे प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से नागरिक का औसत हिस्सा भी बड़ा होगा। मैंने सबसे सरल पैमाना लिया है : स्थिर मूल्यों पर जीडीपी। 2017-18 के बाद से धीमी विकास दरों को देखिए और 2020-21 में संपत्ति के क्षरण पर गौर कीजिए (टेबिल देखिए)। किसी ऐसे विकासशील देश के लिए यह उत्साहजनक नहीं है, जहां लाखों लोग गरीब हैं। क्या यह कोई आश्चर्य है कि लोगों में भविष्य को लेकर निराशा है? [30] =>
[31] => [32] => [33] =>
[34] => [35] => [36] => कल्याण [37] =>
[38] => [39] => [40] => बेरोजगारी और धीमे (या नकारात्मक) विकास का युग्म कल्याण पर प्रभाव डालेगा। मेरी चिंता अकेले आर्थिक कल्याण को लेकर नहीं है। भोजन, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा सचमुच महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कल्याण भौतिकता और मूर्त वस्तुओं और सेवाओं से परे है। खुद से जरा कुछ सवाल कीजिएः क्या लोग सोचते हैं कि वे स्वतंत्र लोग हैं? क्या उनमें भय की भावना बढ़ रही है? क्या लोग डरते हैं कि सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग, एनसीबी और एनआईए जैसी संभवतः स्वतंत्र एजेंसियां उन्हें तंग करेंगी और सताएंगी? क्या लोगों को भरोसा है कि अदालतें सुलभ हैं और वे तेजी से न्याय प्रदान करेंगी? क्या दो युवा लोग दोस्त बन सकते हैं, एक साथ बाहर जा सकते हैं, प्रेम में पड़ सकते हैं और फिर शादी कर सकते हैं? क्या कोई अपनी पसंद से खाना खा सकता है, कपड़े पहन सकता है, बोल सकता है, लिख सकता है और दूसरे लोगों से जुड़ सकता है? 'कल्याण' इन सबका योग है। कुछ संकेतक जहां भारत सापेक्षिक रूप से खड़ा है, वे हैं मानव विकास सूचकांक, स्वतंत्रता सूचकांक और प्रेस की स्वतंत्रता इत्यादि हैं। (टेबिल देखिए)। कुल मिलाकर गिरावट दिखती है। [41] =>
[42] => [43] => [44] =>
[45] => [46] => [47] => तीन न भूली जाने वाली छवियां एक लोकतंत्र में, अच्छा हो या बुरा, इसके लिए बाहरी कारक हों या आंतरिक घटनाक्रम, सरकार को जवाबदेही लेनी होती है। सरकार के इरादे शायद अच्छे हो सकते हैं, उसने उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ सलाह भी ली हो या उससे गैरइरादतन गलतियां हो जाएं, लेकिन जिम्मेदारी अंततः सरकार की होती है। अच्छी हों या बुरी, सरकारें बदलनी चाहिए। इसीलिए अनेक देशों में राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल नियत होते हैं। स्थायित्व की भावना पतन की शुरुआत का कारण बनती है। अब जबकि हम साल के अंत की ओर हैं, 2020 की तीन न भूली जाने वाली छवियां हैं : [48] =>
[49] => [50] => [51] =>
[52] => [53] => [54] => 1. लाखों प्रवासी-थके-हारे, भूखे और बीमार-अपने मामूली सामानों के साथ हाई-वे और रेल लाइनों के सहारे सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर वहां पहुंचना चाहते थे, जिसे वे अपना घर मानते हैं। [55] =>
[56] => [57] => [58] =>
[59] => [60] => [61] => 2. लंबे और शांतिपूर्ण प्रदर्शन-पहले शाहीन बाग में और अब दिल्ली की सीमाओं पर-जिनकी मांग है कि सरकार उन्हें सुने और न्याय की उनकी अपील पर गौर करे। [62] =>
[63] => [64] => [65] =>
[66] => [67] => [68] => 3. कश्मीर घाटी में हुआ जबर्दस्त मतदान, जिसने व्यापक रूप में पांच अगस्त, 2019 को सरकार द्वारा किए गए असांविधानिक बदलाव को खारिज कर दिया। [69] =>
[70] => [71] => [72] =>
[73] => [74] => [75] => कुल मिलाकर काम, संपत्ति और कल्याण को 2020 में हुए नुकसान ने इसे भूल जाने वाले साल में बदल दिया। लेकिन मैं जॉर्ज सानतयाना के शब्दों को दोहराते हुए आपसे आग्रह करता हूं कि 2020 को कभी न भूलें, ताकि हम 2020 की पुनरावृत्ति न कर सकें। इसके बजाय गर्व करने वाले निडर और स्वतंत्रता प्रेमी भारतीय बनें। मैं कामना करता हूं कि 2021 आपको खुश, स्वस्थ और खुशहाल रखे। [76] =>
[77] => [78] => [79] =>
[80] => [81] => [82] => वर्ष के अंत में   कार्यबल (करोड़ में)    बेरोजगारी दर     जीडीपी (स्थिर मूल्य)    एचडीआई रैंक (189 में)    मानव स्वतंत्रता सूचकांक (162में)   विश्व प्रेस स्वतंत्रत सूचकांक(180 में) [83] =>
[84] => [85] => [86] =>
[87] => [88] => [89] => 2004-05          43.8                        2.3                  2,42,209  करोड़ रु         0                                    0                                         120  [90] =>
[91] => [92] => [93] =>
[94] => [95] => [96] => 2013-14         47.2                         0                    105,27,673 करोड़ रु     130                                 0                                          140 [97] =>
[98] => [99] => [100] =>
[101] => [102] => [103] => 2017-18        48.4                         4.7                 131,75,160 करोड़ रु      131                                102                                       136 [104] =>
[105] => [106] => [107] =>
[108] => [109] => [110] => 2018-19       48.7                         6.3                   139,81425 करोड़ रु      130                                110                                        138 [111] =>
[112] => [113] => [114] =>
[115] => [116] => [117] => 2019-20       49.4                         8.5                   145,65,951  करोड़ रु    129                                140                                        140 [118] =>
[119] => [120] => [121] =>
[122] => [123] => [124] => 2020-21 (पहली तिमाही) 0             18.9                  26,89556 करोड़ रु         0                                   0                                            0 [125] =>
[126] => [127] => [128] =>
[129] => [130] => [131] => 2020-21 (दूसरी तिमाही) 50           7.3                     33,14,166 करोड़ रु     131                                 142                                        142 [132] =>
[133] => [134] => [135] =>   ) )