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बीस से कुछ इक्कीस ही बैठेगा यह साल, पढ़ें क्यों ऐसा कह रहे सुधीश पचौरी
सुधीश पचौरी
Published by: सुधीश पचौरी
Updated Fri, 01 Jan 2021 01:59 AM IST
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किसानों का आंदोलन
- फोटो : पीटीआई
इक्कीस, बीस से कुछ इक्कीस ही बैठेगा। सरकार अपनी पर अडे़गी। किसान अपनी पर अड़ेंगे। यह अड़ा-अड़ी बनी रहेगी। भाजपा बंगाल जीत सकती है। असम जीत सकती है। लेकिन चुनाव जीतने और दिलों को जीतने में फर्क है और यह फर्क नजर आने लगा है। शायद इसीलिए एनडीए की छतरी में छेद नजर आने लगे हैं, छोटे सहयोगी दल छतरी से बाहर जाने लगे हैं। टीका आना है। लगाया जाना है। तो भी ‘कोरोना कल्चर’ रहनी है। मास्क रहना है। दूरी रहनी है। क्योंकि कोरोना का खतरा रहना है। 'मास-डिप्रेसन’ रहना है। नव-अस्तित्ववादी चिंताएं रहनी हैं। टीके से खरबों कमाने वाली दवा कंपनियां रहनी हैं। चीन की खलनायकी रहनी है। मोदी को रहना है। मोदी-सरकार को रहना है। लेकिन उसका वह तेज नहीं रहना है। ग्रहण लगने लगा है।
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जितनी ‘केंद्रवादी’ धुन होगी, उतने ही ‘विकेंद्रवादी’ सुर उठेंगे। जितना अधिक ‘राष्ट्रवाद’ होगा, उतना ही अधिक ‘उप-राष्ट्रवाद’ होगा और ‘विविध सांस्कृतिक अस्मिताएं’ उभरेंगी और यह ‘लोकलवाद’ भी नए किस्म का 'ग्लोबलवादी' होगा। इधर दिल्ली के सिंघू बॉर्डर, टीकरी बॉर्डर, गाजीपुर बॉर्डर पर पंजाब के किसानों के धरने चलेंगे, उधर कनाडा से लेकर अमेरिका, इंग्लैंड तक से एनजीओ लोग दो करोड़ की गाड़ी वाले किसानों के लिए बोलेंगे! हर ‘लोकल’ में ‘ग्लोबल’ होगा, हर ‘ग्लोबल’ में ‘लोकल’ होगा। 'लोकल’ ही ‘वोकल’ होगा। ‘यथार्थ’ जितना ‘एक्चुअल’ होगा, उससे अधिक ‘वर्चुअल’ होगा, जितना अधिक ‘वर्चुअल’ होगा, उतना अधिक ‘कंट्रोल से बाहर’ होगा। ‘साक्षात स्टेट’ पर ‘वर्चअुल स्टेट’ भारी पड़ेगी। 'मुख्य मीडिया’ पर ‘सोशल मीडिया’ भारी पड़ेगा।
मार्क्स ने कभी कहा था : ‘हर वह चीज जो ठोस है, भाप बनकर उड़ जाएगी।' यही हो रहा है। कल तक जो ‘मोदी है तो मुमकिन है’ था, अब कभी-कभी नामुमकिन भी होता दिखता है। कुछ पहले शाहीनबाग और अब किसानों के धरने ने सिखा दिया है कि मोदी की सत्ता को चुनौती दी जा सकती है और यदि पूरी तरह उखाड़ा नहीं जा सकता, तो उसे तंग अवश्य किया जा सकता है। इन लक्षणों को देख लगता है कि अब राजनीति रूठने-मनाने की न होकर अधिक हठीली व अहंकारी होगी और हर तरफ से बदलेखोरी वाली होगी। इक्कीस के बरस में ‘4जी’ से आगे ‘5जी’ आना है। 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ आनी हैं। तकनीक जितनी बढ़ेगी, उतना ही, अपनी जड़ों से उजड़ा-उखड़ा आदमी अपने मूल, अपनी अस्मिता, अपनी जाति, अपनी नस्ल, अपने धर्म को खोजने की ओर दौड़ेगा। धर्मांधता बढ़ेगी। धार्मिक फॉल्ट लाइनें एक दूसरे से टकराएंगी। हम सैमुअल हंटिग्टन की द क्लैशेज ऑफ सिविलाइजेशंस देख रहे हैं और देखेंगे।
डिजिटल तकनीक सब कुछ को नई आसानी देगी और जटिलता भी, लेकिन इस ‘डिजिटल तकनीक’ और ‘पिछड़े विचारों’ के बीच कोई कशमकश न होगी। सेक्यूलर-कम्युनल में जंग बढ़ेगी। उदारता और कट्टरता में जंग चलेगी। कट्टरता जीतेगी, क्योंकि डिजिटल तकनीक के वर्चुअल स्पेस में कट्टरता का खूंटा ही भरोसेमंद नजर आता है। नई शतब्दी के तीसरे दशक के पहले बरस में सबसे अधिक तो मोदी जी को सोचना होगा, भाजपा को सोचना होगा, संघ को सोचना होगा और साथ ही इनके रकीबों को भी सोचना होगा कि यथार्थ सिर्फ इन दो के बीच की ‘बाइनरीज’ में नहीं है, बल्कि विश्व पूंजी की ताकत, उपभोक्ता संस्कृति और उसकी बे-ठहर अस्थिरता, तरलता और बहाव में भी है। मोदी जी को सोचना होगा कि आप ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ जैसे जुमलों की कैद में हैं, जबकि आकांक्षी जनता ‘तुरंतावादी'; इंस्टेटिस्ट है, वह इंतजार में यकीन नहीं करती। मोदी जी को सोचना होगा कि सिर्फ इस तर्क के सहारे, कि ‘हमें मेंडेट मिला है, सो कुछ भी कर सकते हैं’ कोई संतुष्ट नहीं होने वाला। खुले संवाद के नए तरीके निकालने होंगे।
अहंकारों से न सत्ता चलती है, न शिकायतें चलती हैं। बीच का रास्ता निकालना ही होता है। ‘उत्तर आधुनिकता’ खुले संवाद की दरकार बढ़ाती है। वर्ष 2021 में, महाभारत वाले क्षण भी कुछ बदलकर दुहरा सकते हैं। आज लड़ने वाले सिर्फ एक युधिष्ठिर और एक दुर्योधन नहीं, हजार दुर्योधन, दुःशासन और शकुनि हैं और अंत में ‘मूसलपर्व’ की संभावना भी है। कहने को तो यह लेखक भी कह सकता है कि कोरोना काल के बाद इकनॉमी में बूम आएगा, उत्पादन बढ़ेगा। जीडीपी बढ़ेगी। पड़ोसियों से दो-दो हाथ होंगे, तो फिर देश एक हो जाएगा। लेकिन ऐसी एकता मजबूरी की एकता होगी। प्रेम का दौर विदा है। घृणा के दौर की आमद है!
हम मानें या न मानें और चाहें या न चाहें, मोदी जी मूलतः और अंततः एक ‘मॉर्डनाइजर’ हैं। वह भारत को पूरी तरह आधुनिक बना देने को आतुर हैं। उनके इस आधुनिकीकरण में हिंदुत्व का ‘कंटेट’ उसी तरह प्रमुख है, जिस तरह रूसी क्रांति में रूसीफिकेशन का कंटेट था। जाने-अनजाने मोदी का या संघ का राष्ट्रवाद स्टालिन के ‘राष्ट्रवाद’ से मिलता-जुलता है, लेकिन एक कसर है-रूस में जो हुआ, वह आधुनिकताद के उत्थान के दौर में संभव हुआ, जबकि मोदी जी इस देश का आधुनिकीकरण ‘उत्तर आधुनिक दौर’ में पूरा कर रहे हैं। यह अपने आप में एक बड़ी अंतर्विरोधी स्थिति है, इसीलिए इतनी हाय हाय है! मोदी जी को सोचना होगा, क्योंकि वह आज के ‘उत्तर आधुनिकतवाद' के ‘हाइपर रीयल’ में फंसे हैं। जाहिर है, इक्कीस का बरस मोदी, भाजपा व संघ के लिए गहरे आत्ममंथन का बरस है।