Dehradun: बशीर बद्र; भारतीय साहित्य के आसमान में एक सितारा खो गया, अतुल शर्मा ने बताया 20 साल पुराना संस्मरण
कवि डॉ. अतुल शर्मा ने 20 साल पुराना संस्मरण साझा किया। उन्होंने बताया कि युवा कवियों शायरों को डॉ. बशीर बद्र साहब ने हमेशा आगे बढ़ाया।
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डॉ. बशीर बद्र का जाना भारतीय साहित्य के आसमान में एक सितारे के खो जाने जैसा है। करीब 20 साल पहले उनके मेरी तारीफ में कहे बोल मेरे लिए किसी आशीर्वाद से कम नहीं थे। यह कहना है उत्तराखंड के प्रसिद्ध कवि डॉ. अतुल शर्मा का।
कवि अतुल शर्मा 20 साल पुराना संस्मरण सुनाते हुए बताते हैं कि संस्कृति विभाग की ओर से एक कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ था। इसमें उन्हें (डॉ. अतुल शर्मा) को भी आमंत्रित किया गया। जब कविता पाठ किया तो साथ-साथ हॉल में मौजूद लोग भी कविता गाने लगे। लोगों के इस उत्साह को देखकर सबसे पहले डॉ. बशीर बद्र ने जो कहा वह मेरे लिए किसी आशीर्वाद से कम नहीं था। उन्होंने कहा था कि 30 साल में पहली बार देख रहा हूं कि किसी कवि का पूरा गीत जनता को याद है।
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लोग उसमें डूबकर साथ-साथ गा रहे हैं। इसके बाद शायद वसीम बरेलवी और कवि अशोक चक्रधर जैसे दिग्गजों से सजे उस मंच पर यह बात हरेक ने दोहराई। मैं उस वक्त और भी अभिभूत हुआ जब तीन साल बाद मसूरी में उन्होंने यही किस्सा दोहराया। कवि अतुल शर्मा कहते हैं कि उन्हें आज भी याद है कि उन्होंने शेर पढ़ा था ...यूंही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो, वो गजल की सच्ची किताब है, उसे चुपके चुपके पढ़ा करो, कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।