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Dehradun News: बंदिशों को तोड़ लोकसंगीत में बनाई पहचान, आज भी जड़ों से जुड़ी हैं रेखा
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उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोक गायिका रेखा धस्माना उनियाल ने उस दौर में गायन की शुरुआत की जब लड़कियों के लिए घर निकलना आसान नहीं था। रिकॉर्डिंग के लिए जाना और देर से घर लौटना भी लोगों की आलोचनाओं का कारण बनता था। कई लोगों ने उन्हें समझाया कि गायन लड़कियों के लिए सही क्षेत्र नहीं है लेकिन उन्होंने इन बातों की परवाह नहीं की और अपने सपनों की राह पर आगे बढ़ती रहीं।
रेखा धस्माना बताती हैं कि उनके परिवार में कला का माहौल था, परिवार में सब कलाकार थे। उनकी मां भी गीत गाती थीं और परिवार के अन्य सदस्य भी कला से जुड़े थे। दिल्ली में पली-बढ़ीं रेखा अपनी जड़ों और संस्कृति से हमेशा जुड़ी रहीं। उन्होंने अपनी मातृभाषा अपने माता-पिता से सीखी और आज अपने बच्चों को भी अपनी बोली और परंपराओं से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। उनका कहना है कि माता-पिता को बच्चों को उनकी भाषा, संस्कृति और जड़ों से जोड़कर रखना चाहिए क्योंकि आज की पीढ़ी तेजी से अपनी बोली और परंपराओं से दूर होती जा रही है।
रेखा धस्माना पारंपरिक मांगल गीतों को भी नई पहचान देने का काम कर रही हैं। उनका मानना है कि लोक कलाकार के लिए अपनी बोली पर मजबूत पकड़ होना बेहद जरूरी है। वह कहती हैं कि पहले के लोकगीतों में भावनाएं, संवेदनाएं और जीवन की सच्चाई झलकती थी लेकिन आज के गीतों में काफी बदलाव आ गया है। पुराने लोकगीत ज्यादा कर्णप्रिय और दिल से जुड़े होते हैं।
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उन्होंने बताया कि जब उन्होंने गायन शुरू किया था तब महिला लोक गायिकाएं बहुत कम थीं। आज समय बदल चुका है और महिलाओं के लिए पहले जैसी बंदिशें नहीं रह गई हैं। वह चाहती हैं कि नई पीढ़ी अपनी लोक संस्कृति को आगे बढ़ाए। शादी के बाद भी उन्हें पति और ससुराल का पूरा सहयोग मिला। हालांकि, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों के कारण कुछ समय के लिए उन्होंने गायन गतिविधियां कम कर दी थीं लेकिन बच्चों के बड़े होने के बाद उन्होंने फिर से सक्रिय रूप से गायन शुरू कर दिया।
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Iजब राजस्थान से मिला ऑफर
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शुरुआती दौर में रेखा को राजस्थान से भी एक प्रस्ताव मिला था। यह उनके कॅरिअर के लिए बड़ा अवसर भी हो सकता था लेकिन उनकी मां ने उन्हें बाहर जाने की जगह अपनी संस्कृति और लोकसंगीत से जुड़े रहने की सलाह दी। मां की इस सीख को उन्होंने जीवनभर याद रखा और गढ़वाली-कुमाऊनी गीतों को अपनी पहचान बनाया। आज रेखा उत्तराखंड की लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने वाली प्रमुख आवाजों में गिनी जाती हैं।
Iलता मंगेशकर को सुनकर सीखी गायकी
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रेखा बचपन से लता मंगेशकर के गीत सुना करती थीं और उन्हीं को सुन गायकी के गुर सीखती रहीं। उन्होंने सुरों को समझा और अभ्यास के जरिये खुद को निखारा।
रेखा धस्माना बताती हैं कि उनके परिवार में कला का माहौल था, परिवार में सब कलाकार थे। उनकी मां भी गीत गाती थीं और परिवार के अन्य सदस्य भी कला से जुड़े थे। दिल्ली में पली-बढ़ीं रेखा अपनी जड़ों और संस्कृति से हमेशा जुड़ी रहीं। उन्होंने अपनी मातृभाषा अपने माता-पिता से सीखी और आज अपने बच्चों को भी अपनी बोली और परंपराओं से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। उनका कहना है कि माता-पिता को बच्चों को उनकी भाषा, संस्कृति और जड़ों से जोड़कर रखना चाहिए क्योंकि आज की पीढ़ी तेजी से अपनी बोली और परंपराओं से दूर होती जा रही है।
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रेखा धस्माना पारंपरिक मांगल गीतों को भी नई पहचान देने का काम कर रही हैं। उनका मानना है कि लोक कलाकार के लिए अपनी बोली पर मजबूत पकड़ होना बेहद जरूरी है। वह कहती हैं कि पहले के लोकगीतों में भावनाएं, संवेदनाएं और जीवन की सच्चाई झलकती थी लेकिन आज के गीतों में काफी बदलाव आ गया है। पुराने लोकगीत ज्यादा कर्णप्रिय और दिल से जुड़े होते हैं।
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उन्होंने बताया कि जब उन्होंने गायन शुरू किया था तब महिला लोक गायिकाएं बहुत कम थीं। आज समय बदल चुका है और महिलाओं के लिए पहले जैसी बंदिशें नहीं रह गई हैं। वह चाहती हैं कि नई पीढ़ी अपनी लोक संस्कृति को आगे बढ़ाए। शादी के बाद भी उन्हें पति और ससुराल का पूरा सहयोग मिला। हालांकि, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों के कारण कुछ समय के लिए उन्होंने गायन गतिविधियां कम कर दी थीं लेकिन बच्चों के बड़े होने के बाद उन्होंने फिर से सक्रिय रूप से गायन शुरू कर दिया।
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Iजब राजस्थान से मिला ऑफर
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शुरुआती दौर में रेखा को राजस्थान से भी एक प्रस्ताव मिला था। यह उनके कॅरिअर के लिए बड़ा अवसर भी हो सकता था लेकिन उनकी मां ने उन्हें बाहर जाने की जगह अपनी संस्कृति और लोकसंगीत से जुड़े रहने की सलाह दी। मां की इस सीख को उन्होंने जीवनभर याद रखा और गढ़वाली-कुमाऊनी गीतों को अपनी पहचान बनाया। आज रेखा उत्तराखंड की लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने वाली प्रमुख आवाजों में गिनी जाती हैं।
Iलता मंगेशकर को सुनकर सीखी गायकी
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रेखा बचपन से लता मंगेशकर के गीत सुना करती थीं और उन्हीं को सुन गायकी के गुर सीखती रहीं। उन्होंने सुरों को समझा और अभ्यास के जरिये खुद को निखारा।