डाउन सिंड्रोम: पहचान व प्यार के हकदार हैं ये बच्चे, अवसर मिले तो बना लेते हैं अपनी अलग पहचान
डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे भी पहचान व प्यार के हकदार हैं। डाउन सिंड्रोम से प्रभावित बच्चे सामान्य बच्चों की तुलना में थोड़ा धीमे सीखते हैं लेकिन सही मार्गदर्शन और प्रशिक्षण से वह चलना, बोलना और पढ़ना-लिखना सीख जाते हैं।
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डाउन सिंड्रोम: पहचान व प्यार के हकदार हैं ये बच्चे, अवसर मिले तो बना लेते हैं अपनी अलग पहचानडाउन सिंड्रोम कोई अभिशाप नहीं, बल्कि ऐसे बच्चों को थोड़ा ज्यादा समझ, स्वीकार्यता, प्यार व सहारे की जरूरत होती है। परिवार का साथ, समाज का अपनापन और समावेशी शिक्षा ही डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चों को वह पहचान दिला सकती है, जिसके वह पूरी तरह हकदार हैं।
इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के उत्तराखंड सचिव व बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राकेश कुमार बताते हैं कि डाउन सिंड्रोम से प्रभावित बच्चे सामान्य बच्चों की तुलना में थोड़ा धीमे सीखते हैं लेकिन सही मार्गदर्शन और प्रशिक्षण से वह चलना, बोलना और पढ़ना-लिखना सीख जाते हैं। उनका स्वभाव प्रायः बेहद स्नेही और मिलनसार होता है, जिससे वे परिवार और समाज में आसानी से घुल मिल जाते हैं।
डॉ. राकेश ने बताया कि ऐसे बच्चों में हृदय रोग, थायरॉयड और सुनने-देखने से जुड़ी समस्याओं का खतरा अधिक रहता है, इसलिए नियमित स्वास्थ्य जांच और देखभाल आवश्यक है। अच्छी बात यह है कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और बेहतर देखभाल के चलते अब इनकी जीवन प्रत्याशा 50–60 वर्ष या उससे अधिक हो गई है। हालांकि इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और ऑक्यूपेशनल थेरेपी जैसे शुरुआती हस्तक्षेप, विशेषकर जीवन के पहले छह वर्षों में, विकास को काफी बेहतर बना सकते हैं । ये बच्चे सीखने योग्य होते हैं और उचित प्रशिक्षण के बाद सरल कार्य, सेवा क्षेत्र या स्व-रोजगार में भी योगदान दे सकते हैं, जिससे वे आंशिक या पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर जीवन जी सकते हैं।
क्या है डाउन सिंड्रोम
डॉ. राकेश बताते हैं कि डाउन सिंड्रोम एक आनुवंशिक स्थिति है, जो सामान्य 46 के बजाय गुणसूत्र 21 की अतिरिक्त प्रति के कारण होती है। यह बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित करता है, जिससे सीखने में देरी, बौद्धिक अक्षमता और विशिष्ट शारीरिक लक्षण (जैसे चपटा चेहरा, तिरछी आंखें) पैदा होते हैं।
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गर्भावस्था के दौरान जांच जरूरी
डॉ. राकेश का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान ही आधुनिक जांच जैसे प्रथम त्रैमासिक स्क्रीनिंग, क्वाड्रपल मार्कर टेस्ट और नॉन-इनवेसिव प्रीनेटल स्क्रीनिंग के माध्यम से इसका समय रहते आकलन किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर एम्नियोसेंटेसिस जैसी जांच से इसकी पुष्टि भी संभव है।