स्तनपान की दर में गिरावट: पहले छह माह तक केवल मां का दूध पाने वाले शिशुओं का प्रतिशत 52.5 से घटकर 40.8 रह गया
स्तनपान की दर में भारी गिरावट आई है। पहले छह माह तक केवल मां का दूध पाने वाले शिशुओं का प्रतिशत 52.5 से घटकर 40.8 रह गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल स्वास्थ्य नहीं, आने वाली पीढ़ी का सवाल है।
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उत्तराखंड में नवजात और शिशुओं के स्वास्थ्य को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-6, 2023-24) के अनुसार राज्य में जीवन के पहले छह माह तक केवल मां का दूध (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग) पाने वाले शिशुओं का प्रतिशत 52.5 प्रतिशत से घटकर 40.8 प्रतिशत रह गया है। वहीं, जन्म के पहले एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराने की दर भी 90.2 प्रतिशत से घटकर 87.4 प्रतिशत हो गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे आने वाले समय के लिए गंभीर चेतावनी मान रहे हैं।
हिमालयन अस्पताल जौलीग्रांट के बाल रोग विशेषज्ञ एवं भारतीय बाल रोग अकादमी (आईएपी) उत्तराखंड शाखा के सचिव डॉ. राकेश कुमार का कहना है कि मां का दूध नवजात शिशु के लिए केवल भोजन नहीं, बल्कि प्रकृति का सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच है। यह शिशु का पहला टीका है, जो संक्रमणों से बचाने, कुपोषण रोकने और उसके शारीरिक एवं मानसिक विकास की मजबूत नींव रखता है।
डॉ. राकेश बताते हैं कि उत्तराखंड में अनन्य स्तनपान की दर में आई गिरावट केवल एक स्वास्थ्य आंकड़ा नहीं, बल्कि समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ा सवाल है। यदि यह स्थिति बनी रही तो शिशुओं में संक्रमण, कुपोषण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
डॉ. राकेश कुमार ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार की आईवाईसीएफ गाइडलाइन के अनुसार जन्म के पहले एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराया जाना चाहिए। इसके बाद पहले छह माह तक शिशु को केवल मां का दूध दिया जाए। छह माह के बाद पूरक आहार शुरू करते हुए दो वर्ष या उससे अधिक समय तक स्तनपान जारी रखना बच्चे के सर्वोत्तम विकास के लिए आवश्यक है। संवाद
स्तनपान की घटती दर के प्रमुख कारण
डाॅ. राकेश कहते हैं कि उत्तराखंड में अनन्य स्तनपान की घटती दर के पीछे कई व्यावहारिक और सामाजिक कारण जिम्मेदार हैं। प्रसव के तुरंत बाद, विशेषकर सिजेरियन डिलीवरी के मामलों में, कई माताओं को समय पर स्तनपान शुरू कराने के लिए आवश्यक सहायता और विशेषज्ञ परामर्श नहीं मिल पाता। अस्पताल से छुट्टी के बाद भी स्तनपान की निगरानी और मार्गदर्शन का अभाव बना रहता है।
इसके अलावा परिवारों में आज भी शहद, घुट्टी या पानी पिलाने जैसी पारंपरिक भ्रांतियां प्रचलित हैं, जिससे नवजात को जन्म के शुरुआती छह महीनों तक केवल मां का दूध देने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक अस्पतालों में प्रभावी लैक्टेशन सपोर्ट, घर-घर जाकर आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा नियमित परामर्श तथा पिता और दादा-दादी सहित पूरे परिवार की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक अनन्य स्तनपान की दर में अपेक्षित सुधार लाना मुश्किल होगा।
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हर परिवार को याद रखने योग्य चार बातें
- जन्म के पहले एक घंटे में स्तनपान अवश्य शुरू करें।
- पहले छह माह तक केवल मां का दूध दें, इस दौरान पानी, शहद, घुट्टी या अन्य कोई आहार न दें।
- छह माह बाद पौष्टिक पूरक आहार शुरू करें और दो वर्ष या उससे अधिक समय तक स्तनपान जारी रखें।
- स्तनपान की सफलता के लिए मां के साथ परिवार का सहयोग और स्वास्थ्यकर्मियों का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है।