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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   12-year-old girl's life transformed without major surgery; no severe epileptic seizures for two years

Delhi: बिना बड़े ऑपरेशन के बदल दी 12 साल की बच्ची की जिंदगी, दो साल से मिर्गी का गंभीर दौरा नहीं

Mon, 10 Aug 2026 07:42 AM IST
Vijay Singh Pundir अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: Vijay Singh Pundir Updated Mon, 10 Aug 2026 07:42 AM IST
सार

एम्स न्यूरोसर्जरी एवं गामा नाइफ विभाग के प्रमुख डॉ. पी. शरत चंद्र बताते हैं कि ऐसे मामलों में आमतौर पर मस्तिष्क की एक बेहद जटिल और दुर्लभ न्यूरोसर्जिकल प्रक्रिया (ओपन हेमिस्फेरोटॉमी) की जाती है, लेकिन जन्मजात हृदय रोग  के कारण बच्ची में यह बेहद जोखिम भरा था।

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12-year-old girl's life transformed without major surgery; no severe epileptic seizures for two years
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : adobestock

विस्तार

केरल के एक दूरदराज गांव की 12 वर्षीय बच्ची ने मिर्गी के लगातार दौरों और अस्पतालों के चक्कर के बीच बीते बचपन को अब पीछे छोड़ दिया है। नौ महीने की उम्र में स्ट्रोक के बाद करीब एक दशक तक गंभीर मिर्गी से जूझने वाली बच्ची एम्स में सर्जरी के बाद अब सामान्य जिंदगी जी रही है। 

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बच्ची को जन्म से ही गंभीर हृदय रोग था। ऐसे में सामान्य तरीके से की जाने वाली बड़ी ब्रेन सर्जरी उसके लिए जानलेवा जोखिम पैदा कर सकती थी। इस चुनौती को देखते हुए एम्स की टीम ने रोबोटिक थर्मोकोएगुलेटिव हेमिस्फेरोटॉमी  तकनीक का सहारा लिया। इसमें खोपड़ी को बड़े स्तर पर खोलने के बजाय छोटे छेदों के जरिए मस्तिष्क के क्षतिग्रस्त हिस्से को बाकी मस्तिष्क से अलग किया जाता है।
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एम्स न्यूरोसर्जरी एवं गामा नाइफ विभाग के प्रमुख डॉ. पी. शरत चंद्र बताते हैं कि ऐसे मामलों में आमतौर पर मस्तिष्क की एक बेहद जटिल और दुर्लभ न्यूरोसर्जिकल प्रक्रिया (ओपन हेमिस्फेरोटॉमी) की जाती है, लेकिन जन्मजात हृदय रोग  के कारण बच्ची में यह बेहद जोखिम भरा था। सर्जरी के दाैरान कार्डियक अरेस्ट : सर्जरी के दौरान बच्ची को कार्डियक अरेस्ट भी हुआ। न्यूरोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, एनेस्थीसिया, क्रिटिकल केयर और कार्डियोलॉजी की संयुक्त टीम ने तत्काल रिससिटेशन कर उसकी स्थिति संभाली। न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. रमेश डोड्डामानी के मुताबिक, इस जटिल मामले में सभी विशेषज्ञ टीमों का समन्वय बेहद अहम रहा।
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केस स्टडी : रोजाना आते थे एक-दो गंभीर दौरे, दवाएं भी बेअसर
स्ट्रोक के कारण बच्ची के मस्तिष्क का दायां हिस्सा स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो गया था। करीब दो वर्ष की उम्र से उसे लगातार मिर्गी के दौरे पड़ने लगे। दौरों को रोकने के लिए कई तरह की एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं के बावजूद रोजाना एक-दो गंभीर दौरे आते रहे। मां ने केरल के कई अस्पतालों में इलाज कराया, लेकिन राहत नहीं मिली। आर्थिक परेशानी के बीच केरल मुख्यमंत्री राहत कोष से मिली मदद के बाद परिवार मार्च 2024 में दिल्ली पहुंचा। एम्स की मिर्गी टीम ने जांच के बाद इसे ड्रग-रेसिस्टेंट एपिलेप्सी माना। न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. मंजरी त्रिपाठी के अनुसार, लगातार दौरों ने बच्ची के सामान्य जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया था और सर्जरी ही प्रभावी विकल्प बचा था।


फिर खोपड़ी खोलने की नौबत आई, तकनीक से बनी बात
सर्जरी के करीब तीन महीने बाद जांच में मस्तिष्क की सतह पर पुराना खून  जमा मिला। दोबारा ओपन ब्रेन सर्जरी बच्ची के कमजोर दिल के लिए जोखिम भरी थी। इसलिए न्यूरोरेडियोलॉजी विभाग के प्रो. अजय गर्ग ने मिडिल मेनिंजियल आर्टरी एम्बोलिजेशन (कैथेटर के जरिए रक्त वाहिका को बंद करना) के जरिए इसका इलाज किया।

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