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90 साल का लोधी गार्डन: इतिहास, विस्थापन और पुनर्निर्माण की एक दिलचस्प कहानी, गांव से विरासत तक का अनोखा सफर
ज्योति सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 10 Apr 2026 07:14 AM IST
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सार
आज यह जगह सुबह की सैर, योग और सुकून के लिए जानी जाती है, लेकिन कभी यहां एक जीवंत गांव बसा करता था। खेत, बस्तियां और उनके बीच खड़े ऐतिहासिक मकबरे, यही इसकी असली पहचान थी।
लोधी गार्डन में योग करते लोग
- फोटो : जी पाल
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विस्तार
राजधानी के प्रतिष्ठित हरित स्थलों में शामिल लोधी गार्डन ने 90 वर्षों का सफर पूरा कर लिया है। आज यह जगह सुबह की सैर, योग और सुकून के लिए जानी जाती है, लेकिन कभी यहां एक जीवंत गांव बसा करता था। खेत, बस्तियां और उनके बीच खड़े ऐतिहासिक मकबरे, यही इसकी असली पहचान थी। यह सिर्फ पार्क नहीं, बल्कि इतिहास, विस्थापन व पुनर्निर्माण की कहानी है।
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मकबरों के बीच बसता था जीवन : 15वीं-16वीं शताब्दी में सैय्यद वंश और लोदी वंश के दौरान यहां कई ऐतिहासिक संरचनाएं बनीं। मुहम्मद शाह का मकबरा और सिकंदर लोदी का मकबरा क्षेत्र की ऐतिहासिक धुरी रहे। समय के साथ इनके आसपास बस्तियां बस गईं और यह इलाका एक जीवंत गांव बन गया, जहां इतिहास और आम जीवन साथ-साथ चलते थे।
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जब गांव से बना पार्क
ब्रिटिश शासनकाल में 1936 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड विलिंगडन की पत्नी लेडी विलिंगडन के प्रयासों से यहां बसे गांवों को हटाकर इसे एक व्यवस्थित उद्यान में बदल दिया गया। उस समय इसका नाम ‘लेडी विलिंगडन पार्क’ रखा गया। यह बदलाव औपनिवेशिक शहरी योजना का हिस्सा था, जिसमें ऐतिहासिक स्थलों को सार्वजनिक स्थानों के रूप में विकसित किया गया।
स्वतंत्रता के बाद इस उद्यान का नाम बदलकर लोधी गार्डन कर दिया गया। वर्ष 1968 में अमेरिकी वास्तुकार जोसेफ स्टीन ने इसका पुनर्विकास किया, जिसमें प्राकृतिक विस्तार, खुले लॉन और ग्लास हाउस जैसी संरचनाएं जोड़ी गईं। इससे यह आधुनिक दिल्ली के प्रमुख सार्वजनिक स्थलों में शामिल हो गया। इस उद्यान के भीतर मौजूद संरचनाएं इसे एक जीवित संग्रहालय बनाती हैं। लोधी गार्डन में मौजूद बड़ा गुम्बद, शीश गुम्बद और अठपुला जैसी संरचनाएं इंडो-इस्लामिक वास्तुकला की झलक प्रस्तुत करती हैं।