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आंदोलन के बीच इंसानियत की ओपीडी: यहां जख्मों पर मरहम लगवा रहे हैं घायल पुलिसकर्मी और आंदोलनकारी; साथ-साथ

Thu, 23 Jul 2026 06:16 AM IST
दुष्यंत शर्मा अभिनव कुमार, नई दिल्ली
अभिनव कुमार, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 23 Jul 2026 06:16 AM IST
सार

यहां न अस्पताल की इमारत है और न ही ओपीडी की लंबी कतार लेकिन स्टेथोस्कोप गले में डाले डॉक्टर पूरी तन्मयता से घायल छात्रों और जख्मी पुलिस कर्मियों के जख्मों पर मरहम लगाते हुए दिखाई दिए।

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amidst the protests: Here, injured police personnel and protesters are getting their wounds dressed
जंतर मंतर पर लगा अस्थायी मेडिकल कैंप। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जनपथ मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर-2 से जंतर-मंतर की ओर बढ़ते ही सड़क किनारे फुटपाथ पर सफेद रंग का एक छोटा-सा मेडिकल कैंप नजर आता है। यहां न अस्पताल की इमारत है और न ही ओपीडी की लंबी कतार लेकिन स्टेथोस्कोप गले में डाले डॉक्टर पूरी तन्मयता से घायल छात्रों और जख्मी पुलिस कर्मियों के जख्मों पर मरहम लगाते हुए दिखाई दिए।

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आंदोलन की तपिश के बीच यह अस्थायी कैंप किसी पक्ष का नहीं, बल्कि इंसानियत का पड़ाव बन गया है। यहां इलाज से पहले न पहचान पूछी जाती है, न विचारधारा। दर्द ही सबसे बड़ी पहचान है और सेवा ही सबसे बड़ा धर्म। यही वजह है कि जंतर-मंतर पर विरोध और तनाव के बीच सड़क किनारे सजी यह छोटी-सी ओपीडी संघर्ष से अधिक संवेदना की कहानी कहती है।
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चारों तरफ गूंजते नारों, तख्तियों और आक्रोश के बीच यह मेडिकल कैंप्स राहत की ठंडी हवा जैसे हैं। यहां धरने में शामिल कोई भी शख्स सिरदर्द की गोली ले सकता है, तो लाठीचार्ज के दौरान आई चोटों का प्राथमिक उपचार करा सकता है। खास बात यह है कि इनमें ज्यादातर सरकारी अस्पतालों के रेजिडेंट और इंटर्न डॉक्टर्स हैं, जो अपनी ड्यूटी के बाद या अलग-अलग शिफ्ट्स में यहां छात्रों का ख्याल रख रहे हैं।
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जोधपुर के एक सरकारी अस्पताल से आए रेजिडेंट डॉक्टर विशाल यादव पिछले मंगलवार से यहीं डटे हैं। उन्होंने बताया, हम लगातार सोशल मीडिया पर छात्रों का आंदोलन देख रहे थे। मेडिकल की पढ़ाई के दौरान हमें सिखाया जाता है कि जहां मरीज को जरूरत हो, डॉक्टर को वहां होना चाहिए। यही बात मुझे यहां खींच लाई। इस दौरान उन्होंने घायल आंदोलनकारी छात्रों के साथ ही उन पुलिसकर्मियों को भी चिकित्सा सहायता दी, जो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दौरान घायल हो गए थे।

डॉ. विशाल कहते हैं कि हम सिर्फ अपना डॉक्टर होने का धर्म निभा रहे हैं। माहौल केवल शारीरिक चोटों तक सीमित नहीं है, मानसिक आघात उससे कहीं ज्यादा गहरा है। सफदरजंग अस्पताल के एक इंटर्न डॉक्टर विकास कुमार बताते हैं कि उनकी अपनी बहन ने नीट के लिए तीन साल का ड्रॉप लिया।

अच्छे अंकों की उम्मीद थी लेकिन पेपर लीक की खबर ने उसे भीतर तक तोड़ दिया। करीब बीस दिनों तक वो परेशान रहीं। वह कहते हैं, यह कहानी अकेले मेरी बहन की नहीं, हजारों छात्र-छात्राओं की है जो पेपर लीक जैसी घटनाओं के बाद भीतर से टूट गए हैं। उनके पास अब आंदोलन के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। 20 जुलाई को जिस बर्बरता के साथ सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश की, उससे इनका लोकतंत्र के प्रति विश्वास और कमजोर हुआ है।


मैं छात्रों का भविष्य तो नहीं संवार सकता, लेकिन इस कैंप के जरिये उनके घावों पर मरहम लगाकर उन्हें ठीक जरूर कर सकता हूं। आईसा और अन्य छात्र संगठनों से जुड़े छात्र नेताओं ने बताया कि आंदोलन की शुरुआत के साथ ही पेशेवर मानसिक चिकित्सकों की तैनाती की गई है जो पेपर लीक के सदमे से उबर नहीं पा रहे उन छात्रों की लगातार काउंसलिंग कर रहे हैं।
 

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