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Delhi NCR News: विश्व ऑटिज्म दिवस - लड़कियों की तुलना में लड़कों में चार गुणा ज्यादा मिल रहे ऑटिज्म के लक्षण
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- जिले में हर 100 में से तीन-चार बच्चे प्रभावित, चिकित्सकों ने दी समय पर इलाज की सलाह
केस-1:
निजी अस्पताल में पहुंचे 12 वर्षीय लोकेश (काल्पनिक नाम) का बौद्धिक विकास न के बराबर हो पाया है। अभिभावकों ने समय पर इलाज शुरू कराया, जिससे कुछ सुधार हुआ है।
केस-2: पांच वर्षीय बच्चे को बुखार होने पर निजी अस्पताल लाया गया। ऑटिज्म के लक्षण मिलने पर इलाज शुरू किया गया। बच्चे के अजीब हरकत से अभिभावक परेशान थे।
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नितेश कुमार
ग्रेटर नोएडा। अगर आपका बच्चा दूसरे बच्चों से घुलने-मिलने से बचता है, चुपचाप अकेले रहना पसंद करता है, खेलकूद में हिस्सा नहीं लेता है या फिर सही से बोल नहीं पा रहा तो इसे नजरअंदाज न करें। ये ऑटिज्म के लक्षण हो सकते हैं। इसका स्थायी इलाज नहीं है, मगर नियंत्रित जरूर रखा जा सकता है। लड़कियों के मुकाबले लड़के ऑटिज्म से ज्यादा ग्रसित हैं। लड़कियों का मानसिक विकास तेजी से होने के कारण उनमें कम परेशानी होती है।
चिकित्सकों के अनुसार, इस बीमारी से 4:1 के अनुपात में लड़कें व लड़कियां प्रभावित हैं। यह पांच तरीके से होती है। इनमें एस्परगर सिंड्रोम, रेट सिंड्रोम, बाल विघटनकारी विकार, कनेर सिंड्रोम और पीडीडी-एनओएस शामिल हैं। इस समय जिले में 100 में तीन से चार बच्चों में ऑटिज्म की समस्या मिल रही है। इसके अधिकतर लक्षण डेढ़ साल की उम्र में ही दिखाई देने लगते हैं। वहीं, 10 से 15 फीसदी बच्चों में यह लक्षण 12 वर्ष से अधिक की आयु में दिखाई देते हैं।
जानकारी के अभाव में बढ़ जाती है समस्या
जिम्स के बाल रोग विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. संजू यादव ने बताया कि अस्पताल में आने वाले मरीजों में पांच से 12 वर्ष तक के बच्चे अधिक होते हैं, जबकि ढाई से पांच साल तक के मरीज 10 फीसदी होते हैं। उन्होंने बताया कि जानकारी के अभाव से अभिभावक बिमारी को नजरअंदाज करते रहते हैं, जिससे समय के साथ समस्या और बढ़ जाती है और बिमारी पूरे जीवन के लिए मुसीबत बन जाती हैं। शुरू में ही इलाज कराने से बच्चे बीमारी से निजात पा जाते हैं।
उम्रदराज माता-पिता के बच्चों में यह समस्या अधिक
ग्रेनो वेस्ट के एक अस्पताल के चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर की कंसल्टेंट व इंचार्ज डॉ. स्वाति छाबड़ा ने बताया कि लड़कों में लड़कियों के मुकाबले इसका अनुपात 4:1 है। उन्होंने बताया कि यह बीमारी गर्भावस्था में वायरल इंफेक्शन, प्रदूषण, समय से पहले जन्म, कम वजन वाले और उम्रदराज माता-पिता के बच्चों में अधिक देखी जाती है।
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केस-1:
निजी अस्पताल में पहुंचे 12 वर्षीय लोकेश (काल्पनिक नाम) का बौद्धिक विकास न के बराबर हो पाया है। अभिभावकों ने समय पर इलाज शुरू कराया, जिससे कुछ सुधार हुआ है।
केस-2: पांच वर्षीय बच्चे को बुखार होने पर निजी अस्पताल लाया गया। ऑटिज्म के लक्षण मिलने पर इलाज शुरू किया गया। बच्चे के अजीब हरकत से अभिभावक परेशान थे।
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नितेश कुमार
ग्रेटर नोएडा। अगर आपका बच्चा दूसरे बच्चों से घुलने-मिलने से बचता है, चुपचाप अकेले रहना पसंद करता है, खेलकूद में हिस्सा नहीं लेता है या फिर सही से बोल नहीं पा रहा तो इसे नजरअंदाज न करें। ये ऑटिज्म के लक्षण हो सकते हैं। इसका स्थायी इलाज नहीं है, मगर नियंत्रित जरूर रखा जा सकता है। लड़कियों के मुकाबले लड़के ऑटिज्म से ज्यादा ग्रसित हैं। लड़कियों का मानसिक विकास तेजी से होने के कारण उनमें कम परेशानी होती है।
चिकित्सकों के अनुसार, इस बीमारी से 4:1 के अनुपात में लड़कें व लड़कियां प्रभावित हैं। यह पांच तरीके से होती है। इनमें एस्परगर सिंड्रोम, रेट सिंड्रोम, बाल विघटनकारी विकार, कनेर सिंड्रोम और पीडीडी-एनओएस शामिल हैं। इस समय जिले में 100 में तीन से चार बच्चों में ऑटिज्म की समस्या मिल रही है। इसके अधिकतर लक्षण डेढ़ साल की उम्र में ही दिखाई देने लगते हैं। वहीं, 10 से 15 फीसदी बच्चों में यह लक्षण 12 वर्ष से अधिक की आयु में दिखाई देते हैं।
जानकारी के अभाव में बढ़ जाती है समस्या
जिम्स के बाल रोग विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. संजू यादव ने बताया कि अस्पताल में आने वाले मरीजों में पांच से 12 वर्ष तक के बच्चे अधिक होते हैं, जबकि ढाई से पांच साल तक के मरीज 10 फीसदी होते हैं। उन्होंने बताया कि जानकारी के अभाव से अभिभावक बिमारी को नजरअंदाज करते रहते हैं, जिससे समय के साथ समस्या और बढ़ जाती है और बिमारी पूरे जीवन के लिए मुसीबत बन जाती हैं। शुरू में ही इलाज कराने से बच्चे बीमारी से निजात पा जाते हैं।
उम्रदराज माता-पिता के बच्चों में यह समस्या अधिक
ग्रेनो वेस्ट के एक अस्पताल के चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर की कंसल्टेंट व इंचार्ज डॉ. स्वाति छाबड़ा ने बताया कि लड़कों में लड़कियों के मुकाबले इसका अनुपात 4:1 है। उन्होंने बताया कि यह बीमारी गर्भावस्था में वायरल इंफेक्शन, प्रदूषण, समय से पहले जन्म, कम वजन वाले और उम्रदराज माता-पिता के बच्चों में अधिक देखी जाती है।