डेढ़ दशक, तीन आंदोलन: अन्ना नहीं निर्भया के ज्यादा करीब दिखा सीजेपी का 'संग्राम', व्यवस्था के बदलाव पर फोकस
वर्ष 2011 के अन्ना आंदोलन, 2012 के निर्भया आंदोलन और मौजूदा दौर के कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन ने अपने-अपने तरीके से समाज और सरकार पर गहरे तक असर डाला है।
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पिछले करीब डेढ़ दशक में जंतर मंतर पर खड़े हुए तीन बड़े जन आंदोलनों की गूंज पूरे देश में सुनी गई। वर्ष 2011 के अन्ना आंदोलन, 2012 के निर्भया आंदोलन और मौजूदा दौर के कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन ने अपने-अपने तरीके से समाज और सरकार पर गहरे तक असर डाला है। फिर भी, सांगठनिक तैयारी और जनभागीदारी के लिहाज से कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का आंदोलन दिल्ली की सामूहिक दुष्कर्म की घटना से पैदा हुए जनाक्रोश से निकले निर्भया आंदोलन से ज्यादा नजदीक है। दोनों आंदोलन अचानक हुए और अपने तात्कालिक लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब भी रहे।
राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि परीक्षाओं के पेपर लीक होने से देश का युवा महीनों से नाराज चल रहा था। लेकिन इसको जाहिर करने का उसके पास कोई तरीका नहीं था। नीट परीक्षा का पेपर लीक आंदोलन का ट्रिगर पॉइंट बना। इसने अपने भविष्य को लेकर फिक्रमंद रहने वाले युवाओं को अचानक सड़क पर ला दिया।
शैक्षणिक व्यवस्था से जुड़े इस आंदोलन से सहानुभूति इनके परिवार से भी मिली। कुछ-कुछ उसी तरह से, जैसे मानवता को शर्मसार करने वाली दिल्ली की 2012 की दुष्कर्म की घटना से निकले निर्भया आंदोलन के साथ हर परिवार अपने को कनेक्ट पा रहा है। उस दौरान सबकी फिक्र अपनी बच्चियों की सुरक्षा को लेकर थी। दोनों आंदोलनों में बेशक कोई स्पष्ट सांगठनिक ढांचा नहीं रहा हो, लेकिन जनभागीदारी बड़ी, देशव्यापी रही।
इसके उलट अन्ना आंदोलन पूरी तरह से राजनीतिक था। इसके केंद्र में राजनीति और शासन से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जन लोकपाल कानून बनवाना था। आंदोलन का सांगठनिक ढांचा स्पष्ट था और आंदोलन के चेहरे भी बड़े थे। इसके लिए महीनों से बड़े पैमाने पर तैयारी भी गई थी। कानून बनवाने के लिए सिविल सोसाइटी ने लगातार सरकार के साथ संवाद भी किए। लोगों ने इसमें भी हिस्सा लिया, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव सीजेपी और निर्भया आंदोलन सरीखा नहीं था।
आंदोलन का मुख्य केंद्र शिक्षा व्यवस्था...
आंदोलन का मुख्य केंद्र शिक्षा व्यवस्था रहा, परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग रहा। जुलाई के अंतिम सप्ताह में आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया। पुलिस कार्रवाई, विपक्ष के प्रदर्शन, सरकार के आश्वासन और प्रधानमंत्री के संबोधन के बीच आंदोलन लगातार चर्चा में बना रहा। अंततः 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया।
अच्छा चलता हूं... दुआओं में याद रखना
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद फिल्म जगत की कई जानी मानी हस्तियों ने सोशल मीडिया पर छात्रों को बधाई दी। कलाकारों ने इसे उन छात्रों की जीत बताया, जो लंबे समय से नीट पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने इस्तीफे में लिखा कि पिछले 10 दिन में हुईं घटनाओं से वह काफी परेशान थे और इसी वजह से उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया है।
इस्तीफे की खबर सामने आते ही अभिनेता विजय वर्मा ने धर्मेंद्र प्रधान की एक तस्वीर साझा करते हुए फिल्म ऐ दिल है मुश्किल के लोकप्रिय गीत की पंक्ति लिखी, अच्छा चलता हूं... दुआओं में याद रखना। कॉमेडियन और लेखक वरुण ग्रोवर ने इस प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बधाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि छात्रों की लड़ाई और युवाओं के रचनात्मक अभियान ने आखिरकार सरकार को फैसला लेने पर मजबूर कर दिया। वहीं, अभिनेता वीर दास ने भी छात्रों की सराहना की। उन्होंने लिखा कि छात्रों ने लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण मूल्य को फिर से याद दिलाया है। अभिनेत्री साबा आजाद ने लिखा कि छात्र एकता जिंदाबाद। अभिनेत्री पार्वती तिरुवोथु ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की प्रति साझा करते हुए लिखा कि इस्तीफा दे दिया।
विशेषज्ञों की राय
तीनों आंदोलनों की प्रकृति अलग थी, लेकिन निर्भया और सीजेपी के आंदोलन में भावनात्मक जुड़ाव ज्यादा था। तीनों आंदोलनों ने अपने-अपने तरीके से समाज और राजनीति पर असर डाला है। सीजेपी आंदोलन से वह युवा जुड़ा है, जो स्वप्नदर्शी होने के साथ बेहतर भविष्य की तलाश में रहता है। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और कानूनी सुरक्षा मिलने से शिक्षा व्यवस्था किस तरह बदलेगी, यह देखने वाली बात होगी।
- प्रोफेसर चंद्रचूड़ सिंह, राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
चुनावी तौर पर ज्यादा प्रभावी न रहने वाली शिक्षा व्यवस्था इस आंदोलन से केंद्र में आ गई। जबकि निर्भया आंदोलन लैंगिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था से जुड़ा था। वहीं, अन्ना आंदोलन ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना दिखाया था। तीनों आंदोलनों में तुलनात्मक रूप से निर्भया और सीजेपी का आंदोलन ज्यादा करीब है। जनभागीदारी के लिहाज से दोनों स्वतः स्फूर्त रहे हैं, जबकि इनका सांगठनिक ढांचा स्पष्ट व मजबूत नहीं था।
-प्रोफेसर राजेश झा, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
अन्ना आंदोलन और निर्भया आंदोलन व्यवस्थागत बदलाव को लेकर थे। दोनों आंदोलनों के बाद 2014 में आम लोगों ने वोट के माध्यम से अपनी नाराजगी का इजहार भी किया। जबकि सीजेपी का आंदोलन नकारात्मक एजेंडे के साथ शुरू हुआ। इस आंदोलन के नारों, मंच पर पहुंच रहे बड़े चेहरों, आंदोलन के दौरान की हिंसा जैसी चीजों ने इसके भीतर के अंतर्विरोध को भी उजागर किया है।
-डॉ. अमित सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर, राष्ट्रीय सुरक्षा विशिष्ट अध्ययन केंद्र, जवाहर लाल नेहरू विवि