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अलविदा जंतर-मंतर: घर जाओ, आराम करो, फिर मिलेंगे दोस्तो; फिर जुटने के लिए गले लगकर जुदा हुए 'संघर्ष के साथी'

Sun, 26 Jul 2026 04:09 AM IST
दुष्यंत शर्मा धनंजय मिश्र/ नितिन राजपूत, नई दिल्ली
धनंजय मिश्र/ नितिन राजपूत, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 26 Jul 2026 04:09 AM IST
सार

जैसे ही मंच से घोषणा हुई कि सरकार ने प्रमुख मांगें स्वीकार कर ली हैं और अब सभी साथी अपने-अपने घर लौट जाएं, आंदोलन स्थल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

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Goodbye Jantar Mantar: Go home, rest, and we’ll meet again, friends
जीत का उत्साह - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

करीब एक महीने तक देशभर के युवाओं की आवाज बना जंतर-मंतर शनिवार को भावुक विदाई का गवाह बना। जैसे ही मंच से घोषणा हुई कि सरकार ने प्रमुख मांगें स्वीकार कर ली हैं और अब सभी साथी अपने-अपने घर लौट जाएं, आंदोलन स्थल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। हजारों युवाओं ने एक-दूसरे को गले लगाकर विदा कहा। किसी ने तिरंगा समेटा, किसी ने पोस्टर संभाले तो कई आंदोलन की यादों को कैमरे में कैद करते नजर आए।

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मंच से संदेश दिया गया कि यह विराम है, अंत नहीं। सभी साथियों से कहा गया कि वे अपने-अपने राज्यों में लौटकर परिवार के साथ समय बिताएं, शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को तैयार करें और एक महीने बाद सरकार के साथ होने वाली अगली बातचीत तक सतर्क रहें। वक्ताओं ने दोहराया कि यदि तय समय में सुधार लागू नहीं हुए तो आंदोलन फिर शुरू किया जाएगा। 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान हुए टकराव के बाद राजधानी में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। कई दिनों तक इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदियां रहीं, प्रमुख मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश-निकास बंद रहे और जंतर-मंतर के आसपास सुरक्षा घेरा लगातार सख्त किया गया। इसके बावजूद आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से जारी रहा।
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निवार को सरकार से बातचीत के बाद प्रमुख मांगें स्वीकार होने और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलन को फिलहाल स्थगित करने का फैसला लिया गया। मंच से बार-बार स्पष्ट किया गया कि यह किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की लड़ाई थी। वक्ताओं ने कहा कि आंदोलन का उद्देश्य केवल इस्तीफा नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना है, जिसमें भविष्य में किसी भी छात्र को अपने अधिकारों और निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली के लिए सड़कों पर उतरने की जरूरत न पड़े। 
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आंदोलन से लौटते युवाओं का कहना था कि यह लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात मनवाने की बड़ी जीत है, लेकिन अब सरकार की असली परीक्षा शुरू होती है। उनका मानना है कि केवल मंत्री बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती, बल्कि पारदर्शी, निष्पक्ष और भरोसेमंद परीक्षा प्रणाली ही 
इस आंदोलन की वास्तविक सफलता होगी।

सुधारों पर रहेगी पैनी नजर
मंच से नेताओं ने कहा कि सरकार ने मांगें स्वीकार कर ली हैं, लेकिन अब सबसे अहम सवाल उनके क्रियान्वयन का है। युवाओं से अपील की गई कि वे अपने राज्यों में रहकर भी सरकार के हर कदम पर नजर रखें। यदि तय समय में सुधार लागू नहीं हुए तो आंदोलन दोबारा शुरू किया जाएगा।

इस्तीफा नहीं, व्यवस्था परिवर्तन है लक्ष्य
मध्य प्रदेश के रीवा से आई देविका ने कहा कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा जरूरी था, क्योंकि इससे जवाबदेही का संदेश गया। हालांकि असली सफलता तभी मानी जाएगी, जब पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियों की पुनरावृत्ति पूरी तरह रुके। राहुल ने कहा कि यदि सरकार पहले ही मांगें मान लेती तो 20 जुलाई का टकराव टाला जा सकता था। 


परीक्षा में गड़बड़ी से भरोसा होता है कमजोर
क्लीनिकल साइकोलॉजी की छात्रा विशाखा ने कहा कि 2024 के  नीट पेपर लीक ने लाखों छात्रों की मेहनत पर सवाल खड़े कर दिए।  वर्षों की तैयारी और भारी-भरकम कोचिंग फीस के बाद यदि परीक्षा  की निष्पक्षता पर ही संदेह हो जाए तो छात्रों का आत्मविश्वास टूट जाता  है। दिल्ली के रोहित कुमार ने कहा कि लंबे समय से युवा शिक्षा व्यवस्था की खामियों से परेशान थे और जंतर-मंतर पर उन्होंने अपनी नाराजगी खुलकर जताई। उनके अनुसार इस्तीफे से छात्रों को कुछ राहत जरूर  मिली है, लेकिन भविष्य में भी शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर युवाओं को सजग रहना होगा।

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