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Cyber Crime: बुजुर्ग डॉक्टर दंपती से 14 करोड़ की साइबर ठगी में पुजारी समेत आठ गिरफ्तार, निकला कंबोडिया कनेक्शन
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sun, 25 Jan 2026 02:07 AM IST
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सार
ग्रेटर कैलाश के इस चर्चित मामले में टीम ने वाराणसी के पुजारी समेत आठ लोगों को गिरफ्तार किया है। इन आरोपियों को गुजरात, उत्तर प्रदेश और ओडिशा से गिरफ्तार किया गया है।
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- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस (आईएफएसओ) यूनिट ने बुजुर्ग डॉक्टर दंपती को डिजिटल अरेस्ट कर हुई 14 करोड़ की ठगी मामले को सुलझा लिया है। ग्रेटर कैलाश के इस चर्चित मामले में टीम ने वाराणसी के पुजारी समेत आठ लोगों को गिरफ्तार किया है। इन आरोपियों को गुजरात, उत्तर प्रदेश और ओडिशा से गिरफ्तार किया गया है। आरोपी कंबोडिया और नेपाल से साइबर ठगी का गिरोह चला रहे थे। पुलिस ने इस अभियान के दौरान सात मोबाइल फोन और कई चेकबुक जब्त की हैं।
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आईएफएसओ यूनिट के पुलिस उपायुक्त विनीत कुमार ने बताया कि गिरोह के सदस्य लोगों को प्रवर्तन एजेंसियों का अधिकारी बनकर डराते थे। म्यूल बैंक खातों के जरिये रकम हड़प लेते थे। पुलिस उपायुक्त ने बताया कि गुजरात के वडोदरा निवासी दिव्यांग पटेल (30) और कृतिक शितोले (26), ओडिशा के भुवनेश्वर निवासी महावीर शर्मा उर्फ नील (27), गुजरात निवासी अंकित मिश्रा उर्फ रॉबिन, उत्तर प्रदेश के वाराणसी निवासी अरुण कुमार तिवारी (45) और प्रद्युम्न तिवारी उर्फ एसपी तिवारी (44) तथा लखनऊ निवासी भूपेंद्र कुमार मिश्रा (37) और आदेश कुमार सिंह (36) को गिरफ्तार किया गया है। पटेल और शितोले को 15 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था।
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आरोपियों में सीए भी शामिल
पुलिस अधिकारियों के अनुसार पटेल ने सीए (इंटरमीडिएट) परीक्षा पास की है। वह फ्लोरेस्टा फाउंडेशन नामक एक गैर-सरकारी संगठन का संचालन करता है। शितोले के पास न्यूजीलैंड से सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) में डिप्लोमा है। अरुण तिवारी को 16 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था, वह बीए पास है और वाराणसी में आयकर कार्यालय के बाहर एक निजी डाटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में काम करता है। उसके खाते में घोटाले के पीड़ितों के 2.10 करोड़ रुपये आए थे। पुलिस के मुताबिक, अरुण शिवाज चैरिटेबल फाउंडेशन नामक एक गैर-सरकारी संगठन का भी संचालन करता हैं।
वाराणसी में घाटों पर अनुष्ठान करता है
पुलिस ने बताया कि शर्मा को 19 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था और वह बीकॉम पास है। 20 जनवरी को गिरफ्तार प्रद्युमन तिवारी पुजारी है और वाराणसी में घाटों पर अनुष्ठान कराता है। पुलिस ने बताया कि 21 जनवरी को गिरफ्तार अंकित मिश्रा वाणिज्य में स्नातक है और एसबीआई कैप सिक्योरिटीज में सेल्स एग्जिक्यूटिव के रूप में काम कर चुका है। पुलिस के अनुसार कुमार को भी 21 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था, जिसके पास एमबीए की डिग्री है और वह निजी कंपनी में कार्यरत था। आदेश सिंह छात्रों को ट्यूशन देता था।
क्या है पूरा मामला
पुलिस उपायुक्त ने बताया कि दक्षिण दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में रहने वाली 77 वर्षीय महिला से 14.84 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी की गई। पीड़िता के पास दिसंबर 2025 में एक कॉल आया, जिसमें दावा किया गया कि उसके नाम पर जारी एक सिम कार्ड धनशोधन मामले से जुड़ा है। धोखेबाजों ने सीबीआई और पुलिस के अधिकारियों के रूप में खुद को पेश करते हुए पीड़िता को वीडियो कॉल पर फंसाया, उसे एक जाली गिरफ्तारी वारंट दिखाया और फर्जी अदालती कार्यवाही की। पीड़िता और उनके पति को 24 घंटे वीडियो निगरानी में रखा गया। डर और दबाव दिखाकर रुपये ट्रांसफर कराए। इस तरह उन्होंने सावधि जमा और शेयर निवेश सहित बड़ी धनराशि आरोपियों के दिए खातों में ट्रांसफर कर दी। आठ लेनदेन के माध्यम से कुल 14.84 करोड़ रुपये की राशि ट्रांसफर किए गए।
विशेष टीम का गठन किया गया
विशेष प्रकोष्ठ के आईएफएसओ पुलिस थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की संबंधित धाराओं के तहत एक ऑनलाइन प्राथमिकी दर्ज की गई और एसीपी प्रेमचंद खंडूरी की देखरेख में एसआई राजकिरण व एसआई अतुल यादव आदि की विशेष टीम का गठित की गई। तकनीकी निगरानी और बैंक खातों के विश्लेषण से पुलिस ने धन के लेन-देन का पता लगाया। इसमें कई संदिग्ध खाताधारकों का पता चला और जानकारी मिली कि आरोपियों ने अंतरराष्ट्रीय गिरोह के इशारे पर फर्जी खाते बनवाए और धोखाधड़ी से प्राप्त धन अलग-अलग जगहों पर जमा किया।
बिचौलिए के तौर पर काम कर रहे थे
जांच में पता चला है कि गिरफ्तार किए गए सभी आरोपी कंबोडिया और नेपाल से ऑपरेट होने वाले एक अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट के इशारे पर बिचौलिए के तौर पर काम कर रहे थे। ये फर्जी बैंक अकाउंट हासिल करते थे और उन्हें ऑपरेट करते थे और धोखाधड़ी से मिले पैसों को कई म्यूल अकाउंट्स के जरिये घुमाते थे।
म्यूल खाता : साइबर ठग जिन खातों का इस्तेमाल ठगी के पैसों को घुमाने, छिपाने या निकालने के लिए करते हैं। यह खाता अक्सर ठगों का नहीं, बल्कि किसी तीसरे व्यक्ति के नाम पर होता है।