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दिल्ली: सीने में घुसी आंतें, डॉक्टर मौत के मुंह से वापस लाए मासूम की जिंदगी; दुर्लभ बीमारी से पीड़ित था नवजात

Sun, 25 Oct 2026 08:20 AM IST
Vijay Singh Pundir सिमरन, अमर उजाला, नई दिल्ली
सिमरन, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vijay Singh Pundir Updated Sun, 25 Oct 2026 08:20 AM IST
सार

यह मामला जन्मजात डायफ्रामैटिक हर्निया (सीडीएच) से संबंधित है। इस स्थिति में डायफ्राम में छेद होने से पेट के अंग छाती में चले जाते हैं। इससे फेफड़ों के विकास और सांस लेने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है।

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Doctors saved the life of a newborn suffering from a rare disease
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : FreePik

विस्तार

अटल बिहारी वाजपेयी आयुर्विज्ञान संस्थान (एबीवीआईएमएस) और डॉ. राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल के डॉक्टरों ने जन्मजात डायफ्रामैटिक हर्निया (सीडीएच) से पीड़ित एक नवजात की जान बचाई है। गर्भ में ही इस दुर्लभ बीमारी का पता चला था। जन्म के तीसरे दिन ऑपरेशन के बाद बच्चा पंद्रहवें दिन मां का दूध पीकर घर लौट गया।

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यह मामला जन्मजात डायफ्रामैटिक हर्निया (सीडीएच) से संबंधित है। इस स्थिति में डायफ्राम में छेद होने से पेट के अंग छाती में चले जाते हैं। इससे फेफड़ों के विकास और सांस लेने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है। गर्भावस्था के 22वें सप्ताह में अल्ट्रासाउंड जांच से बीमारी का पता चला था। जांच में बच्चे की आंतें छाती में पाई गईं। इनके दबाव से बायां फेफड़ा सिकुड़ गया था और दिल दाईं ओर खिसक गया था। जन्म के बाद बच्चे का ऑक्सीजन स्तर गिरकर 30 प्रतिशत रह गया। 
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जन्म के तीसरे दिन करनी पड़ी सर्जरी
अस्पताल के एनेस्थीसिया विभाग की डॉ. ज्योति सिंह के अनुसार बच्चे को तुरंत सांस देने की व्यवस्था की। उन्होंने बच्चे के गले में सांस की नली डालकर नियंत्रित वेंटिलेशन दिया। पेट से हवा निकालने के लिए भी नली लगाई गई। एनेस्थीसिया विभाग की निशा काचरू के अनुसार, जन्म के तीसरे दिन बच्चे की सर्जरी की गई। छाती में पहुंची आंतों को पेट में वापस पहुंचाया। 
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पंद्रहवें दिन मां का दूध पीकर घर लौटा
डॉ. अंशुमान घिल्डियाल के अनुसार, इलाज के बाद बच्चे की सांस लेने की क्षमता में सुधार हुआ। वह सामान्य तरीके से दूध पीने लगा। जन्म के पंद्रहवें दिन उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। डॉक्टरों ने बताया कि समय पर बीमारी की पहचान और विशेषज्ञ चिकित्सा नवजात के लिए बेहद जरूरी है। इससे फेफड़ों के विकास पर पड़ने वाले गंभीर असर से बचा जा सकता है।

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