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DU Study: दिल्ली में यमुना के पानी से मछलियों में घुला माइक्रोप्लास्टिक, वैज्ञानिकों ने बताया सबके लिए खतरनाक

Wed, 05 Aug 2026 03:19 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 05 Aug 2026 03:19 AM IST
सार

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के जूलॉजी विभाग की फिश मॉलिक्यूलर बायोलॉजी लैब के एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि दिल्ली से पकड़ी गई यमुना की हर मछली में माइक्रोप्लास्टिक के कण मिले हैं।

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DU Study: Microplastics found in fish from Yamuna water
मानसूनी सीजन में दिल्ली में यमुना/ File - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली में यमुना नदी का बढ़ता प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल नदी की सफाई का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह जलीय जीवों और मानव स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरे के रूप में सामने आया है। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के जूलॉजी विभाग की फिश मॉलिक्यूलर बायोलॉजी लैब के एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि दिल्ली से पकड़ी गई यमुना की हर मछली में माइक्रोप्लास्टिक के कण मिले हैं।

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शोध के दौरान हरियाणा के यमुनानगर और करनाल के साथ दिल्ली के सूरघाट और सोनिया विहार से 12 प्रजातियों की 220 मीठे पानी की मछलियों की जांच की गई। इनमें कुल 1,678 माइक्रोप्लास्टिक कण मिले, यानी औसतन हर मछली में 7.6 प्लास्टिक कण मौजूद थे। अध्ययन में शामिल कोई भी मछली प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त नहीं मिली। शोध के अनुसार, हरियाणा के मुकाबले दिल्ली के हिस्से की यमुना में माइक्रोप्लास्टिक का स्तर कई गुना अधिक है और सोनिया विहार व सूरघाट को अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है।
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सबसे अधिक प्रदूषण सोनिया विहार की तिलापिया मछलियों में दर्ज किया गया। यहां 20 मछलियों से 436 माइक्रोप्लास्टिक कण मिले, यानी प्रति मछली औसतन 21.8 कण। इसके विपरीत करनाल की नीडल फिश सबसे कम प्रभावित रही, जहां 10 मछलियों में केवल 37 कण मिले।
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शरीर के अंदरूनी तंत्र को पार कर खाने योग्य हिस्सों तक में पहुंचा माइक्रोप्लास्टिक
अध्ययन का सबसे चिंताजनक निष्कर्ष यह रहा कि माइक्रोप्लास्टिक केवल मछलियों के पेट तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके मांस तक पहुंच चुका है। वैज्ञानिकों ने पाचन तंत्र में 751 कण (44.75 प्रतिशत), गिल्स में 605 कण (36.05 प्रतिशत) और मांसपेशियों में 322 कण (19.19 प्रतिशत) दर्ज किए। शोधकर्ता अपूर्व अत्री के अनुसार, यह संकेत देता है कि सूक्ष्म प्लास्टिक कण मछलियों के शरीर के अंदरूनी तंत्र को पार कर खाने योग्य हिस्सों तक पहुंच रहे हैं। शोधकर्ता स्नेहा सिवाच के मुताबिक, बिना शोधन का सीवेज, घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक कचरा और खराब ठोस कचरा प्रबंधन दिल्ली में इस प्रदूषण की बड़ी वजह हैं।

कपड़ों के रेशे बने सबसे बड़े प्रदूषक
अध्ययन में मिले माइक्रोप्लास्टिक का लगभग 78 प्रतिशत हिस्सा प्लास्टिक के सूक्ष्म रेशों (माइक्रोफाइबर) का था। शोधकर्ता राम कृष्ण नेगी के अनुसार, ये रेशे सिंथेटिक कपड़ों की धुलाई, वाशिंग मशीन से निकलने वाले पानी, घरेलू सीवेज और कपड़ा उद्योगों के अपशिष्ट के जरिए नदी में पहुंच रहे हैं। इसके अलावा प्लास्टिक की बोतलों, पैकेजिंग सामग्री और पॉलिथीन के टूटने से बने छोटे कण भी बड़ी संख्या में मिले।

जांच में सामने आए 10 तरह के प्लास्टिक
एफटीआईआर स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक से वैज्ञानिकों ने मछलियों के शरीर में 10 प्रकार के प्लास्टिक की पहचान की। इनमें पॉलीप्रोपाइलीन (पीपी), पॉलीइथिलीन (पीई), पॉलीइथिलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) और पॉलीस्टाइरीन (पीएस) प्रमुख हैं। इनका उपयोग प्लास्टिक बैग, पैकेजिंग सामग्री, पानी की बोतलों, सिंथेटिक कपड़ों, थर्माकोल और डिस्पोजेबल उत्पादों के निर्माण में होता है। शोधकर्ताओं ने इस प्रदूषण को पारिस्थितिकी जोखिम की ''कैटेगरी-4'' यानी उच्च जोखिम श्रेणी में रखा है।

रहने का इलाका तय कर रहा खतरे का स्तर
अध्ययन में यह भी सामने आया कि मछली के भोजन से ज्यादा उसका निवास क्षेत्र माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा तय कर रहा है। सतह और मध्य जल में रहने वाली सर्वाहारी मछलियां, जैसे तिलापिया और रोहू, पानी में तैरते प्लास्टिक कणों के अधिक संपर्क में आने के कारण ज्यादा प्रभावित मिलीं। जबकि तलहटी में रहने वाली कुछ मांसाहारी प्रजातियों में अपेक्षाकृत कम माइक्रोप्लास्टिक पाया गया।


यमुना को बचाने के लिए वैज्ञानिकों के सुझाव

  • आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता बढ़ाई जाए
  • प्लास्टिक कचरे के संग्रह और निस्तारण पर सख्ती हो
  • सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रभावी रोक लागू की जाए
  • कपड़ा उद्योगों के अपशिष्ट की नियमित निगरानी हो

पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए चिंता का विषय
नदी और मछलियों की समय-समय पर वैज्ञानिक जांच कराई जाए।मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक मिलना पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य, दोनों के लिए चिंता का विषय है। ये छोटे प्लास्टिक कण मछली के शरीर में जमा हो सकते हैं और उनके साथ कई हानिकारक रसायन भी शरीर में पहुंच सकते हैं। यदि ऐसी मछलियों का लगातार सेवन किया जाए, तो लंबे समय में इसका असर मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। हालांकि, अभी इस विषय पर शोध जारी है और सभी प्रभाव पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुए हैं। इसलिए सबसे जरूरी है कि नदियों, झीलों और समुद्र में प्लास्टिक कचरा जाने से रोका जाए और जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाया जाए।
-रमेश मीणा, आरएमएल अस्पताल

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