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Faridabad News: पीपीपी मॉडल पर चलेगा सेक्टर-13 का बायोगैस प्लांट
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रोजाना 5 टन गीले कचरे से बनेगी गैस और खाद, निजी हाथों से मिलेगी नई रफ्तार
नंबर गेम - 03 साल की छूट के साथ 10 साल का अनुबंध
अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। शहर में गीले कचरे के निस्तारण को लेकर लंबे समय से बनी समस्या अब समाधान की ओर बढ़ती दिख रही है। नगर निगम ने सेक्टर-13 स्थित बायोगैस प्लांट को दोबारा पूरी क्षमता से चालू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, यह प्लांट अब पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर चलेगा। करीब 5 टन प्रतिदिन क्षमता वाला यह प्लांट अब कचरे को गैस और जैविक खाद में बदलकर शहर की सफाई व्यवस्था को नई दिशा देगा।
इस पहल का मकसद कूड़े के ढेर कम करना, गीले कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण करना और उससे उपयोगी उत्पाद तैयार करना। आने वाले समय में इसका सीधा असर शहर की सफाई, पर्यावरण और लोगों के जीवन पर दिखाई देगा। सेक्टर-13 का बायोगैस प्लांट अब आधुनिक तकनीक के साथ पूरी तरह से अपग्रेड किया जाएगा। प्लांट में मशीनों और तकनीक को इस तरह बेहतर किया जाएगा कि उत्पादन तय मानकों के अनुसार हो सके। इसके लिए पुराने सिस्टम को दुरुस्त कर नई तकनीक जोड़ी जाएगी।
कब तक शुरू होगा काम
प्लांट को चालू करने के लिए 120 दिन की समय सीमा तय की गई है। इस अवधि के भीतर यहां पूरी तरह से संचालन शुरू करना होगा। यदि तय समय पर काम शुरू नहीं हुआ तो सख्त कार्रवाई और जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।
कैसे चलेगा पूरा सिस्टम
प्लांट में आने वाले गीले कचरे का नियमित रिकॉर्ड रखा जाएगा। हर दिन कितना कचरा आया उससे कितनी गैस और खाद बनी इसका पूरा डेटा दर्ज होगा। इसके साथ ही पूरे प्लांट पर सीसीटीवी कैमरों से निगरानी रहेगी जिससे काम में पारदर्शिता बनी रहे। उत्पादित गैस और खाद को बाजार में उपलब्ध कराया जाएगा जिससे इस व्यवस्था को आर्थिक रूप से भी मजबूत बनाया जा सके।
स्वच्छता सर्वेक्षण में भी मिलेगा लाभ
नगर निगम की यह पहल स्वच्छता सर्वेक्षण के लिहाज से भी अहम मानी जा रही है। शहर में कचरे के बेहतर प्रबंधन से रैंकिंग सुधारने में मदद मिलेगी। साथ ही यदि यह मॉडल सफल रहता है तो आगे अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह के प्लांट लगाए जा सकते हैं।
10 सालों तक चलेगी योजना
इस परियोजना को तीन साल की छूट के साथ 10 वर्षों के लिए लागू किया जा रहा है ताकि लंबे समय तक शहर को इसका लाभ मिल सके। शुरुआती तीन वर्षों में व्यवस्था को स्थिर करने पर जोर रहेगा, जिसके बाद उत्पादन के आधार पर निगम को भी राजस्व मिलने लगेगा। कुल मिलाकर सेक्टर-13 का बायोगैस प्लांट फरीदाबाद में कचरा प्रबंधन के तरीके को बदलने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है जहां कूड़ा अब समस्या नहीं बल्कि संसाधन के रूप में इस्तेमाल होगा।
निगरानी के लिए सख्त इंतजाम
प्लांट की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए निगम ने निगरानी के कड़े प्रावधान किए हैं। अनुबंध के 120 दिन के भीतर पूरे प्लांट में आईपी आधारित सीसीटीवी कैमरे लगाने अनिवार्य होंगे, जिनका सीधा एक्सेस निगम अधिकारियों के पास रहेगा। एजेंसी को हर महीने कचरे की आवक, गैस उत्पादन और खाद निर्माण का पूरा रिकॉर्ड निगम को देना होगा।
आम लोगों पर पड़ेगा सीधा असर
इस परियोजना के लागू होने से शहर के लोगों को साफ-सफाई के बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। गीले कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण होने से कूड़े के ढेर और उससे होने वाली बदबू व बीमारियों में कमी आएगी। साथ ही बायोगैस और जैविक खाद के उत्पादन से स्थानीय स्तर पर ऊर्जा और खेती के लिए संसाधन भी उपलब्ध होंगे। नगर निगम की यह पहल स्वच्छता सर्वेक्षण के लिहाज से भी अहम मानी जा रही है। यदि यह मॉडल सफल रहता है तो भविष्य में शहर के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह के प्लांट विकसित किए जा सकते हैं।
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नंबर गेम - 03 साल की छूट के साथ 10 साल का अनुबंध
अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। शहर में गीले कचरे के निस्तारण को लेकर लंबे समय से बनी समस्या अब समाधान की ओर बढ़ती दिख रही है। नगर निगम ने सेक्टर-13 स्थित बायोगैस प्लांट को दोबारा पूरी क्षमता से चालू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, यह प्लांट अब पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर चलेगा। करीब 5 टन प्रतिदिन क्षमता वाला यह प्लांट अब कचरे को गैस और जैविक खाद में बदलकर शहर की सफाई व्यवस्था को नई दिशा देगा।
इस पहल का मकसद कूड़े के ढेर कम करना, गीले कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण करना और उससे उपयोगी उत्पाद तैयार करना। आने वाले समय में इसका सीधा असर शहर की सफाई, पर्यावरण और लोगों के जीवन पर दिखाई देगा। सेक्टर-13 का बायोगैस प्लांट अब आधुनिक तकनीक के साथ पूरी तरह से अपग्रेड किया जाएगा। प्लांट में मशीनों और तकनीक को इस तरह बेहतर किया जाएगा कि उत्पादन तय मानकों के अनुसार हो सके। इसके लिए पुराने सिस्टम को दुरुस्त कर नई तकनीक जोड़ी जाएगी।
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कब तक शुरू होगा काम
प्लांट को चालू करने के लिए 120 दिन की समय सीमा तय की गई है। इस अवधि के भीतर यहां पूरी तरह से संचालन शुरू करना होगा। यदि तय समय पर काम शुरू नहीं हुआ तो सख्त कार्रवाई और जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।
कैसे चलेगा पूरा सिस्टम
प्लांट में आने वाले गीले कचरे का नियमित रिकॉर्ड रखा जाएगा। हर दिन कितना कचरा आया उससे कितनी गैस और खाद बनी इसका पूरा डेटा दर्ज होगा। इसके साथ ही पूरे प्लांट पर सीसीटीवी कैमरों से निगरानी रहेगी जिससे काम में पारदर्शिता बनी रहे। उत्पादित गैस और खाद को बाजार में उपलब्ध कराया जाएगा जिससे इस व्यवस्था को आर्थिक रूप से भी मजबूत बनाया जा सके।
स्वच्छता सर्वेक्षण में भी मिलेगा लाभ
नगर निगम की यह पहल स्वच्छता सर्वेक्षण के लिहाज से भी अहम मानी जा रही है। शहर में कचरे के बेहतर प्रबंधन से रैंकिंग सुधारने में मदद मिलेगी। साथ ही यदि यह मॉडल सफल रहता है तो आगे अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह के प्लांट लगाए जा सकते हैं।
10 सालों तक चलेगी योजना
इस परियोजना को तीन साल की छूट के साथ 10 वर्षों के लिए लागू किया जा रहा है ताकि लंबे समय तक शहर को इसका लाभ मिल सके। शुरुआती तीन वर्षों में व्यवस्था को स्थिर करने पर जोर रहेगा, जिसके बाद उत्पादन के आधार पर निगम को भी राजस्व मिलने लगेगा। कुल मिलाकर सेक्टर-13 का बायोगैस प्लांट फरीदाबाद में कचरा प्रबंधन के तरीके को बदलने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है जहां कूड़ा अब समस्या नहीं बल्कि संसाधन के रूप में इस्तेमाल होगा।
निगरानी के लिए सख्त इंतजाम
प्लांट की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए निगम ने निगरानी के कड़े प्रावधान किए हैं। अनुबंध के 120 दिन के भीतर पूरे प्लांट में आईपी आधारित सीसीटीवी कैमरे लगाने अनिवार्य होंगे, जिनका सीधा एक्सेस निगम अधिकारियों के पास रहेगा। एजेंसी को हर महीने कचरे की आवक, गैस उत्पादन और खाद निर्माण का पूरा रिकॉर्ड निगम को देना होगा।
आम लोगों पर पड़ेगा सीधा असर
इस परियोजना के लागू होने से शहर के लोगों को साफ-सफाई के बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। गीले कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण होने से कूड़े के ढेर और उससे होने वाली बदबू व बीमारियों में कमी आएगी। साथ ही बायोगैस और जैविक खाद के उत्पादन से स्थानीय स्तर पर ऊर्जा और खेती के लिए संसाधन भी उपलब्ध होंगे। नगर निगम की यह पहल स्वच्छता सर्वेक्षण के लिहाज से भी अहम मानी जा रही है। यदि यह मॉडल सफल रहता है तो भविष्य में शहर के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह के प्लांट विकसित किए जा सकते हैं।
