UP: जंग ने फीकी कर दी पिलखुआ के चादर उद्योग की चमक, महंगा हुआ कच्चा माल, कारीगरों का पलायन बढ़ा; देखें रिपोर्ट
पश्चिम एशिया में तनाव के कारण पिलखुआ के चादर उद्योग पर संकट गहरा गया है। रंग, केमिकल और सूत महंगे होने से उत्पादन घटा है। गैस आपूर्ति बाधित होने से कई यूनिट बंद हैं, जिससे कारीगरों का पलायन और निर्यात पर असर बढ़ गया है।
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दुनियाभर में मशहूर गाजियाबाद के पिलखुआ की चादर की रंगत पश्चिम एशिया में चल रही उथल-पुथल के चलते फीकी पड़ रही है। चादर को चमकाने वाले रंग और केमिकल की आपूर्ति बाधित हो गई है। यह 40 फीसदी तक महंगे भी हो गए हैं। सूत के दाम लगभग 25 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गए हैं। चादर बनकर जब तैयार हो जाती है तो उसकी पैकिंग के लिए प्लास्टिक बैग की जरूरत होती है, उसका मिलना भी मुश्किल हो गया है। इस वजह से उद्यमियों को बहुत अधिक परेशानी हो रही है।
चादर उद्योग को पिलखुआ की लाइफ लाइन माना जाता है। इसकी जड़ें उसी तरह घर-घर में फैली हुई हैं, जिस तरह से अलीगढ़ में ताला और मेरठ में कैंची उद्योग की। चादर की बुनाई, रंगाई, छपाई, धुलाई, इस्त्री और पैकिंग करने से लेकर बाहर भेजने तक कई चरणों में काम होता है। इसमें बड़े कारखानों से लेकर घरों तक में हजारों लोगों को काम मिला हुआ है। लगभग 10 हजार करोड़ से अधिक के टर्नओवर वाले इस कारोबार में महिलाओं की भी बड़ी भागीदारी होती है। कुछ हल्के-फुल्के कामों में बच्चे भी हाथ बंटाते हैं, जिससे कई परिवारों की आजीविका चलती है।
पिलखुआ में जींस की रंगाई, थ्रीडी चादरों, बेडशीट और उद्योगों में काम आने वाले कई तरह के बेल्टों का भी निर्माण होता है। इसमें चादर की बुनाई और स्क्रीन प्रिंटिंग कारखानों में होती है। इसके अलावा ब्लॉक प्रिंटिंग, ब्रश प्रिंटिंग घरों और कारखानों दोनों जगह होती है। इसके अलावा चादरों की धुलाई, इस्त्री, गांठों की बंधाई और पैकिंग का काम घरों में किया जाता है। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच युद्ध के चलते पिलखुआ की यह लाइफ लाइन आज खतरे में पड़ गई है।
रंग मिलना बंद, केमिकल और सूत हुए महंगे
पिलखुआ टेक्सटाइल सेंटर व्यापारी एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय खंडेलवाल ने बताया कि चादरों में उपयोग होने वाले रंग मिलना लगभग बंद हो गए हैं। इन रंगों में जो बेस उपयोग होता है, उसका अधिकांश हिस्सा पश्चिम एशिया के देशों से आता है। कुछ हिस्सा चीन से भी आता है। इसके बाद ये रंग राजस्थान के उदयपुर, अहमदाबाद, बड़ौदा में तैयार होते हैं। इसके अलावा केमिकल भी लगभग 40 फीसदी तक महंगे हो गए हैं। पावर लूम एसोसिएशन के अध्यक्ष कुलदीप ने बताया कि सूत प्रति किलो के हिसाब से 25 रुपये तक महंगा हो गया है। कच्चा माल महंगा होने की वजह से उत्पादन में लगभग 20 फीसदी तक की कमी आ गई है। तैयार माल महंगा होने की वजह से बिक्री में भी कमी आ गई है।
पलायन करने लगे कारीगर और कामगार
कच्चा माल न मिलने की वजह से निर्माण का काम काफी धीमा हो गया है। कई कारखाने ठप हो गए हैं। इसके चलते कारीगरों को काम नहीं मिल पा रहा है। कामगार भी काम न मिलने की वजह से पलायन की स्थिति में आ गए हैं। उद्यमियों को डर सता रहा है कि यदि एक बार कारीगर पलायन कर गए तो वे फिर लौटकर नहीं आएंगे। कन्नौज निवासी सुखेंद्र ने बताया कि वह यहां एक कारखाने में तीन साल से काम कर रहे हैं। उनके साथ लगभग 25 लोग और हैं। उन्होंने बताया कि एक तरफ तो काम नहीं मिल पा रहा है, दूसरी तरफ गैस न मिलने से खाना बनाने का संकट खड़ा हो गया है। बिहार, बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई कामगार परेशानी के चलते पहले ही घरों की ओर लौट गए हैं। ब्रश प्रिंटिंग का काम करने वाले सोनू ने बताया कि पिछले 15 दिनों में काम काफी कम हो गया है, आमदनी में भी कमी आई है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चादर की मांग, निर्यात में खड़ी हो रहीं मुश्किलें
पिलखुआ की चादरों और बेडशीट की मांग पूरे पश्चिम एशिया, अफ्रीकी देशों, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, श्रीलंका आदि में बड़े स्तर पर होती है। टेक्सटाइल व्यापारी सेंटर एसोसिएशन के अध्यक्ष का कहना है कि ऐसे देश, जहां बहुतायत में पर्यटक पहुंचते हैं और समुद्री पर्यटन अधिक है, वहां इन चादरों की काफी मांग रहती है। पश्चिम एशिया में युद्ध के चलते निर्यात में बाधा आ रही है। इससे चादर उद्योग को काफी नुकसान पहुंच रहा है।
कोरोना में भी नहीं हुआ था इतना नुकसान
खंडेलवाल हैंडलूम फैक्ट्री के संचालक सार्थक खंडेलवाल ने बताया कि चादर उद्योग का इतना नुकसान तो कोरोना काल में भी नहीं हुआ था। उस दौरान बड़े प्लांट बंद हो गए थे, लेकिन घरों में चादर बनाने का काम चलता रहा था। कोरोना के दौरान जो भी थोड़ा-बहुत नुकसान हुआ था, उसकी भरपाई बहुत तेजी से हो गई थी, लेकिन इस बार अलग तरह का संकट खड़ा हो गया है।
एलपीजी से चलने वाले उद्योग हुए ठप, पीएनजी के लिए आवेदन
पिलखुआ टेक्सटाइल सेंटर में स्थापित ऐसे उद्योग, जो पूरी तरह से एलपीजी पर निर्भर थे, वे ठप हो गए हैं। उन्हें दोबारा से एलपीजी आपूर्ति बहाल होने का इंतजार है। कई उद्यमियों ने पीएनजी के लिए आवेदन किया है। हालांकि पीएनजी कनेक्शन मिलने की प्रक्रिया काफी लंबी होने की वजह से प्लांट दोबारा शुरू होने की उम्मीद काफी कम है। टेक्सटाइल सेंटर में लगभग 80 उद्योग हैं, इनमें से 25 में एलपीजी का उपयोग किया जा रहा था।
भारत टेक्सटाइल मिल्स के संचालक अर्जुन सिंघल ने बताया कि 7 मार्च के बाद से ही उनका प्लांट बंद है। उनके प्लांट में हर रोज लगभग तीन टन एलपीजी की खपत होती थी। पूरे टेक्सटाइल सेंटर में लगभग 20 टन रोज की खपत थी। सेंटर में ऐसी यूनिटें, जो पूरी तरह से एलपीजी पर निर्भर थीं, पूरी तरह से बंद हो गई हैं।
महावीर बेल्टिंग इंडस्ट्री के संचालक निशांत अग्रवाल ने बताया कि उनके यहां मशीनों में उपयोग होने वाले बेल्ट बनाए जाते हैं। ये बेल्ट खाड़ी के देशों के अलावा बांग्लादेश और अन्य पड़ोसी देशों में निर्यात किए जाते हैं। गैस न मिलने से उनका प्लांट भी 7 मार्च से ही बंद पड़ा है। उन्होंने बताया कि उनके प्लांट में कम से कम 50 ऐसे उत्पाद हैं, जिनका उपयोग बेल्ट बनाने में होता है और ये सभी क्रूड ऑयल से ही बनते हैं।
दो साल पहले शुरू किया था एलपीजी का उपयोग, अब पीएनजी की दरकार
भारत टेक्सटाइल मिल्स के संचालक अर्जुन सिंघल ने बताया कि उन्होंने दो साल पहले ही एलपीजी का उपयोग शुरू किया था। इससे पहले कोयला और अन्य ईंधन का उपयोग करते थे। अब आईजीएल से पीएनजी आपूर्ति के लिए आवेदन किया है। उम्मीद है कि जल्दी से जल्दी कनेक्शन मिल जाए। महावीर बेल्टिंग इंडस्ट्री के संचालक ने बताया कि अभी तक हम लोग 450 किलोग्राम के जंबो सिलिंडर मंगाकर एलपीजी का उपयोग कर रहे थे, अब पूरी तरह से पीएनजी पर शिफ्ट होने की तैयारी है।
अभी घरेलू और कॉमर्शियल पर फोकस: अमनदीप सिंह
इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड के कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस के हेड अमनदीप सिंह ने बताया कि पिलखुआ के टेक्सटाइल सेंटर के उद्यमियों की ओर से कई आवेदन आए हैं, लेकिन सरकार की गाइडलाइन के अनुसार अभी घरेलू और कॉमर्शियल पर फोकस किया जा रहा है। इंडस्ट्री को भी जल्द ही आपूर्ति बहाल की जाएगी। अमनदीप सिंह ने बताया कि इंडस्ट्री में नए कनेक्शन देने में अभी थोड़ा समय लग सकता है। चूंकि हमारी प्राथमिकता में सेफ्टी भी है, इसलिए सभी मानक पूरे होने के बाद ही नया कनेक्शन जारी किया जा सकता है, इसलिए देरी होना स्वाभाविक है।