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Gurugram News: मनमानी फीस पर रोक लगाने की मांग
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कोनरवा ने प्रधानमंत्री को लिखा पत्र
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए कोनरवा के पदाधिकारियों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की है। संस्था का आरोप है कि निजी स्कूल फीस के नाम पर अभिभावकों का शोषण कर रहे हैं। मासिक ट्यूशन फीस लागत से कई गुना अधिक है। बच्चों के प्रवेश के नाम पर मनमानी शुल्क वसूला जाता है। वहीं, कुछ निजी स्कूल बच्चों से हर साल एडमिशन शुल्क या वार्षिक शुल्क भी वसूलते हैं।
कोनरवा के अध्यक्ष डॉ. पीएस जैन ने कहा कि देशभर के निजी स्कूलों के लिए अधिकतम मासिक शुल्क निर्धारित किया जाना चाहिए, जो 5000 रुपये प्रति माह से अधिक न हो, ताकि मध्यम एवं निम्न वर्ग के परिवार भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकें। इसके अलावा उन्होंने स्कूलों द्वारा की जाने वाली फीस वृद्धि और अन्य शुल्कों पर निगरानी रखने, पुस्तकों, यूनिफॉर्म और अन्य सामग्री की खरीद में अभिभावकों को स्वतंत्रता देने की भी मांग की।
सीएसआर फंड के उपयोग की पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। यदि निजी स्कूल इन नियमों का पाल करने में असमर्थ या अनिच्छुक हों, तो उनके राष्ट्रीयकरण पर विचार किया जाए, जिससे राज्य सरकारें प्रभावी निरीक्षण एवं नियंत्रण कर सकें और सभी बच्चों को समान एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो सके।
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ग्रेटर नोएडा। निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए कोनरवा के पदाधिकारियों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की है। संस्था का आरोप है कि निजी स्कूल फीस के नाम पर अभिभावकों का शोषण कर रहे हैं। मासिक ट्यूशन फीस लागत से कई गुना अधिक है। बच्चों के प्रवेश के नाम पर मनमानी शुल्क वसूला जाता है। वहीं, कुछ निजी स्कूल बच्चों से हर साल एडमिशन शुल्क या वार्षिक शुल्क भी वसूलते हैं।
कोनरवा के अध्यक्ष डॉ. पीएस जैन ने कहा कि देशभर के निजी स्कूलों के लिए अधिकतम मासिक शुल्क निर्धारित किया जाना चाहिए, जो 5000 रुपये प्रति माह से अधिक न हो, ताकि मध्यम एवं निम्न वर्ग के परिवार भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकें। इसके अलावा उन्होंने स्कूलों द्वारा की जाने वाली फीस वृद्धि और अन्य शुल्कों पर निगरानी रखने, पुस्तकों, यूनिफॉर्म और अन्य सामग्री की खरीद में अभिभावकों को स्वतंत्रता देने की भी मांग की।
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सीएसआर फंड के उपयोग की पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। यदि निजी स्कूल इन नियमों का पाल करने में असमर्थ या अनिच्छुक हों, तो उनके राष्ट्रीयकरण पर विचार किया जाए, जिससे राज्य सरकारें प्रभावी निरीक्षण एवं नियंत्रण कर सकें और सभी बच्चों को समान एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो सके।