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बच्चों की हिरासत विवाद में हेबियस कॉर्पस का इस्तेमाल नहीं कर सकते : हाईकोर्ट
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाल हिरासत (ट्रांसनेशनल चाइल्ड कस्टडी) के मामलों में विस्तृत जांच की आवश्यकता होने पर हेबियस कॉर्पस याचिका का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि हेबियस कॉर्पस एक संक्षिप्त (समरी) कार्यवाही है, जिसे जटिल कस्टडी विवादों में लंबी सुनवाई के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति प्रतिबा एम. सिंह और न्यायमूर्ति मधु जैन की खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए पिता और दादी द्वारा दायर हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। मामले में याचिकाकर्ता ने अमेरिका में अपनी पूर्व पत्नी के साथ रह रहे नाबालिग पुत्र को अदालत के समक्ष पेश करने की मांग की थी। बच्चा लगभग आठ वर्ष से अमेरिका (कैलिफोर्निया) में अपनी मां के साथ रह रहा है और अमेरिकी नागरिक है। अदालत ने अपने फैसले में कहा हाईकोर्ट से मिले रिट अधिकार क्षेत्र का सामान्यतः कस्टडी मुद्दों पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, खासकर तब जब बच्चे के कल्याण की जांच के लिए विस्तृत पूछताछ की जरूरत हो।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चे की विदेशी नागरिकता या विदेशी अदालत के आदेश निर्णायक नहीं हैं, बल्कि बच्चे का सर्वोत्तम हित (बेस्ट इंटरेस्ट ऑफ चाइल्ड) ही प्रमुख विचारणीय मुद्दा है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के पास मध्यस्थता के लिए जाने का निर्देश दिया। आयोग से कहा गया है कि वह बाल मनोवैज्ञानिकों की मदद से शामिल होकर माता-पिता के बीच एक ठोस पेरेंटिंग प्लान तैयार करे और यदि जरूरी हो तो अंतरराष्ट्रीय मिशन की मदद भी ली जाए।
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नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाल हिरासत (ट्रांसनेशनल चाइल्ड कस्टडी) के मामलों में विस्तृत जांच की आवश्यकता होने पर हेबियस कॉर्पस याचिका का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि हेबियस कॉर्पस एक संक्षिप्त (समरी) कार्यवाही है, जिसे जटिल कस्टडी विवादों में लंबी सुनवाई के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति प्रतिबा एम. सिंह और न्यायमूर्ति मधु जैन की खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए पिता और दादी द्वारा दायर हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। मामले में याचिकाकर्ता ने अमेरिका में अपनी पूर्व पत्नी के साथ रह रहे नाबालिग पुत्र को अदालत के समक्ष पेश करने की मांग की थी। बच्चा लगभग आठ वर्ष से अमेरिका (कैलिफोर्निया) में अपनी मां के साथ रह रहा है और अमेरिकी नागरिक है। अदालत ने अपने फैसले में कहा हाईकोर्ट से मिले रिट अधिकार क्षेत्र का सामान्यतः कस्टडी मुद्दों पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, खासकर तब जब बच्चे के कल्याण की जांच के लिए विस्तृत पूछताछ की जरूरत हो।
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पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चे की विदेशी नागरिकता या विदेशी अदालत के आदेश निर्णायक नहीं हैं, बल्कि बच्चे का सर्वोत्तम हित (बेस्ट इंटरेस्ट ऑफ चाइल्ड) ही प्रमुख विचारणीय मुद्दा है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के पास मध्यस्थता के लिए जाने का निर्देश दिया। आयोग से कहा गया है कि वह बाल मनोवैज्ञानिकों की मदद से शामिल होकर माता-पिता के बीच एक ठोस पेरेंटिंग प्लान तैयार करे और यदि जरूरी हो तो अंतरराष्ट्रीय मिशन की मदद भी ली जाए।
