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Delhi NCR News: घर पर देखभाल से कमजोर नवजातों में एनीमिया कम, दिमागी विकास बेहतर
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दक्षिण दिल्ली में किए गए एक अहम अध्ययन में सामने आया है कि घर पर नियमित स्वास्थ्य व पोषण संबंधी देखभाल मिलने से कमजोर व कम वजन वाले नवजात बच्चों की सेहत में बड़ा सुधार होता है। सोसाइटी फॉर एप्लाइड स्टडीज (नई दिल्ली) और नॉर्वे की यूनिवर्सिटी ऑफ बर्गन के संयुक्त अध्ययन में 1,300 बच्चों को शामिल किया गया, जो गर्भावस्था की अवधि के अनुसार सामान्य से छोटे या कम वजन (स्मॉल फॉर जेस्टेशनल एज) के पैदा हुए थे।
जनवरी 2023 से अगस्त 2025 के बीच दक्षिण दिल्ली के कम संसाधनों वाले क्षेत्रों पर किए गए इस शोध में एक समूह को सामान्य सरकारी स्वास्थ्य सेवा दी गई, जबकि दूसरे को घर-घर जाकर जांच, पोषण सलाह, विकासात्मक गतिविधियां व माताओं को मानसिक सहयोग मिला।
परिणाम बताते हैं कि विशेष देखभाल पाने वाले बच्चों में एनीमिया की संभावना 50 प्रतिशत से भी कम रही। इनमें कम वजन, स्टंटिंग, वेस्टिंग और मृत्यु दर भी कम देखी गई। पहले जन्मदिन तक इन बच्चों की सीखने की क्षमता, भाषा विकास व शारीरिक गतिविधियों में भी बेहतर सुधार मिला। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह मॉडल कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में प्रभावी साबित हो सकता है। उनका कहना है कि यदि इस तरह की व्यवस्था बड़े स्तर पर लागू की जाए तो कमजोर बच्चों के स्वास्थ्य और विकास में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है।
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नई दिल्ली। दक्षिण दिल्ली में किए गए एक अहम अध्ययन में सामने आया है कि घर पर नियमित स्वास्थ्य व पोषण संबंधी देखभाल मिलने से कमजोर व कम वजन वाले नवजात बच्चों की सेहत में बड़ा सुधार होता है। सोसाइटी फॉर एप्लाइड स्टडीज (नई दिल्ली) और नॉर्वे की यूनिवर्सिटी ऑफ बर्गन के संयुक्त अध्ययन में 1,300 बच्चों को शामिल किया गया, जो गर्भावस्था की अवधि के अनुसार सामान्य से छोटे या कम वजन (स्मॉल फॉर जेस्टेशनल एज) के पैदा हुए थे।
जनवरी 2023 से अगस्त 2025 के बीच दक्षिण दिल्ली के कम संसाधनों वाले क्षेत्रों पर किए गए इस शोध में एक समूह को सामान्य सरकारी स्वास्थ्य सेवा दी गई, जबकि दूसरे को घर-घर जाकर जांच, पोषण सलाह, विकासात्मक गतिविधियां व माताओं को मानसिक सहयोग मिला।
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परिणाम बताते हैं कि विशेष देखभाल पाने वाले बच्चों में एनीमिया की संभावना 50 प्रतिशत से भी कम रही। इनमें कम वजन, स्टंटिंग, वेस्टिंग और मृत्यु दर भी कम देखी गई। पहले जन्मदिन तक इन बच्चों की सीखने की क्षमता, भाषा विकास व शारीरिक गतिविधियों में भी बेहतर सुधार मिला। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह मॉडल कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में प्रभावी साबित हो सकता है। उनका कहना है कि यदि इस तरह की व्यवस्था बड़े स्तर पर लागू की जाए तो कमजोर बच्चों के स्वास्थ्य और विकास में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है।
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