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Delhi NCR News: आईआईटी दिल्ली ने तैयार किया स्वदेशी सर्विलांस बैलून
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सीमा सुरक्षा से आपदा प्रबंधन तक होगा उपयोग, 10 लाख रुपये की लागत से विकसित बैलून 200 मीटर ऊंचाई तक उड़कर 20 किमी से अधिक क्षेत्र की निगरानी कर सकेगा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। आईआईटी दिल्ली ने स्वदेशी तकनीक से सर्विलांस टैक्टिकल बैलून विकसित किया है। इसका उपयोग सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ रोकने, शहरी इलाकों में यातायात और भीड़ प्रबंधन, मौसम पूर्वानुमान तथा प्राकृतिक आपदा या आपात स्थिति में संचार नेटवर्क स्थापित करने के लिए किया जा सकेगा। बुधवार को आईआईटी दिल्ली परिसर में इसका 30 मीटर की ऊंचाई तक सफल लाइव प्रदर्शन किया गया।
यह बैलून एयरोस्टेट तकनीक पर आधारित है, जिसमें हवा से हल्की गैस का उपयोग किया जाता है। इस परियोजना को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), आईआईटी दिल्ली, जीबी टेक्सकोट सॉल्यूशन और साइरन एआई ने संयुक्त रूप से विकसित किया है। आईआईटी दिल्ली के टेक्सटाइल एवं फाइबर इंजीनियरिंग विभाग की प्रो. मंगला जोशी प्रधान अन्वेषक और प्रो. भूपेंद्र सिंह बुटोला सह-प्रधान अन्वेषक हैं।
प्रो. भूपेंद्र सिंह बुटोला ने बताया कि बैलून को स्वदेशी योजना के तहत तैयार किया गया है। इसका उपयोग निगरानी, संचार और सामरिक अभियानों में किया जा सकेगा। बैलून के निर्माण में प्रयुक्त विशेष नायलॉन फैब्रिक आईआईटी दिल्ली की प्रयोगशाला में विकसित किया गया है। इसका व्यास 5.8 मीटर है। इसी श्रेणी के बैलून अभी अमेरिका से करीब 10 करोड़ रुपये में आयात किए जाते हैं, जबकि आईआईटी दिल्ली और जीबी टेक्सकोट सॉल्यूशन ने इसे लगभग 10 लाख रुपये की लागत में तैयार किया है। हालांकि इसका आकार विदेशी बैलून की तुलना में छोटा है।
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15 किग्रा तक पेलोड लगाया जा सकता है
बैलून में भरी हीलियम गैस दो से तीन महीने तक बनी रह सकती है। परिसर में ऊंचाई की सीमा के कारण इसका परीक्षण 30 मीटर तक किया गया, जबकि इसे 200 मीटर तक उड़ाया जा सकता है। इस ऊंचाई से 20 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र की निगरानी संभव होगी। इसमें 15 किलोग्राम तक का पेलोड लगाया जा सकता है। 5जी नेटवर्क आधारित पेलोड के जरिए दूरदराज के क्षेत्रों में 32 लोगों तक संचार सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है। सीमा क्षेत्रों में निगरानी और घुसपैठ रोकने में भी यह उपयोगी होगा।
मौसम की भविष्यवाणी में मिलेगी मदद
बैलून में आरएफ डिटेक्टर पेलोड लगाकर रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नलों की निगरानी की जा सकती है। ड्रोन जहां केवल दो-तीन घंटे तक उड़ान भर पाते हैं, वहीं यह बैलून लंबे समय तक ट्रांसमीटर सिग्नलों पर नजर रख सकता है। जीबी टेक्सकोट सॉल्यूशन के सह-संस्थापक डॉ. नीरज मंडलेकर ने बताया कि परियोजना के लिए आईआईटी दिल्ली ने पांच लाख रुपये का सहयोग दिया। सेंसर आधारित पेलोड लगाने पर यह हवा की गति, तापमान, आर्द्रता और प्रदूषण का डेटा जुटाकर स्थानीय मौसम पूर्वानुमान में भी मदद करेगा।
यातायात से लेकर भीड़ प्रबंधन तक में करेगा काम
आईआईटी के पूर्व छात्र और साइरन एआई के चीफ ग्रोथ ऑफिसर विक्रांत ने बताया कि एआई आधारित पेलोड और विशेष ऐप की मदद से बैलून यातायात और भीड़ प्रबंधन में भी उपयोगी होगा। यह आवागमन का रियल-टाइम विश्लेषण करेगा तथा किसी स्थान पर तय सीमा से अधिक भीड़ होने पर तुरंत ग्राफ के माध्यम से सूचना देगा। इसमें लगे कैमरे दिन और रात, दोनों समय प्रभावी ढंग से काम करेंगे।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। आईआईटी दिल्ली ने स्वदेशी तकनीक से सर्विलांस टैक्टिकल बैलून विकसित किया है। इसका उपयोग सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ रोकने, शहरी इलाकों में यातायात और भीड़ प्रबंधन, मौसम पूर्वानुमान तथा प्राकृतिक आपदा या आपात स्थिति में संचार नेटवर्क स्थापित करने के लिए किया जा सकेगा। बुधवार को आईआईटी दिल्ली परिसर में इसका 30 मीटर की ऊंचाई तक सफल लाइव प्रदर्शन किया गया।
यह बैलून एयरोस्टेट तकनीक पर आधारित है, जिसमें हवा से हल्की गैस का उपयोग किया जाता है। इस परियोजना को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), आईआईटी दिल्ली, जीबी टेक्सकोट सॉल्यूशन और साइरन एआई ने संयुक्त रूप से विकसित किया है। आईआईटी दिल्ली के टेक्सटाइल एवं फाइबर इंजीनियरिंग विभाग की प्रो. मंगला जोशी प्रधान अन्वेषक और प्रो. भूपेंद्र सिंह बुटोला सह-प्रधान अन्वेषक हैं।
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प्रो. भूपेंद्र सिंह बुटोला ने बताया कि बैलून को स्वदेशी योजना के तहत तैयार किया गया है। इसका उपयोग निगरानी, संचार और सामरिक अभियानों में किया जा सकेगा। बैलून के निर्माण में प्रयुक्त विशेष नायलॉन फैब्रिक आईआईटी दिल्ली की प्रयोगशाला में विकसित किया गया है। इसका व्यास 5.8 मीटर है। इसी श्रेणी के बैलून अभी अमेरिका से करीब 10 करोड़ रुपये में आयात किए जाते हैं, जबकि आईआईटी दिल्ली और जीबी टेक्सकोट सॉल्यूशन ने इसे लगभग 10 लाख रुपये की लागत में तैयार किया है। हालांकि इसका आकार विदेशी बैलून की तुलना में छोटा है।
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15 किग्रा तक पेलोड लगाया जा सकता है
बैलून में भरी हीलियम गैस दो से तीन महीने तक बनी रह सकती है। परिसर में ऊंचाई की सीमा के कारण इसका परीक्षण 30 मीटर तक किया गया, जबकि इसे 200 मीटर तक उड़ाया जा सकता है। इस ऊंचाई से 20 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र की निगरानी संभव होगी। इसमें 15 किलोग्राम तक का पेलोड लगाया जा सकता है। 5जी नेटवर्क आधारित पेलोड के जरिए दूरदराज के क्षेत्रों में 32 लोगों तक संचार सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है। सीमा क्षेत्रों में निगरानी और घुसपैठ रोकने में भी यह उपयोगी होगा।
मौसम की भविष्यवाणी में मिलेगी मदद
बैलून में आरएफ डिटेक्टर पेलोड लगाकर रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नलों की निगरानी की जा सकती है। ड्रोन जहां केवल दो-तीन घंटे तक उड़ान भर पाते हैं, वहीं यह बैलून लंबे समय तक ट्रांसमीटर सिग्नलों पर नजर रख सकता है। जीबी टेक्सकोट सॉल्यूशन के सह-संस्थापक डॉ. नीरज मंडलेकर ने बताया कि परियोजना के लिए आईआईटी दिल्ली ने पांच लाख रुपये का सहयोग दिया। सेंसर आधारित पेलोड लगाने पर यह हवा की गति, तापमान, आर्द्रता और प्रदूषण का डेटा जुटाकर स्थानीय मौसम पूर्वानुमान में भी मदद करेगा।
यातायात से लेकर भीड़ प्रबंधन तक में करेगा काम
आईआईटी के पूर्व छात्र और साइरन एआई के चीफ ग्रोथ ऑफिसर विक्रांत ने बताया कि एआई आधारित पेलोड और विशेष ऐप की मदद से बैलून यातायात और भीड़ प्रबंधन में भी उपयोगी होगा। यह आवागमन का रियल-टाइम विश्लेषण करेगा तथा किसी स्थान पर तय सीमा से अधिक भीड़ होने पर तुरंत ग्राफ के माध्यम से सूचना देगा। इसमें लगे कैमरे दिन और रात, दोनों समय प्रभावी ढंग से काम करेंगे।