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Delhi NCR News: जेएनयू को डिप्रिवेशन पॉइंट्स के आधार पर दाखिला जारी रखने की अनुमति
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मंगलवार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को डिप्रिवेशन पॉइंट्स के आधार पर छात्रों को दाखिला देने की प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दे दी। कोर्ट ने कहा कि जेएनयू में यह नीति 1974 से लागू है और एकल न्यायाधीश के आदेश से पूरी प्रवेश प्रक्रिया ठप पड़ गई थी।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की बेंच ने यह अंतरिम आदेश दिया। बेंच ने कहा कि विश्वविद्यालय ई-प्रॉस्पेक्टस के प्रावधानों के अनुसार प्रवेश प्रक्रिया जारी रखे, जिसमें विवादित प्रावधान भी शामिल हैं। कोर्ट ने एकल न्यायाधीश से मामले को जल्द निपटाने का भी अनुरोध किया।
क्या है डिप्रिवेशन पॉइंट्स
जेएनयू के 2026-27 के प्रॉस्पेक्टस में उम्मीदवारों को उनके पिछले स्कूलिंग के भौगोलिक स्थान के आधार पर अधिकतम 12 डिप्रिवेशन पॉइंट्स दिए जाते हैं। प्रत्येक पॉइंट तीन अंकों के बराबर है, यानी एक उम्मीदवार को अधिकतम 36 अतिरिक्त अंक मिल सकते हैं। विश्वविद्यालय का कहना है कि यह नीति देश के विभिन्न क्षेत्रों से छात्रों की पर्याप्त संख्या सुनिश्चित करने के लिए अपनाई गई है।
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एकल न्यायाधीश का आदेश
14 अगस्त को न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने अंतरिम आदेश में जेएनयू को इस नीति के आधार पर दाखिला देने से रोक दिया था। उन्होंने कहा था कि डिप्रिवेशन पॉइंट्स के जरिए जेएनयू कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (सीयूईटी) में प्राप्त अंकों में बदलाव कर रहा है। न्यायमूर्ति सिंह ने टिप्पणी की थी कि अगर ऐसा होने दिया गया तो प्रवेश परीक्षा की पवित्रता समाप्त हो जाएगी और विश्वविद्यालय अध्यादेशों के जरिए प्रतियोगी परीक्षा के स्कोर में बदलाव कर सकेगा, जो प्रतियोगी परीक्षा की अवधारणा के खिलाफ है। यह याचिका छात्र अमित मेहरा ने दायर की थी, जो जेएनयू में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए आवेदन किया था।
विश्वविद्यालय का पक्ष
जेएनयू ने अपील में बताया कि डिप्रिवेशन पॉइंट्स की नीति जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1966 के प्रावधानों पर आधारित है। अकादमिक परिषद ने इस पर विचार-विमर्श के बाद मंजूरी दी थी।
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नई दिल्ली। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मंगलवार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को डिप्रिवेशन पॉइंट्स के आधार पर छात्रों को दाखिला देने की प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दे दी। कोर्ट ने कहा कि जेएनयू में यह नीति 1974 से लागू है और एकल न्यायाधीश के आदेश से पूरी प्रवेश प्रक्रिया ठप पड़ गई थी।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की बेंच ने यह अंतरिम आदेश दिया। बेंच ने कहा कि विश्वविद्यालय ई-प्रॉस्पेक्टस के प्रावधानों के अनुसार प्रवेश प्रक्रिया जारी रखे, जिसमें विवादित प्रावधान भी शामिल हैं। कोर्ट ने एकल न्यायाधीश से मामले को जल्द निपटाने का भी अनुरोध किया।
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क्या है डिप्रिवेशन पॉइंट्स
जेएनयू के 2026-27 के प्रॉस्पेक्टस में उम्मीदवारों को उनके पिछले स्कूलिंग के भौगोलिक स्थान के आधार पर अधिकतम 12 डिप्रिवेशन पॉइंट्स दिए जाते हैं। प्रत्येक पॉइंट तीन अंकों के बराबर है, यानी एक उम्मीदवार को अधिकतम 36 अतिरिक्त अंक मिल सकते हैं। विश्वविद्यालय का कहना है कि यह नीति देश के विभिन्न क्षेत्रों से छात्रों की पर्याप्त संख्या सुनिश्चित करने के लिए अपनाई गई है।
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एकल न्यायाधीश का आदेश
14 अगस्त को न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने अंतरिम आदेश में जेएनयू को इस नीति के आधार पर दाखिला देने से रोक दिया था। उन्होंने कहा था कि डिप्रिवेशन पॉइंट्स के जरिए जेएनयू कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (सीयूईटी) में प्राप्त अंकों में बदलाव कर रहा है। न्यायमूर्ति सिंह ने टिप्पणी की थी कि अगर ऐसा होने दिया गया तो प्रवेश परीक्षा की पवित्रता समाप्त हो जाएगी और विश्वविद्यालय अध्यादेशों के जरिए प्रतियोगी परीक्षा के स्कोर में बदलाव कर सकेगा, जो प्रतियोगी परीक्षा की अवधारणा के खिलाफ है। यह याचिका छात्र अमित मेहरा ने दायर की थी, जो जेएनयू में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए आवेदन किया था।
विश्वविद्यालय का पक्ष
जेएनयू ने अपील में बताया कि डिप्रिवेशन पॉइंट्स की नीति जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1966 के प्रावधानों पर आधारित है। अकादमिक परिषद ने इस पर विचार-विमर्श के बाद मंजूरी दी थी।