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शांतिपूर्ण विरोध संवैधानिक अधिकार, रिहाई का फैसला का: जेएनयू शिक्षक

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 28 Jul 2026 06:17 PM IST
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-आपराधिक मामलों के आरोपितों की रिहाई पर सरकार को नहीं किया जा सकता बाध्य
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन से जुड़े मामलों में मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया पर जेएनयू के एसोसिएट प्रोफेसर क्रिस्टु दास ने चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन संविधान के तहत हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आपराधिक मामलों में आरोपियों की रिहाई का निर्णय सरकार नहीं, बल्कि स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा कानून के अनुसार किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि नागरिकों को विरोध प्रदर्शन व अभियानों के जरिये मांग रखने का अधिकार है, लेकिन किसी आंदोलन को दबाव बनाकर सरकार से आपराधिक मामलों में आरोपितों की रिहाई की मांग करने का लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में कहा गया है कि शांतिपूर्ण विरोध और कानून-व्यवस्था दोनों लोकतंत्र के लिए जरूरी हैं।
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अगर प्रदर्शन में आगजनी, हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे आरोप हैं, तो उनकी जांच और दोष निर्धारण का अधिकार अदालतों का है। लोकतंत्र में सरकार, पुलिस और न्यायपालिका की भूमिकाएं अलग हैं। कानून के शासन और न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल शर्त है।
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