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'राजनीति से प्रेरित': सोनिया गांधी ने 1980 मतदाता सूची याचिका का किया विरोध, जवाब में कहा- निराधार हैं आरोप

संवाद न्यूज एजेंसी, नई दिल्ली Published by: अनुज कुमार Updated Sat, 07 Feb 2026 10:13 PM IST
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सार

पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोर्ट में 1980 में मतदाता सूची में नाम जुड़ने को लेकर दायर पुनरीक्षण याचिका का कड़ा विरोध किया है। उनके वकीलों ने विशेष न्यायाधीश की अदालत में जवाब दाखिल किया और आरोपों को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित बताया।

petition filed in 1980 regarding becoming voter was politically motivated said Sonia Gandhi
सोनिया गांधी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राउज एवेन्यू कोर्ट में 1983 में भारतीय नागरिकता हासिल करने से तीन साल पहले ही मतदाता सूची में नाम दर्ज होने को लेकर दायर याचिका का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि यह याचिका राजनीति से प्रेरित, पूरी तरह से गलत और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

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विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने की अदालत में सोनिया के वकीलों ने अपना जवाब दाखिल किया। यह मामला वकील विकास त्रिपाठी की शिकायत में लगाए गए उस आरोप से जुड़ा है, जिसमें कहा गया कि जनवरी 1980 में सोनिया गांधी का नाम नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र की मतदाता सूची जोड़ा गया, जबकि उस समय वह भारतीय नागरिक नहीं थीं। उन्होंने तीन साल बाद 1983 में भारतीय नागरिकता हासिल की। शिकायत में जालसाजी और सरकारी संस्था को गुमराह करने जैसे आरोप लगाए गए थे। हालांकि मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 11 सितंबर 2025 को उनकी शिकायत यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि यह मामला अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। इसके बाद विकास त्रिपाठी ने मजिस्ट्रेट आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की और वरिष्ठ कांग्रेस नेता के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की।
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आपराधिक अदालतें निजी शिकायतों पर सुनवाई नहीं कर सकतीं
सोनिया गांधी की ओर से वकीलों ने जवाब दाखिल करते हुए कहा कि लगाए गए आरोप पूरी तरह गलत, निराधार और राजनीति से प्रेरित हैं। जवाब में सोनिया ने कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट ने सही कहा कि नागरिकता के मामले पूरी तरह से केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जबकि मतदाता सूची से जुड़े विवाद पर केंद्रीय चुनाव आयोग का एकमात्र अधिकार है। आपराधिक अदालतें निजी शिकायतों के आधार पर इन मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं। जवाब में यह भी कहा गया कि यह मामला करीब 25 साल पहले उठाए गए एक पुराने विवाद को दोबारा जीवित करने की कोशिश है।

शिकायत में कोई ठोस या मूल दस्तावेज नहीं लगाए गए
जवाब में यह भी तर्क दिया गया कि शिकायत के साथ कोई ठोस या मूल दस्तावेज नहीं लगाए गए हैं। कथित आवेदन या अनुरोध की न तो तारीख बताई गई है और न ही उसकी कोई प्रति पेश की गई है। इसके अलावा, यह मान लेना भी गलत है कि किसी का नाम मतदाता सूची में शामिल होना केवल फॉर्म भरने के आधार पर ही होता है। जवाब में यह भी कहा गया कि 40 साल से अधिक पुराने आरोपों पर अब विश्वसनीय सबूत जुटाना संभव नहीं है और ऐसे मामले संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा का उल्लंघन करते हैं। अब इस मामले पर आगे की सुनवाई 21 फरवरी को होगी।

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