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Delhi NCR News: आरटीआई से खुला सच, 15 साल पुराने सीबीआई मामले में व्यापारी बरी
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कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरटीआई के जरिये यह साफ हुआ कि थिनर और रिड्यूसर आवश्यक वस्तु की श्रेणी में नहीं आते
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली।
राउज एवेन्यू कोर्ट ने 15 साल पुराने मामले में फैसला सुनाते हुए एक व्यापारी को बरी किया है। अदालत ने कहा कि यह केस जरूरी चीजों से जुड़ा नहीं था और इसकी पुष्टि सूचना का अधिकार (आरटीआई) से मिली जानकारी से हुई। यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा दर्ज किया गया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि रिलायबल इंडस्ट्रीज ने थिनर और रिड्यूसर जैसे केमिकल्स की बिक्री में गड़बड़ी की। जांच के बाद 2011 में चार्जशीट दाखिल की गई थी। मामले की सुनवाई करते हुए अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ज्योति माहेश्वरी ने मनीष कुमार अग्रवाल और उनकी कंपनी को बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरटीआई से यह साफ हो गया कि थिनर और रिड्यूसर आवश्यक वस्तु की श्रेणी में नहीं आते हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि ये केमिकल्स जरूरी वस्तुओं की सूची में शामिल थे। इस कारण पूरा मामला ही कमजोर पड़ गया। कोर्ट के अनुसार, अगर कोई बुनियादी सबूत ही पेश नहीं किया गया, तो आरोप टिक नहीं सकते। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि इस लंबे मामले के चलते आरोपी को करीब 15 साल तक मानसिक और आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ी। अंत में कोर्ट ने कहा कि सबूतों के अभाव में आरोपियों को बरी किया जाता है।
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नई दिल्ली।
राउज एवेन्यू कोर्ट ने 15 साल पुराने मामले में फैसला सुनाते हुए एक व्यापारी को बरी किया है। अदालत ने कहा कि यह केस जरूरी चीजों से जुड़ा नहीं था और इसकी पुष्टि सूचना का अधिकार (आरटीआई) से मिली जानकारी से हुई। यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा दर्ज किया गया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि रिलायबल इंडस्ट्रीज ने थिनर और रिड्यूसर जैसे केमिकल्स की बिक्री में गड़बड़ी की। जांच के बाद 2011 में चार्जशीट दाखिल की गई थी। मामले की सुनवाई करते हुए अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ज्योति माहेश्वरी ने मनीष कुमार अग्रवाल और उनकी कंपनी को बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरटीआई से यह साफ हो गया कि थिनर और रिड्यूसर आवश्यक वस्तु की श्रेणी में नहीं आते हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि ये केमिकल्स जरूरी वस्तुओं की सूची में शामिल थे। इस कारण पूरा मामला ही कमजोर पड़ गया। कोर्ट के अनुसार, अगर कोई बुनियादी सबूत ही पेश नहीं किया गया, तो आरोप टिक नहीं सकते। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि इस लंबे मामले के चलते आरोपी को करीब 15 साल तक मानसिक और आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ी। अंत में कोर्ट ने कहा कि सबूतों के अभाव में आरोपियों को बरी किया जाता है।
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