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Delhi NCR News: यमुना पर बने नए ब्रिज पर ट्रेनों का संचालन शुरू, 20 दिन इतिहास बन जाएगा 160 साल पुराना लोहे का पुल
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- नए आधुनिक पुल से बढ़ेगी ट्रेनों की रफ्तार, बाढ़ के दौरान भी नहीं रुकेगा संचालन
-अब पुराने पुल का इस्तेमाल केवल सड़क यातायात के लिए इस्तेमाल किया जाएगा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली-गाजियाबाद को जोड़ने वाली यमुना नदी पर बने नए आधुनिक रेलवे पुल से ट्रेनों का संचालन शुरू हो गया है। अब बाढ़ या बरसात में ट्रेनों को रद्द नहीं करना पड़ेगा। इसके साथ ही करीब 160 साल पुराना लोहे का पुल अब धीरे-धीरे इतिहास बनने की ओर बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में इस पुराने पुल पर ट्रेनों की आवाजाही पूरी तरह बंद कर दी जाएगी।
उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी हिंमाशु शेखर उपाध्याय ने बताया कि फिलहाल नए पुल से दिल्ली से गाजियाबाद और शाहदरा की ओर जाने वाली ट्रेनों को चलाया जा रहा है, जबकि वापसी में अभी कुछ ट्रेनें पुराने पुल से आ रही हैं। अगले करीब 20 दिनों में पुराने पुल को रेल यातायात के लिए पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। इसके बाद यह पुल केवल सड़क यातायात के लिए इस्तेमाल होगा। यह पुराना लोहे का पुल दो मंजिला संरचना वाला है, जिसमें ऊपर से ट्रेनें गुजरती हैं और नीचे से वाहन चलते हैं। लंबे समय से जर्जर हो चुके इस पुल पर ट्रेनों की गति बेहद धीमी रखनी पड़ती थी, जिससे यात्रियों को देरी का सामना करना पड़ता था। इसी की बगल में नया पुल बनाया गया है।
तकनीकी रूप से बेहतर और बेहद सुरक्षित है नया पुल
नए पुल को तकनीकी रूप से काफी बेहतर बनाया गया है। इसमें आईआईटी सहित अन्य संस्थानों के तकनीकी विशेषज्ञों की मदद ली गई है। इसके अलावा सुरक्षा के लिहाज से इसका डिजाइन तैयार किया गया है। इसके शुरू होने से दिल्ली से गाजियाबाद होते हुए देहरादून, मुरादाबाद, सहारनपुर और कानपुर जैसे प्रमुख शहरों के लिए रेल यात्रा अधिक सुगम होगी। इससे रोजाना आने-जाने वाले और लंबी दूरी के यात्रियों को भी लाभ मिलेगा।
अब नहीं लगेगा ट्रेनों की स्पीड पर ब्रेक
पुराने पुल से ट्रेनें धीमी गति से गुजरती हैं। बारिश के मौसम में खासकर ट्रेनों का परिचालन प्रभावित होता है। वहीं यमुना में जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर जाने पर पुल को यातायात के लिए बंद करना पड़ता था। बीते वर्ष भी बाढ़ आने पर कई दिनों तक ट्रेनों की आवाजाही बंद की गई थी। यमुना का जलस्तर बढ़ने पर पुल से ईएमयू 15 किलोमीटर प्रतिघंटे, मेल व एक्सप्रेस ट्रेनें 20 किलोमीटर प्रतिघंटे और मालगाड़ियां 10 किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से गुजरती थी। नए पुल से ट्रेनों की गति भी बेहतर होगी। इससे समय की बचत और दुर्घटना का खतरा भी खत्म होगा। पुरानी दिल्ली-गाजियाबाद के बीच हर दिन करीब 150 ट्रेनों की आवाजाही होती है।
23 साल में तैयार हुआ नया पुल, बार-बार आई अड़चन
नया पुल करीब 23 साल में बना है। इसके निर्माण में बार बार प्रशासनिक अड़चनें आईं। रेलवे ने 1998 में इसके बराबर में नया पुल बनाने की योजना तैयार की थी। 2003 में इसका निर्माण शुरू हुआ था। इसकी लागत करीब 137 करोड़ रुपये आंकी गई थी, लेकिन अलग-अलग अड़चनों की वजह से निर्माण कार्य बीच-बीच में रुकता रहा। शुरुआती योजना में लाल किले के बगल में सलीमगढ़ किले के समीप से रेल लाइन को निकाला जाएगा। इस पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग ने आपत्ति जता दी। इसके बाद 2011 में रिपोर्ट आई। इसमें किले को बाईपास करके बनाया जाएगा। फिर 2012 में एएसआई ने भी मंजूरी दे दी।
1866 में बना पुराना लोहे का पुल, अब बनेगा इतिहास
दरअसल, अंग्रेजों के जमाने में 1866 में यमुना नदी पर पुराने लोहे के पुल का निर्माण हुआ था। दिल्ली की पहचान रहा करीब 3500 टन के इस पुल से दिल्ली-कोलकाला रूट की ट्रेनों की आवाजाही होती थी। निर्माण के वक्त इसकी आयु 80 साल तय की गई थी, लेकिन 160 साल बाद भी वैकल्पिक इंतजाम न होने से अभी भी इससे ट्रेनें गुजरती थी।
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-अब पुराने पुल का इस्तेमाल केवल सड़क यातायात के लिए इस्तेमाल किया जाएगा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली-गाजियाबाद को जोड़ने वाली यमुना नदी पर बने नए आधुनिक रेलवे पुल से ट्रेनों का संचालन शुरू हो गया है। अब बाढ़ या बरसात में ट्रेनों को रद्द नहीं करना पड़ेगा। इसके साथ ही करीब 160 साल पुराना लोहे का पुल अब धीरे-धीरे इतिहास बनने की ओर बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में इस पुराने पुल पर ट्रेनों की आवाजाही पूरी तरह बंद कर दी जाएगी।
उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी हिंमाशु शेखर उपाध्याय ने बताया कि फिलहाल नए पुल से दिल्ली से गाजियाबाद और शाहदरा की ओर जाने वाली ट्रेनों को चलाया जा रहा है, जबकि वापसी में अभी कुछ ट्रेनें पुराने पुल से आ रही हैं। अगले करीब 20 दिनों में पुराने पुल को रेल यातायात के लिए पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। इसके बाद यह पुल केवल सड़क यातायात के लिए इस्तेमाल होगा। यह पुराना लोहे का पुल दो मंजिला संरचना वाला है, जिसमें ऊपर से ट्रेनें गुजरती हैं और नीचे से वाहन चलते हैं। लंबे समय से जर्जर हो चुके इस पुल पर ट्रेनों की गति बेहद धीमी रखनी पड़ती थी, जिससे यात्रियों को देरी का सामना करना पड़ता था। इसी की बगल में नया पुल बनाया गया है।
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तकनीकी रूप से बेहतर और बेहद सुरक्षित है नया पुल
नए पुल को तकनीकी रूप से काफी बेहतर बनाया गया है। इसमें आईआईटी सहित अन्य संस्थानों के तकनीकी विशेषज्ञों की मदद ली गई है। इसके अलावा सुरक्षा के लिहाज से इसका डिजाइन तैयार किया गया है। इसके शुरू होने से दिल्ली से गाजियाबाद होते हुए देहरादून, मुरादाबाद, सहारनपुर और कानपुर जैसे प्रमुख शहरों के लिए रेल यात्रा अधिक सुगम होगी। इससे रोजाना आने-जाने वाले और लंबी दूरी के यात्रियों को भी लाभ मिलेगा।
अब नहीं लगेगा ट्रेनों की स्पीड पर ब्रेक
पुराने पुल से ट्रेनें धीमी गति से गुजरती हैं। बारिश के मौसम में खासकर ट्रेनों का परिचालन प्रभावित होता है। वहीं यमुना में जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर जाने पर पुल को यातायात के लिए बंद करना पड़ता था। बीते वर्ष भी बाढ़ आने पर कई दिनों तक ट्रेनों की आवाजाही बंद की गई थी। यमुना का जलस्तर बढ़ने पर पुल से ईएमयू 15 किलोमीटर प्रतिघंटे, मेल व एक्सप्रेस ट्रेनें 20 किलोमीटर प्रतिघंटे और मालगाड़ियां 10 किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से गुजरती थी। नए पुल से ट्रेनों की गति भी बेहतर होगी। इससे समय की बचत और दुर्घटना का खतरा भी खत्म होगा। पुरानी दिल्ली-गाजियाबाद के बीच हर दिन करीब 150 ट्रेनों की आवाजाही होती है।
23 साल में तैयार हुआ नया पुल, बार-बार आई अड़चन
नया पुल करीब 23 साल में बना है। इसके निर्माण में बार बार प्रशासनिक अड़चनें आईं। रेलवे ने 1998 में इसके बराबर में नया पुल बनाने की योजना तैयार की थी। 2003 में इसका निर्माण शुरू हुआ था। इसकी लागत करीब 137 करोड़ रुपये आंकी गई थी, लेकिन अलग-अलग अड़चनों की वजह से निर्माण कार्य बीच-बीच में रुकता रहा। शुरुआती योजना में लाल किले के बगल में सलीमगढ़ किले के समीप से रेल लाइन को निकाला जाएगा। इस पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग ने आपत्ति जता दी। इसके बाद 2011 में रिपोर्ट आई। इसमें किले को बाईपास करके बनाया जाएगा। फिर 2012 में एएसआई ने भी मंजूरी दे दी।
1866 में बना पुराना लोहे का पुल, अब बनेगा इतिहास
दरअसल, अंग्रेजों के जमाने में 1866 में यमुना नदी पर पुराने लोहे के पुल का निर्माण हुआ था। दिल्ली की पहचान रहा करीब 3500 टन के इस पुल से दिल्ली-कोलकाला रूट की ट्रेनों की आवाजाही होती थी। निर्माण के वक्त इसकी आयु 80 साल तय की गई थी, लेकिन 160 साल बाद भी वैकल्पिक इंतजाम न होने से अभी भी इससे ट्रेनें गुजरती थी।