भारत में बॉलीवुड से लेकर रीजनल सिनेमा तक हर साल छोटी-बड़ी हज़ारों फिल्में बनती हैं। निर्माता फिल्म के सेट से लेकर इसके कलाकारों तक, मेहनत के साथ ही पानी की तरह पैसा भी बहाते हैं, लेकिन फिल्म को थिएटर तक पहुंचने से पहले उसकी रिलीज के लिए एक सर्टिफिकेट जारी करवाना होता है, यदि कोई भी निर्माता ऐसा नहीं करता है, तो उसका कंटेंट रिलीज के लिए लीगल नहीं माना जाता है और उसे रिलीज नहीं किया जा सकता है। हालिया समय में देखने में आया है कि कई फिल्मों के कई दृश्यों पर सवाल उठाए जा रहे हैं और जैसे ही किसी भी फिल्म के दृश्य पर कोई आपत्ति जताई जाती है तो सबसे पहले आपके कानों में एक शब्द बहुत आता है और वह है सेंसर बोर्ड। तो चलिए जानते हैं कि क्या है सेंसर बोर्ड और क्या है फिल्म का सर्टिफिकेट पाने की प्रक्रिया।
Censor Board: फिल्म रिलीज के लिए क्यों जरूरी है सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट, जानिए क्या है इसकी पूरी प्रक्रिया
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क्या और क्यों होता है सेंसर बोर्ड
भारत के संविधान में सभी को अभिव्यक्ति की आजादी का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया है, लेकिन इसमें कई चीजों को विस्तार से भी बताया गया है, जो अभिव्यक्ति पर उचित प्रतिबंध की भी बात करता है। यही चीज फिल्मों पर भी लागू होती है, क्योंकि सिनेमा मास मीडिया का एक व्यापक माध्यम है, जिसके द्वारा देश से लेकर विदेश तक के लोगों तक विचारों, कहानी, कल्पनाओं का संचार होता है। ऐसे में सिनेमा पर कुछ भी प्रसारित करने से पहले बेहद सावधानी बरतनी आवश्यक होती है। फिल्म में क्या दिखाया जाए और क्या नहीं। यह तय करने के लिए एक संस्था बनाई गई है, जिसको कहा जाता है, सीबीएफसी या सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन। छोटे शब्दों में इसे ही सेंसर बोर्ड कहा जाता है। यानी यह कहना गलत नहीं होगा कि एक फिल्म निर्माता की सारी मेहनत एक संस्था के हाथ में होती है।
सेंसर बोर्ड का क्या होता है काम
सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन यानी सेंसर बोर्ड को इस बात पर खास ध्यान देना होता है कि किसी फिल्म में संवाद या फिर किसी दृश्य के द्वारा कोई भी ऐसा संदेश लोगों तक न पहुंचे जिससे धार्मिक उन्माद भड़क सकता हो, देश की शांति भंग हो या फिर किसी दृश्य से कोई विचलित हो सकता हो। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन एक वैधानिक संस्था है, जो सूचना प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आती है। सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति भी केंद्र सरकार के द्वारा की जाती है। हर फिल्म निर्माता के लिए यह जरूरी होती है कि वह रिलीज से पहले सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट प्राप्त करे।
कहां स्थित है सेंसर बोर्ड
मुंबई में व्हाइट हाउस नामक इमारत में सालों से सेंसर बोर्ड का ऑफ़िस है जो देखने में तो एक आम सरकारी ऑफ़िस की तरह ही लगता है, लेकिन यही वो जगह है जहां बड़े-बड़े फिल्म मेकर्स भी अपनी फिल्मों को सर्टिफिकेट दिलाने के लिए चक्कर काटते हैं। इसके अलावा तिरुवनंतपुरम, हैदराबाद, कटक, कोलकाता, चेन्नई, बैंगलोर और गुवाहाटी में भी सेंसर बोर्ड के कार्यालय मौजूद हैं।
फिल्म सर्टिफिकेशन का समय
किसी भी फिल्म के सर्टिफिकेट के लिए पूरी प्रक्रिया का पालन करना होता है। इसके लिए सबसे पहले आवेदन किया जाता है, जिसकी जांच में तकरीबन एक सप्ताह का समय लग सकता है, इसके बाद फिल्म को जांच समिति के पास भेजा जाता है, जहां 15 दिनों के बाद इसे सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष के पास भेज दिया जाता है। फिल्म को देखने और जांच करने में तकरीबन दस दिनों का समय लग सकता है और इसके बाद सेंसर बोर्ड के द्वारा फिल्म निर्माता को दृश्यों और संवादों में की गई काट-छांट के बारे में जानकारी दी जाती है। इस प्रक्रिया में भी तकरीबन 30 से 35 दिनों का समय जा सकता है और इस तरह से एक फिल्म को पास करवाने के लिए 68 दिन लग सकते हैं। हालांकि कई बार यह प्रक्रिया कम दिनों की भी हो सकती है।