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'जरूरत हुई तो इसे मुफ्त में वेब पर दे दूंगा'; वसीम अमरोही ने डेब्यू फिल्म ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ को लेकर कहा

Kiran Jain किरण जैन
Updated Sat, 17 Jan 2026 12:49 PM IST
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सार

Udham Singh Biopic Returns: दिग्गज फिल्मकार कमाल अमरोही के नाती वसीम अमरोही अब अभिनय की दुनिया में कदम रखने जा रहे हैं। आगामी फिल्म 'राम मोहम्मद सिंह आजाद' के साथ वसीम एक्टिंग डेब्यू कर रहे हैं। यह फिल्म शहीद उधम सिंह की बायोपिक है, जिसमें उनके जीवन के उस अनदेखे संघर्ष को दिखाने की कोशिश की गई है, जो अब तक परदे पर नहीं आ पाया।

Udham Singh Biopic Returns: Kamal Amrohi Grandson Waseem Amrohi talks about his Movie Ram Mohammad Singh Azad
वसीम अमरोही - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इससे पहले भी सरदार उधम सिंह की बायोपिक बन चुकी है, जिसे शूजित सिरकार ने निर्देशित किया था और जिसमें विक्की कौशल ने अहम भूमिका निभाई थी। उस फिल्म को ऑडियंस और क्रिटिक्स से सराहना मिली थी। अब अपनी फिल्म को लेकर वसीम क्या अलग दिखाना चाहते हैं और क्यों वह कहते हैं कि उधम सिंह को सिर्फ एक गोली या बदले से नहीं परिभाषित किया जा सकता। इन सभी टॉपिक्स पर वसीम ने अमर उजाला से खुलकर बातचीत की। पढ़िए प्रमुख अंश

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Udham Singh Biopic Returns: Kamal Amrohi Grandson Waseem Amrohi talks about his Movie Ram Mohammad Singh Azad
वसीम अमरोही - फोटो : इंस्टाग्राम

‘एक्टिंग मेरा प्लान नहीं थी, लेकिन कहानी ने मुझे सामने ला खड़ा किया’
सच कहूं तो एक्टिंग कभी मेरा लक्ष्य नहीं थी। मेरा फोकस हमेशा डायरेक्शन पर रहा। लेकिन फिल्म की तैयारी के दौरान हालात ऐसे बने कि यह स्वाभाविक रूप से हो गया। वर्कशॉप के दौरान ट्रेनिंग चल रही थी। एक बड़े स्टार को लेने की कोशिश हुई, लेकिन डेट्स नहीं मिल पाईं। इसी बीच कास्टिंग और रिहर्सल जारी रही। तभी मेरे मेंटर ने मेरा काम और लुक देखकर कहा कि किसी बड़े स्टार के पीछे मत भागो, यह किरदार तुम्हारे लिए ही है। इसके बाद लुक टेस्ट और ऑडिशन हुआ और तय हो गया कि फिल्म का मुख्य किरदार मैं निभाऊंगा। राहत की बात यह रही कि सब कुछ नेचुरल तरीके से क्लिक कर गया। टीम को काम पसंद आ रहा है और जिन लोगों ने फिल्म की झलक देखी है, उनकी प्रतिक्रिया भी काफी पॉजिटिव रही है।

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Udham Singh Biopic Returns: Kamal Amrohi Grandson Waseem Amrohi talks about his Movie Ram Mohammad Singh Azad
वसीम अमरोही - फोटो : इंस्टाग्राम

‘उधम सिंह को सिर्फ एक गोली से परिभाषित नहीं किया जा सकता’
सरदार उधम सिंह पर पहले भी फिल्में बन चुकी हैं। मैंने खुद 'सरदार उधम' कई बार देखी है। विक्की कौशल शानदार अभिनेता हैं और शूजित सरकार के लिए मेरे मन में पूरा सम्मान है। मेरा उनसे कोई मुकाबला नहीं है। लेकिन मुझे लगा कि उस बायोपिक में उधम सिंह की पूरी जर्नी सामने नहीं आ पाई। उन्हें सिर्फ खून और बदले से नहीं समझा जा सकता। उनकी जिंदगी एक घटना नहीं, बल्कि 40 साल का तप और संघर्ष थी। 1899 में जन्म, बचपन में मां का निधन, छह साल में पिता को खोना और 17 साल की उम्र में इकलौते भाई की मौत। इसके बाद अनाथ आश्रम, जहां उनका नाम शेर सिंह रखा गया। बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अंग्रेजों के साथ फर्स्ट वर्ल्ड वॉर में बगदाद रेजिमेंट के साथ लड़ाई लड़ी। जीत के बाद लौटकर उन्होंने समझ लिया कि यह हुकूमत सिर्फ बंदूक की भाषा समझती है।
 

 

 

 

 

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‘जलियांवाला बाग ने बदले की नहीं, संकल्प की नींव रखी’
फिर आया जलियांवाला बाग। वहां की खून से सनी मिट्टी हाथ में लेकर उधम सिंह ने कसम खाई कि माइकल ओ’डायर से बदला लिया जाएगा। उस बदले को अंजाम तक पहुंचाने में उन्हें पूरे 40 साल लग गए। इस बीच उन्होंने गदर पार्टी को जॉइन किया। भगत सिंह और उनके साथियों को फंड और हथियार दिए। उनकी जिंदगी के ये 30 से 34 साल ऐसे हैं, जो पहले कभी परदे पर ठीक से नहीं दिखाए गए। हमारी फिल्म उसी अनदेखे दौर को सामने लाती है। फिल्म का पहला हिस्सा 1919 से 1927 के बीच की कहानी कहता है। इसमें यह भी दिखाया गया है कि कैसे अंदर के गद्दारों ने आजादी की लड़ाई को नुकसान पहुंचाया। यही फिल्म की मूल थीम है। राम मोहम्मद सिंह आजाद सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक विचार है।

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वसीम अमरोही - फोटो : इंस्टाग्राम

‘यह टाइटल मार्केटिंग नहीं, इतिहास है ..  मुझे इस पर धमकियां भी मिलीं'
'राम मोहम्मद सिंह आजाद' कोई रणनीति नहीं, इतिहास है। 1940 में इंग्लैंड में माइकल ओ’डायर को गोली मारने के बाद जेल में रहते हुए उधम सिंह ने यह नाम अपने हाथ पर टैटू के रूप में लिखवाया था। उनका कहना था कि यही उनका देश है और यही देश की एकता का प्रतीक है। डिवाइड एंड रूल की नीति को खत्म करना ही उनका मकसद था। आज इस नाम पर सवाल उठते हैं और मुझे धमकियां भी मिलीं। सोशल मीडिया पर टिप्पणियां हुईं। लेकिन यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्य है, जो विकिपीडिया समेत 200 से ज्यादा स्रोतों में दर्ज है। शुरू से तय था कि फिल्म का नाम यही रहेगा, चाहे इसके लिए कितनी भी लड़ाईयां क्यों न लड़नी पड़ें।

'एक फिल्म 40 से 50 करोड़ में बनती है' 
मेरा बैकग्राउंड ऐसा रहा है, जहां परिवार ऑडियंस से फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा रहा है। 2014 से 2018 के बीच मैंने एक प्रतिष्ठित एंटरटेनमेंट कंपनी के साथ काम किया और नीरजा, सुल्तान, बजरंगी भाईजान, रईस और पद्मावत जैसी फिल्मों की मार्केटिंग का हिस्सा रहा। इस सफर ने मुझे सिखाया कि हिंदुस्तान में आखिरकार वही फिल्म चलती है, जिसकी कहानी मजबूत होती है। आज उधम सिंह पर एक फिल्म 40–50 करोड़ में बनती है, लेकिन वही कहानी 10–15 प्रतिशत बजट में भी कही जा सकती है। हमने कम बजट में पीरियड फिल्म इसलिए बनाई, क्योंकि फोकस सिर्फ स्टोरी और स्क्रिप्ट पर था। दुबई से लौटते वक्त साफ था कि लव स्टोरी नहीं, एक मेहनत वाली देशभक्ति की फिल्म बनानी है।

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वसीम अमरोही - फोटो : इंस्टाग्राम

'जरूरत पड़ी तो मैं इस फिल्म को मुफ्त में भी वेब पर दे दूंगा'
इस फिल्म की रिसर्च आसान नहीं थी। छह से आठ महीने तक हमने सिर्फ पढ़ा और समझा। इसी दौरान भगत सिंह की हैंडराइटिंग में लिखे पत्र मिले। एक पत्र आज भी रोंगटे खड़े कर देता है, जिसमें फांसी से एक रात पहले वह अपनी मां से कहते हैं कि मेरी लाश लेने मत आना, लोग कहेंगे भगत सिंह की मां रो रही है। मेरे लिए यही असली देशभक्ति है। इसी सोच के साथ यह फिल्म बनाई गई है। यह पैसा कमाने के लिए नहीं है। जरूरत पड़ी तो इसे मुफ्त में भी वेब पर दे दूंगा। मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि यह फिल्म गांव-कस्बों तक पहुंचे, उन बच्चों तक पहुंचे, जिनकी आज भी सिनेमा तक पहुंच नहीं है। कमाई से ज्यादा जरूरी है कि लोग समझें, बलिदान और देशभक्ति का मतलब क्या होता है।

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