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Hindi News ›   Entertainment ›   Movie Reviews ›   Bastar The Naxal Story Review by Pankaj Shukla Adah Sharma Indira Tiwari Vijay Krishna Sudipto Sen Vipul Shah

Bastar The Naxal Story Review: तिरंगा उतारने वालों के नकाब उतारती फिल्म, इंदिरा और अदा की शानदार अदाकारी

Fri, 15 Mar 2024 10:00 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Fri, 15 Mar 2024 10:00 AM IST
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Bastar The Naxal Story Review by Pankaj Shukla Adah Sharma Indira Tiwari Vijay Krishna Sudipto Sen Vipul Shah
बस्तर द नक्सल स्टोरी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
Movie Review
बस्तर द नक्सल स्टोरी
कलाकार
अदा शर्मा , इंदिरा तिवारी , विजय कृष्ण , शिल्पा शुक्ला , यशपाल शर्मा और राइमा सेन
लेखक
अमरनाथ झा , सुदीप्तो सेन और विपुल अमृतलाल शाह
निर्देशक
सुदीप्तो सेन
निर्माता
विपुल अमृतलाल शाह
रेटिंग
3/5

छत्तीसगढ़ के मशहूर चित्रकूट झरने का आकर्षण कोई 15 साल पहले मुझे बस्तर, दंतेवाड़ा और जगदलपुर की तरफ ले गया। रायपुर के दक्षिण के ये इलाके विकास से मीलों दूर हैं, लेकिन इसी इलाके में बनी लोहे की खदानों में लगे लौह अयस्क के पहाड़ों को देखकर ये तो समझ आया था कि इन इलाकों में नक्सल समस्या कुछ वास्तविक है और कुछ कॉरपोरेट घरानों की बनाई हुई। चंद बड़े घराने दूसरे घरानों को इन इलाकों मे कारोबार के लिए आने नहीं देना चाहते। इलाके के आदिवासी अपनी जर, जमीन और जंगल को सीने से लगाए हैं। यहीं अबूझमाड़ है। इसे लेकर इतनी किंवदंतियां हैं कि कायदे की एक्शन थ्रिलर बन सकती है। विपुल शाह से यहां की  भौगोलिक संरचना पर लंबी चर्चाएं हुईं। लेकिन, इन चर्चाओं की तह में एक ऐसी कहानी पनप रही है जिसके निशाने पर पूरा का पूरा ‘लेफ्ट’ होगा और जो कहानी दंडकारण्य के जंगलों में सक्रिय नक्सलियों का नाता आईएसआईएस, लश्कर ए तोइबा, लिट्टे और दुनिया के दूसरे आतंकवादी संगठनों से दिखाएगी, ये सोचना भी दूर की कौड़ी लाने जैसा ही रहा।

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बस्तर द नक्सल स्टोरी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

‘द केरल स्टोरी’ की तिकड़ी में नई एंट्री

फिल्म ‘बस्तर द नक्सल स्टोरी’ इतिहास को नए सिरे से लिखने की एक और कोशिश है। अपनी पिछली फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ में निर्माता विपुल शाह और निर्देशक सुदीप्तो सेन ने लव जिहाद की निशाने पर आईं कुछ हिंदू युवतियों की केस स्टडी लेकर एक धमाकेदार फिल्म बनाई थी। फिल्म में अदा शर्मा के साथ साथ बाकी अभिनेत्रियों की अदाकारी ने रंग जमाया और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार कमाई की। इस बार भी तीनों ने मिलकर फिर कुछ ऐसा ही रचने की कोशिश की है, लेकिन इस बार पूरी कहानी की धुरी सिर्फ एक केस स्टडी पर टिकी है और इस बार अदा शर्मा पीड़ित भी नहीं हैं। कहानी चूंकि आदिवासियों के उत्पीड़न की है सो इस बार कहानी के केंद्र में इंदिरा तिवारी हैं। इंदिरा भोपाल से हैं। मध्य भारत की युवतियों सी उनकी कद काठी है। और, कहानी के मुख्य किरदार रत्ना कश्यप से उनका साम्य भी ठीक बैठा है। रत्ना, उसके पति और दो बच्चों रमन और रमा की इस कहानी में आईपीएस नीरजा माधवन का किरदार आता जाता रहता है। सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे एक मुकदमे की तरह।

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बस्तर द नक्सल स्टोरी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

एंड क्रेडिट्स में फिल्म का उद्देश्य

‘द केरल स्टोरी’ और ‘बस्तर द नक्सल स्टोरी’ दोनों फिल्मों का उद्देश्य एक सा है। पहला, देश के गणतंत्र बनने के बाद एक खास सियासी दल की सरकार के दौरान उपद्रवियों के हौसले बुलंद होते दिखना। और दूसरा, बीते कुछ साल में इन उपद्रवियों के दमन के लिए की गई कोशिशों का महिमामंडन करना। फिल्म ‘बस्तर द नक्सल स्टोरी’ अपने उपसंहार के बाद बताती है कि बीते पांच साल में बस्तर के पर्यटन में 80 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। हालांकि, सच ये भी है कि खुद इस फिल्म की शूटिंग बस्तर में न होकर निर्देशक सुदीप्तो सेन के मुताबिक महाराष्ट्र के जंगलों में हुई है। फिल्म के मुहूर्त पर इसमें अदा शर्मा का किरदार नीरजा माथुर था, रिलीज होते होते ये नीरजा माधवन हो गया। माथुर और माधवन को लेकर फिल्म बनाने वालों का जो अंतर्द्वद्व रहा है, वही इस फिल्म की पूरी मेकिंग में नजर आता है। फिल्म समीक्षकों से पहले फिल्म को इन्फ्लुएंसर्स को दिखाने में भी यही दुविधा शायद रही होगी।

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बस्तर द नक्सल स्टोरी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

कमजोर पटकथा ने चौराहे पर पटकी कहानी

फिल्म में अदा शर्मा और इंदिरा तिवारी दोनों ने जबर्दस्त अभिनय किया है, लेकिन फिल्म की एक साथ चार राहों से आगे बढ़ती पटकथा इनके अभिनय के असर को कमजोर करती है। सर्वोच्च न्यायालय में एक आईपीएस अफसर को निलंबित कराने और दो सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कराने की कहानी के बीच में किस्सा आता है रत्ना के पति को तिरंगा फहराने पर क्रूरता से मार दिए जाने का। नक्सलियों से मिलने दुनिया भर के आतंकी संगठनों के लोग बस्तर तक पहुंच जाते हैं। फर्जी समाजसेवियों के खिलाफ नक्सलियों की मदद के सबूत बस्तर से दिल्ली तक नहीं पहुंच पाते हैं। आईपीएस माधवन गर्भवती है। रत्ना सलवा जुडूम में शामिल हो चुकी है और उसका बेटा नक्सलियों के गिरोह में। एक अच्छी कहानी पर ढंग से पटकथा लिखी गई होती तो ये फिल्म सूचनात्मक होने के साथ साथ भावनात्मक रूप से असरदार भी हो सकती थी। फिल्म की मुख्य कमजोरी इसकी तेजी से भागती पटकथा है और उसमें भी सूचनाओं का जरूरत से ज्यादा समावेश। फिल्म दिखाती कम है, बताती ज्यादा है। हिंसा का अतिरेक भी कहीं कहीं अनावश्यक लगता है, जैसे जलती आग में एक बच्चे को फेंका जाना।

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Bastar The Naxal Story Review by Pankaj Shukla Adah Sharma Indira Tiwari Vijay Krishna Sudipto Sen Vipul Shah
बस्तर द नक्सल स्टोरी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अदा शर्मा की बेहतरीन अदाकारी

फिल्म ‘बस्तर द नक्सल स्टोरी’ मुख्य रूप से इसकी दोनों मुख्य अभिनेत्रियों अदा शर्मा और इंदिरा तिवारी की वजह से देखने लायक बन पड़ी है। अदा शर्मा का किरदार छत्तीसगढ़ में तैनात रहे एक पुरुष आईपीएस अधिकारी से प्रेरित है। कांग्रेस शासनकाल में हुए उसके उत्पीड़न की कहानी अदा शर्मा के इस किरदार के जरिये परदे पर उतारी गई है। पी चिदंबरम जैसे दिखते एक कलाकार से इस आईपीएस को गालियां भी खूब दिलवाई गई हैं। अदा शर्मा के गर्भवती होने की बात एक बार जीना चढ़ते समय रुकने के बाद पटकथा में और कहीं डालना इसके लेखक शायद भूल गए। फौरी तौर पर इसके संदर्भ आते रहते हैं, लेकिन इसे लेकर जो इमोशनल टेम्पो बनना चाहिए था, वह नहीं बनता। इसके बावजूद अदा ने अपने किरदार को बखूबी जिया है और अपने लिए लिखे गए संवादों में भी धार कायम रखी है।

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इंदिरा तिवारी फिल्म की असल हीरोइन

लेकिन, जो विलेन को मारे वही हीरो या हीरोइन वाले फॉर्मूले से देखें तो फिल्म की मुख्य नायिका इंदिरा तिवारी हैं। इंदिरा ने इस किरदार के लिए अपना वजन बढ़ाया और इस किरदार में खुद को रंगने के लिए मेहनत भी काफी की है। लेकिन, अदा और इंदिरा दोनों के भावनात्मक दृश्य फिल्म में कमजोर हो गए हैं। माधवन का अपना बच्चा खोना फिल्म का टेंट पोल प्वाइंट हो सकता था, और रत्ना व उसके बेटे का एक दूसरे पर बंदूक ताने मिलने वाला दृश्य भी फिल्म का सबसे तगड़ा भावनात्मक दृश्य हो सकता था। लंका रेड्डी को मारने वाले दृश्य में वीभत्सता है लेकिन इंदिरा के चेहरे के क्लोज अप में उसका गुस्सा और उसका प्रतिशोध भी होता तो असर कुछ और दिखता। इंदिरा के लिए हिंदी सिनेमा में अब आगे बहुत अवसर आने वाले हैं, बस उनको अपने किरदार चुनने में अब यहां से काफी सावधानी बरतनी होगी।

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कहां कहां चूकी फिल्म..!

फिल्म ‘बस्तर द नक्सल स्टोरी’ के बाकी कलाकारों में शिल्पा शुक्ला और यशपाल शर्मा ने वकीलों के अपने किरदारों में प्रभावशाली अभिनय किया है। रायमा सेन का अभिनय बेअसर रहा। सुब्रत दत्ता, अनग्ना बिस्वास, किशोर कदम सबके किरदारों की पृष्ठभूमि रची जा सकती थी। जंगलों की सिनेमैटोग्राफी में कोई विस्मयकारी प्रयोग भी इसके सिनेमैटोग्राफर रागुल धारूमन ने नहीं किया, जबकि इसके मौके उनके पास तमाम रहे। फिल्म का संपादन भी दोषरहित नहीं है। ‘वंदे वीरम’ इसके गीत संगीत का हाई प्वाइंट है। अमर नाथ झा ने एक अच्छी कहानी के साथ इसके गीत भी कहानी के हिसाब से अच्छे लिखे हैं। विशाख ज्योति ने फिल्म को संगीत के लिहाज से अच्छा सहारा दिया, हालांकि बैकग्राउंड म्यूजिक इसका काफी लाउड है। कई सारी घटनाओं को एक ही टाइमलाइन में समेटकर बना दी गई इस फिल्म में चौंकाने वाली बात यही है कि देश में कश्मीर के अलावा भी ऐसा कोई हिस्सा अब भी है जहां तिरंगा फहराना इतना कठिन है। और, अगर ऐसा है तो वहां सीआरपीएफ तो क्या भारतीय सेना भी लगा देना अनुचित नहीं ठहराया जा सकता!

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