Evil Dead Burn Review: पहला हाफ डरावना पर दूसरे हाफ में मेकर्स कर बैठे गलती; पढ़ें ‘ईविल डेड बर्न’ का रिव्यू
Evil Dead Burn Movie Review in hindi: हॉलीवुड की एक और हॉरर फिल्म इस हफ्ते भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई है। अगर आपने अब तक यह फिल्म नहीं देखी तो यह रिव्यू आपके लिए ही है। जानें, कैसी है यह फिल्म?
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विस्तार
हॉरर फिल्में देखते से पहले हम बस यही उम्मीद करते हैं कि फिल्म में ऐसे दृश्य हों जिनको देखकर हमें डर महसूस हो। फिर साथ में एक ऐसी कहानी मिल जाए जिसका कोई मकसद समझ आए तो और भी अच्छा।
हालिया रिलीज फिल्म ‘ईविल डेड बर्न’ आपको यह दोनाें ही चीजें थाली में परोसकर देती है पर यह आपको वो खाना खाने नहीं देती। फिल्म में सबकुछ है फिर भी एक जगह आकर इसका स्क्रीनप्ले भटक जाता है और सेकंड हाफ में यह हॉरर से ज्यादा सर्वाइवल फिल्म लगने लगती है।
कहानी
कहानी एलिस प्राइस (सौहेला याकूब) की है जिसके पति विलियम प्राइस (जॉर्ज पुलर) की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो जाती है। पति की मौत के बाद एलिस अपने ससुराल को एकजुट करने के लिए उनके साथ रहने पहुंचती है और पहली रात अजीबोगरीब घटनाएं होना शुरू हो जाती हैं। विलियम का पूरा परिवार बुरी आत्माओं के वश में आ जाता है और फिर शुरू होता है खूनी खेल।
अभिनय
अभिनय सभी का कमाल है। सौहेला याकूब से लेकर टंडी राइट तक सभी ने अपने-अपने किरदारों से खूब डराया है। हंटर डूहन का किरदार थोड़ा कमजोर है पर उन्होंने इसे अच्छे से ही निभाया। सबसे ताकतवर एरल शांड बने हैं और वो ही सबसे ज्यादा डराते भी हैं। नानी के रोल में मॉड डेवी फिल्म में थोड़ा फन एलीमेंट लाती हैं।
निर्देशन
सेबेस्टियन विनचेक ने इस फिल्म का निर्देशन किया है। फिल्म की शुरुआत अच्छी है और 10 मिनट में ही इसकी कहानी और प्रेजेंटेशन आपको बांधना शुरू कर देते है। पहले हाफ में जब कहानी आगे बढ़ रही होती है तो इसे देखते देखते आपको डर भी महसूस होता है। कई ऐसे दृश्य हैं जो आपको आंखें बंद करने पर भी मजबूर करते हैं।
हालांकि, सेकंड हाफ तक आते-आते यह फिल्म कम डरावनी हो जाती है। कलाकारों के साथ-साथ आप भी इंतजार करने लगते हैं कि अब तो बुरी आत्माएं नष्ट हो जाएं। क्लाइमैक्स तब आते-आते यह सर्वाइवल स्टोरी ज्यादा लगने लगती है। बस यही इसकी कमजोरी है।
सेबेस्टियन ने जिस डर और माहौल के साथ फिल्म शुरू की थी वो उसे अंत तक नहीं खींच पाते। इसकी बड़ी वजह कहानी भी है, जाे सिर्फ एक घर में मौजूद छह लोगों के बीच ही सेट है। ऐसे में जब सेकंड हाफ में मेकर्स काटना-पीटना और खून-खराबा दिखाते हैं उससे डर नहीं लगता बल्कि घिनापन ज्यादा लगता है।
क्या अच्छा?
- कहानी आपको बांधकर रखती है।
- पहले हाफ के हॉरर सीन और कुछ वन टेक सीन भी काफी जबरदस्त हैं।
- कलाकारों का अभिनय जो आपको डरने पर मजबूर करता है।
- सेट और बाकी पूरा माहौल भी हॉरर एलीमेंट फील करवाता है।
क्या बुरा?
- सेकंड हाफ के बाद कहानी से हॉरर गायब हो जाता है।
- डराने से ज्यादा मेकर्स खून-खराबे और घिनापन से मूड खराब कर देते हैं।
देखें या नहीं?
हॉरर फिल्मों के शौकीन इसे जरूर थिएटर्स में देख सकते हैं। फिल्म में खून-खराबा हद से ज्यादा है इसलिए बच्चों को ना दिखाएं। स्क्रीन पर किसी को बॉडी पार्ट्स खाते हुए देखने की हिम्मत हो तो ही यह फिल्म देखें।