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इश्क इन पेरिसः प्रीति ने सिर्फ खुद के लिए बनायी फिल्म
रोहित मिश्र
Updated Sat, 25 May 2013 11:54 AM IST
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38 बरस की प्रीती जिंटा 'इश्क इन पेरिस' की सब कुछ हैं। सब कुछ मतलब वह घोषित तौर पर फिल्म की हीरोईन और प्रोड्यूसर तो हैं ही लेकिन बैक डोर से वह फिल्म की नायक और निर्देशक भी हैं। फिल्म के डायलॉग लिखने से लेकर उसके बेचने तक का जिम्मा भी प्रीति पर ही था।
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प्रीती ने यह फिल्म शायद इसलिए बनायी है कि उन्हें और उनके फैंस को यह याद रखने में सहूलियत हो कि वह अंतिम बार एक एक्ट्रेस के तौर पर कब दिखी थीं। गाने कैसे गाए थे और रोमांस कैसे किया था। इस फिल्म से दरअसल प्रीति ने खुद का महिमामंडन ही किया है।
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अब बात फिल्म पर। हम यह मानकर चलते हैं कि 15 साल फिल्मों में बिताने के बाद प्रीति जिंटा यह बात तो समझ ही गयी होंगी कि अच्छी फिल्म दरअसल बनती कैसी है। पर सभी गलत साबित होते हैं। प्रीति जिंटा की यह फिल्म इतनी फिल्मी और घिसीपिटी है कि दर्शक फिल्म को कहीं से भी ज्वाइन करे उसे इस बात का आइडिया हो जाएगा कि फिल्म में पहले क्या हुआ होगा और फिल्म क्लाइमेक्स में यह किस तरह के इमोशनल अत्याचार होंगे।
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लंबे अरसे से टलती आयी प्रीति की यह फिल्म कहानी और पटकथा में कुछ इस कदर ढीली और सुस्त है कि लगता है कि हम दसियों बार देखे गए किसी प्ले को उसी कुर्सी में बैठकर ग्यारहवीं बार फिर से देख रहे हैं बस प्ले के एक्टर बदल गए हैं।
कहानी इश्क और पेरिस की
यह कहानी पेरिस में मिले दो अजनबियों इश्क (प्रीति जिंटा) और करन (रेहान मलिक) की है। करन की सुबह दस बजे लंदन के लिए ट्रेन है। बातों ही बातों इश्क और करन की दोस्ती हो जाती है। वह दोनों एक साथ रात बिताने का फैसला लेते हैं। पांसा उछाल-उछाल कर वह कभी पार्टी करते हैं तो कभी डिनर। उनके बीच एक तरह का समझौता होता है कि अलग होने के बाद वह दोबारा फिर नहीं मिलेंगे। पर ऐसा हो नहीं पाता।
एक दोस्त की शादी में पेरिस आया करन फिर से इश्क से मिलता है लेकिन इस बार उसे सच में इश्क हो जाता है। करन अपने इश्क का इजहार इश्क से करता है लेकिन इश्क उसे ठुकरा देती है। इसके पीछे इश्क की अपनी कहानी है। उस कहानी के तार बचकाने तरीके से इश्क के डैड से जोड़े जाते हैं जो उसकी मॉम को पेरिस में छोड़कर भारत लौट आते हैं। कहानी का जिस्ट यह कि उसे शादी से डर लगता है। फिल्म के क्लाइमेक्स में बहुत ही पूर्वानुमानित तरीके से इश्क की मॉम उन दोनों को मिला देती हैं।
प्रीति की ऐक्टिंग अच्छी, लुक कमजोर
प्रीति जिंटा एक अच्छी एक्टर हैं। चुलबुले रोल में वह जंचती हैं। पर उम्र भी कोई चीज होती है जनाब। प्रीति का चेहरा जब स्थिर होता है यानिकि जब वह बोल नहीं रही होती हैं, हंसने के साथ अदाएं नहीं दिखा रही होती हैं तब उनका चेहरा बूढ़ा दिखता है। रोने के कुछ दृश्यों में प्रीती हूबहू अपनी ही फिल्म 'कल हो न हो' के दृश्यों को कॉपी करती दिखती हैं।
टीवी के धारावाहिकों के अलावा कुछ फिल्मों में भी छिट-पुट नजर आए रेहान मलिक अपनी ऐक्टिंग से निराश नहीं करते। उनके चेहरे के हाव-भाव अच्छे हैं बस उन पर भारी-भरकम डायलॉग शूट नहीं करते। हल्के-फुल्के कॉमिक रोल में वह चल सकते हैं पर हीरो नहीं।
नाम दो-दो काम एक भी नहीं
फिल्म के निर्देशक प्रेम सोनी उर्फ प्रेम राज ने इस फिल्म के पहले 'मिस्टर और मिसेज खन्ना' फिल्म डायरेक्टर की थी। उस सुपर फ्लॉप फिल्म के बाद 'इश्क इन पेरिस' का निर्देशन यह दिखाता है कि प्रेम ने गलतियों से सबक नहीं सीखा है। प्रेम ने इस फिल्म की स्किप्ट प्रीती जिंटा के साथ मिलकर लिखी है।
तो प्रेम चाहें तो घटिया संवादों का श्रेय प्रीति को दे सकते हैं लेकिन उन दृश्यों का क्या जिनमें प्रीति बारिश से भीग रही होती हैं और ऊपर खुला-खुला नीला आकाश दिखायी देता है। और उन संवादों का क्या?
फिल्म के क्लाइमेक्स का एक संवाद देखिए। "तुम रो क्यों रही हो?, क्योंकि तुम जा रहे हो। तुम मत जाओ तुम्हारे बिना न तो पेरिस की गलियां अच्छी लगती हैं और न ही रातें" यह 'इश्क इन पेरिस' के क्लाइमेक्स के वह डायलॉग हैं जिसे लिख और फिल्माकर प्रेम उम्मींद कर रहे होंगे कि दर्शक इन्हें सुनकर रो देंगे।
गाने उतने बुरे नहीं
फिल्म के गाने फिल्म जितने बोर नहीं हैं। प्रसून जोशी का लिखा और सुनिधि चौहान का गाया हुआ गाना "इट्स आल एबाउट टूनाइट्स" सुनने में अच्छा लगता है। सलमान खान पर फिल्माया गया आयटम नंबर "कुड़िये दी कुर्ती" औसत है। सोनू निगम द्वारा गाये गए इस गाने के बोल थके हुए हैं। "जाने भी दे" और "संईयां" गाने औसत हैं।
क्यों देखें
प्रीती जिंटा को अंतिम बार फिल्मी पर्दे पर हीरो के साथ रोमांस करते हुए देखने के लिए।
क्यों न देंखें
अभी कुछ बताना बाकी भी है।