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Film Review: फोर्स 2 का एक्श्ान जाेरदार लेकिन कहानी फीकी
रवि बुले
Updated Fri, 18 Nov 2016 01:17 PM IST
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चीन को अक्सर शिकायत रही है कि भारतीय मीडिया उसे ‘दुश्मन जैसा’ दिखाने में बड़ी भूमिका निभाता है। फोर्स 2 भी इस मामले में खुल कर मैदान में है। आप पाते हैं कि भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के लोग चीन में जासूसी कर रहे हैं।
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मगर एक भारतीय ही चीनीयों को उनके नाम, पते, पहचान दे रहा है और वे एक-एक कर मारे जा रहे हैं। घर के भेदी को ढूंढने का काम एसीपी यशवर्द्धन (जॉन अब्राहम) और रॉ एजेंट केके (सोनाक्षी सिन्हा) को मिलता है। उन्हें पता चलता है कि हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में भारतीय दूतावास में काम करने वाला कोई कर्मचारी चीन को खबरें पहुंचा रहा है। कौन है वह और ऐसा क्यों कर रहा है? फोर्स 2 इसी सवाल का जवाब ढूंढती है।
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Film Review: एक्शन पैक से भरपूर है फोर्स 2 लेकिन कहानी फीकी
आप सोच सकते हैं कि गिनती के शब्दों में समाने वाले कथानक को पर्दे पर दो घंटे 20 मिनट से ज्यादा फैलाने में कितनी मेहनत लगी होगी। मेहनत फोर्स 2 में है लेकिन सिर्फ लंबे-लंबे ऐक्शन दृश्यों और तकनीक पर। लेखन कच्चा है। निर्देशक-लेखक के पास कहने-बताने को कुछ खास नहीं है। सैकड़ों फिल्मों में जो दृश्य आपने देखे होंगे, उन्हें ही रचा गया है।
हीरो-विलेन के बीच गलियों और मकानों की छतों पर लंबी रेस, एक कार का पीछा करती कई कारों की कतारें, गोलियों की तड् तड् तड्, हीरो के लात-घूंसों से पिटते दर्जनों हट्टे कट्टे लोग और बात कहने की तीस-चालीस साल पुराने ढंग की बॉलीवुड शैली।
गर आप ठंडी चाय जैसी इन बातों के फैन हों तो कड़की के दिनों पर फोर्स 2 में पैसा लगा सकते हैं। फिल्म के अंत को डायरेक्टर ने वीडियो पार्लरों के गोली-बंदूक और दुश्मन को ढूंढ-ढूंढ कर मारने वाले खेल में बदल दिया है। बिना हिस्सेदारी के इस ‘वीडियो’ में आप ऊब का चरम छू सकते हैं।
हीरो-विलेन के बीच गलियों और मकानों की छतों पर लंबी रेस, एक कार का पीछा करती कई कारों की कतारें, गोलियों की तड् तड् तड्, हीरो के लात-घूंसों से पिटते दर्जनों हट्टे कट्टे लोग और बात कहने की तीस-चालीस साल पुराने ढंग की बॉलीवुड शैली।
गर आप ठंडी चाय जैसी इन बातों के फैन हों तो कड़की के दिनों पर फोर्स 2 में पैसा लगा सकते हैं। फिल्म के अंत को डायरेक्टर ने वीडियो पार्लरों के गोली-बंदूक और दुश्मन को ढूंढ-ढूंढ कर मारने वाले खेल में बदल दिया है। बिना हिस्सेदारी के इस ‘वीडियो’ में आप ऊब का चरम छू सकते हैं।
Film Review: एक्शन पैक से भरपूर है फोर्स 2 लेकिन कहानी फीकी
रॉ एजेंट्स कैसे काम करते हैं? चीन में किन मिशन पर हैं? कितने कामयाब हैं? चीन इनसे कितना परेशान है? भारत के बारे में क्या सोचता है? हमारी सरकार इन एजेंट्स से मिल रही खबरों पर क्या कर रही है? इन पर फिल्म में कुछ नहीं है। स्क्रिप्ट में कच्चापन इतना है कि खलनायक (ताहिर राज भसीन) चीन को भारतीय एजेंट्स की खबरें क्यों दे रहा है, इंटरवेल से पहले ही दर्शक समझ जाता है।
यहां रही-सही दिलचस्पी खत्म हो जाती है। टीवी पर सीरीयल 24 डायरेक्ट करने वाले अभिनय देव ने फिल्म उसी अंदाज में बनाई है। जॉन के परफॉरमेंस में नयापन नहीं है। मारधाड़ के दृश्यों में वह मांसपेशियों का भरपूर प्रदर्शन करते हैं। सोनाक्षी में ऐक्शन दृश्यों के लिए जरूरी फिटनेस अकीरा के बाद यहां भी गायब है।
भिनय के मामले में दोनों कलाकार औसत हैं। फिल्म रोमांस शून्य है। होठों पर मुस्कान लाने वाली बातें भी यहां गायब हैं। गीत-संगीत नहीं जैसा है। जासूसी के बहाने थोड़ी देशभक्ति की बात जरूर है लेकिन वह भी ठोस ढंग से नहीं उभरती।
यहां रही-सही दिलचस्पी खत्म हो जाती है। टीवी पर सीरीयल 24 डायरेक्ट करने वाले अभिनय देव ने फिल्म उसी अंदाज में बनाई है। जॉन के परफॉरमेंस में नयापन नहीं है। मारधाड़ के दृश्यों में वह मांसपेशियों का भरपूर प्रदर्शन करते हैं। सोनाक्षी में ऐक्शन दृश्यों के लिए जरूरी फिटनेस अकीरा के बाद यहां भी गायब है।
भिनय के मामले में दोनों कलाकार औसत हैं। फिल्म रोमांस शून्य है। होठों पर मुस्कान लाने वाली बातें भी यहां गायब हैं। गीत-संगीत नहीं जैसा है। जासूसी के बहाने थोड़ी देशभक्ति की बात जरूर है लेकिन वह भी ठोस ढंग से नहीं उभरती।