Jawan Review: किसानों की आत्महत्या के मुद्दे पर बागी हुआ ‘जवान’, एक्शन, इमोशन और डायलॉगबाजी का नया उनवान
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फिल्म ‘जवान’ क्या है? तो सबसे पहले इसी पहले सवाल का जवाब और वह यह है कि ये फिल्म भारतीय सेना से लेकर देश के किसानों तक की बात करती है। सही नाम इस फिल्म का ‘जय जवान, जय किसान’ ही होना चाहिए था, लेकिन तब शायद ये एक सियासी फिल्म के तौर पर पहचानी जाती। फिल्म में सियासत की बातें भरपूर हैं और साथ ही शाहरुख के स्वैग का हर लड्डू मोतीचूर भी है। कहानी थोड़ी घुमावदार है और इसके हर मोड़ पर दर्शक तालियां पीटने को मजबूर दिखाई देते हैं। जेल में एक बच्चे का जन्म होता है। बच्चे को एक नई मां भी मिलती है। दिन जन्माष्टमी का है। कथा आज के वसुदेव-देवकी के बेटे सरीखी ही है। लेकिन, इस फिल्म में शाहरुख खान ने और भी बहुत कुछ कहा है जो देश की मौजूदा राजनीति पर एक सजग निर्माता, एक बेहतरीन निर्देशक और एक सुलझे हुए अभिनेता की टिप्पणियां भी हैं।
सामाजिक मुद्दों पर करारी चोट
शाहरुख खान अपनी अभिनय यात्रा में जब जब सामाजिक मुद्दों पर चोट करने वाले किरदार करते रहे हैं, लोगों ने उन्हें खूब पसंद किया है। उनकी शख्सियत में एक तरह की ईमानदारी दिखती है और इसी ईमानदारी के साथ जब वह किसी किरदार के जरिये परदे पर कुछ कहने की कोशिश करते हैं तो बात सीधे दिल तक जाती है। यहां वह उन किसानों की आत्महत्या की बात करते हैं जिन्हें चंद हजार रुपयों के लिए वही बैंक प्रताड़ित करते रहते हैं जो धनकुबेरों के लाखों करोड़ रुपये एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग असेट्स) बताकर भूल जाते रहते हैं। और, सिर्फ किसानों की ही नहीं बात यहां देश के सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा की भी है। और, ये दशा तब सुधरती है जब सूबे के स्वास्थ्य मंत्री को गोली लगने के बाद एक सरकारी अस्पताल में ऑपरेशन के लिए लाया जाता है। स्वास्थ्य और कृषि आम जनता से जुड़े सीधे मामले हैं और इसके अलावा एक और मामला देश में लगातार चर्चा में रहा है, वह सियासी दलों द्वारा चुनाव से ठीक पहले रेवड़ियां बांटने का। एक देश-एक चुनाव की चर्चाओं के बीच फिल्म ‘जवान’ मतदाताओं के लिए एक रिमाइंडर सरीखी फिल्म भी है।
बुड्ढा होगा तेरा बाप...!
ख़ैर, ये सब तो वह बातें है जो सिनेमा और समाज का नाता समझने वाले दर्शक विचारते रहेंगे। असल में फिल्म ‘जवान’ शाहरुख खान को बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ‘पठान’ से मिली जवानी के आगे की रवानी है। ये फिल्म उन्होंने क्यों की, इस बारे में वह खुलकर बता भी चुके हैं। एटली ने उन्हें जो कहानी फिल्म ‘जवान’ की सुनाई, उसका लब्बोलुआब यही था कि एक बंदा है जो ढेर सारी बंदियों के साथ परदे पर धमाल करता है, एक्शन करता है, गाने गाता है और धमाकेदार डायलॉग बोलता है, जैसे, ‘बेटे को हाथ लगाने से पहले बाप से बात कर!’ यहां दोनों का डीएनए एक है। बिल्कुल शाहरुख खान की असल जिंदगी की तरह। एक फौजी की कहानी में एक बेटे की घुट्टी मिलाकर एटली ने रोचक कहानी तैयार की है। बेटा बड़ा होता है तो एक बच्ची अपनी अनब्याही मां के पति से ज्यादा अपने लिए एक पापा तलाश करते करते उससे मिलती है। कानून की रखवाली और एक अपराधी का ये विवाह अपने साथ कुंडलियों की गड़बड़ियां भी लेकर आता है।
गोपियां, कन्हैया और बंदूकों की रासलीला
‘जवान’ एक मास एंटरटेनर फिल्म है। फिल्म में वे सारे तत्व हैं जिनके लिए मुंबइया सिनेमा अतीत में मशहूर रहा है। ये टिपिकल मसाला फिल्म है, बस इस पर मुलम्मा एक एक्शन फिल्म का चढ़ा है और इस चमक को देखकर फिल्म देखने आए दर्शकों को शाहरुख खान कुछ ऐसी बातें भी समझा जाते हैं जिन पर सोचने के लिए दर्शक कुछ पल ही सही पर ठहरते जरूर हैं। लोगों के खातों में पैसे भेजने की सियासत देश में बहुत पुरानी नहीं है। दो हजार के नोट की भी ऐसी ही कुछ कहानी है। और, ‘जवान’ की कहानी ऐसी है कि जेल में जन्मे कन्हैया के कारनामों से भी खूब सारी दही मक्खन पाती है। यहा गोपियां रास रचाने के लिए भी हैं और धर्मयुद्ध में साथ देने के लिए भी। बतौर लेखक-निर्देशक एटली ने कहानी के तार बहुत चतुराई से बुने हैं। फिल्म इसीलिए एक दो गानों को छोड़कर कहीं धीमी नहीं पड़ने पाती।
जश्न शाहरुख के नाम का
शाहरुख खान को परदे पर देखना इन दिनों एक अलग ही जश्न हो चुका है। जैसा कुछ कुछ दक्षिण भारत में रजनीकांत, विजय या दूसरे सितारों की फिल्मों की रिलीज के समय होता रहा है, वैसा बैंड बाजा अब शाहरुख की फिल्मों की रिलीज पर भी बजने लगा है। और, शाहरुख शोहरत के इस नए अध्याय का भरपूर मजा ले रहे हैं। उनका परदे पर चलने का अंदाज एक नई बदमाशी का मिश्रण पाकर अलग ही अंदाज पा चुका है। वह जमाने की फिक्र को धुएं में उड़ा देने वाला रीपैकेज्ड नायक है। बीती बातें उसे याद नहीं और जब याद आती हैं तो सामने वाले का समय बीतने लगता है। विजय सेतुपति हथियारों के कारोबारी हैं। इरादा उनका आने वाले चुनाव में उस पार्टी को जिताने का जो उनके कहे अनुसार अपनी नीतियां बनाए। अपने किरदार में उनका असर दिखता है। और, मौका मिलने पर वह हंसी के मौके भी ले आते हैं, जैसे क्लाइमेक्स में वह अपने गुर्गों से कहते हैं, ‘अरे, खत्म करो, नहीं तो अभी ये फिर गाना शुरू कर देंगे।’
दीपिका की दमक के आगे सब फीके
फिल्म ‘जवान’ में महिला किरदारों की भरमार है। क्रेडिट्स में पहले महिला कलाकारों के नाम देने का चलन राज कपूर ने शुरू किया था। शाहरुख ने इस दौर में उसे आगे बढ़ाया है। इस टीम में नयनतारा को हीरोइन बनाकर प्रचारित तो किया गया लेकिन फिल्म की असल हीरोइन दरअसल दीपिका पादुकोण हैं। किरदार उनका सीमित है लेकिन असर असीमित। अखाड़े में अपने आशिक को चारों खाने चित करने वाली ऐश्वर्या के किरदार में दीपिका इतना दमदार तरीके से परदे पर दमकी हैं कि उनके आगे नयनतारा और बाकी लड़कियों की चमक फीकी लगने लगती है। खासतौर से मां बनने वाले दृश्यों की श्रृंखला में दीपिका का रूप, लावण्य, लालिमा और तेज सब देखने लायक भी है और रुला देने लायक भी। नयनतारा का काम फिल्म में बेलगाम नायक पर लगाम कसने का है। कोशिश भी उनकी बहुत अच्छी रही है। इसके चलते हिंदी पट्टी में उनको तमाम नए प्रशंसक भी मिलने वाले हैं।
…तो कुछ और बात होती!
कथा, पटकथा, निर्देशन और अभिनय के अलावा फिल्म ‘जवान’ की सिनेमैटोग्राफी और इसकी एडिटिंग भी किसी सितारे से कम नहीं हैं। जी के विष्णु ने फिल्म के एक्शन दृश्यों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कैमरा वर्क किया है। रुबेन ने एडिटिंग टेबल पर भी कम जंग नहीं लड़ी है और इसमें वह विजयी होकर ही निकले हैं। हां, शाहरुख और नयनतारा वाला गाना फिल्म के बीच में आकर कथा प्रवाह में बाधा जरूर बनता है। एटली चूंकि दक्षिण भारतीय फिल्म मेकर हैं लिहाजा संगीतकार भी उन्होंने अपने यहां का ही चुना है। वहां की भावनाओं के अनुसार अनिरुद्ध ने काम अच्छा किया है लेकिन इस फिल्म में अगर हिंदी भाषी क्षेत्रों के अनुसार संगीत रखा गया होता तो बात कुछ और होती!