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गोरखपुर: जटायु संरक्षण केंद्र में दो साल से चार मादा गिद्धों को जोड़े का इंतजार, सीजेडए की मंजूरी अटकी

Tue, 03 Nov 2026 09:31 AM IST
अनुराग रंजन शरद पाण्डेय, गोरखपुर
शरद पाण्डेय, गोरखपुर Published by: अनुराग रंजन Updated Tue, 03 Nov 2026 09:31 AM IST
सार

जटायु के बसेरे के पास ही वानिकी और उद्यानिकी विश्वविद्यालय बनने जा रहा है। इस नव निर्माण से जटायु के बसेरे में खलल न पड़े इसके लिए ध्वनि अवरोधक लगवाने का दावा वन विभाग के अधिकारी कर रहे हैं। इसके साथ ही विश्वविद्यालय परिसर में ग्रीन बेल्ट की तरफ के हिस्से में ग्रीन बेल्ट विकसित करने की योजना भी बनाई गई है।
 

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four Female Vultures Await Mates at Jatayu Conservation Centre
जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र, गोरखपुर - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

एशिया के पहले राजगिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र में चार मादा गिद्धों को दो साल में जोड़ा नहीं मिल सका है। विभाग के जिम्मेदार नए पक्षी लाने के लिए केंद्रीय चिडियाघर प्राधिकरण (सीजेडए) से अनुमति की जरूरत बता रहे हैं। पर्यावरणविद् आसपास के माहौल को लेकर चिंता जता रहे हैं।

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कैंपियरगंज क्षेत्र में साल 2024 में जटायु (लाल सिर वाले गिद्ध) संरक्षण और प्रजनन केंद्र का उद्घाटन हुआ था। केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. दुर्गेश नंदन के मुताविक जटायु सिर्फ एक के साथ ही जोड़ा बनाते हैं। जोड़े से बिछड़ने पर दूसरे के साथ नजदीकी नहीं बढ़ाते। इस लिहाज से बच्चे ही केंद्र में लाए गए ताकि उनका जोड़ा यहीं तैयार कराया जा सके और कुनबा बढ़ाने में आसानी हो। फरवरी 2025 तक चित्रकूट और ललितपुर के जंगलों से यहां आठ पक्षी लाए गए। इनमें दो नर और छह मादा जटायु शामिल हैं। इनमें चार पक्षियों को पक्षीशाला में जोड़े में रखा गया है। दोनों जोड़े अल्प वयस्क उम्र में हैं। वहीं, चार मादा पक्षी अलग-अलग पक्षीशाला में रखे गए हैं। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक वन्य जीव संरक्षण अधिनियम में बदलाव के बाद संरक्षण केंद्र में पक्षियों को रखने के लिए भी केंद्रीय चिड़ियाधर प्राधिकरण की अनुमति अनिवार्य कर दी गई है। मादा पक्षियों के लिए जोड़े लाने के लिए विभाग को प्राधिकरण से अनुमति मिलने का इंतजार है। इनके जोड़े आने के बाद ही कुनबा बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है।
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केंद्र के भविष्य को लेकर कई सवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि जटायु शांत स्वभाव के पक्षी होते हैं, इन्हें शांत वातावरण की आवश्यकता होती है। कैंपियरगंज में केंद्र गोरखपुर-सोनौली हाईवे के किनारे बना हुआ है। पास में ही कैंपियरगंज रेलवे स्टेशन है जहां से ट्रेनें गुजरती हैं। कैंपियरगंज कस्बा करीब होने से मानव जीवन की सामान्य चहलकदमी आसपास बनी रहती है। क्षेत्र में मोबाइल टावर हैं और गाहे-बगाहे डीजे का शोर पक्षियों को बेचैन करता है। जीव विज्ञान के विशेषज्ञों का कहना है कि पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद जरूरी जटायु की मेटाबॉलिज्म की दर ज्यादा होती है। ऐसे में मोबाइल टावर से निकलने वाली तरंगें इन्हें ज्यादा नुकसान पहुंचाती हैं। ये तरंगें इनके विकास और प्रजनन क्षमता को भी प्रभावित कर सकती हैं।
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जटायु के बसेरे के पास ही वानिकी और उद्यानिकी विश्वविद्यालय बनने जा रहा है। इस नव निर्माण से जटायु के बसेरे में खलल न पड़े इसके लिए ध्वनि अवरोधक लगवाने का दावा वन विभाग के अधिकारी कर रहे हैं। इसके साथ ही विश्वविद्यालय परिसर में ग्रीन बेल्ट की तरफ के हिस्से में ग्रीन बेल्ट विकसित करने की योजना भी बनाई गई है।
 

 
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किसी भी नई व्यवस्था के लिए विस्तृत अध्ययन जरूरी
गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डीके सिंह कहते हैं कि किस भी नई व्यवस्था के लिए विस्तृत अध्ययन जरूरी होता है। अपने यहां प्रायः इसकी अनदेखी होती है। किसी भी जीव के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए उचित माहौल बेहद जरूरी होता है। मोबाइल टावर से निकलने वाली तरंगें पक्षियों क सबसे ज्यादा प्रभावित कर रही हैं। इससे इनकी प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ रहा है। जटायु काफी बड़े आकार के पक्षी होते हैं, उन्हें अगर खुला माहौल मिले तो ज्यादा अच्छा विकास दिखेगा।
 

 

four Female Vultures Await Mates at Jatayu Conservation Centre
जटायु - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

पारसियों के अंतिम संस्कार में आ रही मुश्किल
बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान लखनऊ के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. चंद्र मोहन नौटियाल कहते हैं कि मौजूदा माहौल में जटायु का संरक्षण बड़ी चुनौती है। जटायु की घटती संख्या से बढ़ती मुश्किलों पर वह पारसी समुदाय के टावर ऑफ साइलेंस का जिक्र करते हैं। डॉ. नौटियाल कहते हैं कि पारसी समुदाय में किसी की मृत्यु के बाद पार्थिव शरीर टावर ऑफ एक्सीलेंस पर रख दिया जाता रहा है। जटायु उस शरीर को खत्म कर देते थे। इनकी तेजी से घटी तादाद ने पारसी समुदाय को मुश्किलों में डाल दिया है। ऐसे में और ज्यादा जटायु संरक्षण केंद्र शुरू किए जाने की आवश्यकता है।

वन्य जीव संरक्षण के नए नियमों के मुताबिक पक्षियों को किसी केंद्र में रखने के लिए सीजेडए की अनुमति जरूरी है। नए जटायु लाने के लिए सीजेडए में आवेदन किया गया है, मंजूरी का इंतजार है। वानिकी और औद्यानिकी विश्वविद्यालय से जटायु केंद्र में पक्षियों को दिक्कत न हो इसके लिए साउंड विश्वविद्यालय के लेआउट में भी जटायु केंद्र की तरफ के हिस्से में ग्रीन बैरियर लगाए जाएंगे। बेल्ट की योजना शामिल है। - शुभम सिंह, डीएफओ, गोरखपुर

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