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Gorakhpur News: नदी किनारे बेकाबू निर्माण बढ़ा रहा जोखिम
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गोरखपुर। नेपाल की आपदा ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते आपदा जोखिम की गंभीरता फिर सामने ला दी है। नदी किनारे बेकाबू निर्माण जोखिम को बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ता तापमान ग्लेशियर और पर्माफ्रॉस्ट को अस्थिर कर रहा है जिससे हिमस्खलन और अचानक बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग की अध्यक्ष डॉ. स्वर्णिमा सिंह के मुताबिक, ऐसी घटनाओं को केवल प्राकृतिक आपदा मानना पर्याप्त नहीं है। डॉ. सिंह ने कहा कि नेपाल और उत्तर भारत की नदियों को अलग-अलग देखकर बाढ़ का आकलन नहीं किया जा सकता। पहाड़ी कैचमेंट की बारिश का पानी धाराओं और सहायक नदियों से नीचे आता है। हालांकि नेपाल में आई हर बाढ़ का पानी सीधे राप्ती या रोहिन में पहुंचे, यह जरूरी नहीं है। इसका असर संबंधित जलग्रहण क्षेत्र और नदी तंत्र पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि राप्ती, रोहिन, कुआनो और छोटी धाराओं के साथ संबंधित कैचमेंट में बारिश, जलप्रवाह और अचानक बने अवरोधों पर नजर जरूरी है। केवल नदी का मौजूदा जलस्तर नहीं, बल्कि पानी बढ़ने की गति भी खतरे का संकेत देती है।
पहाड़ी क्षेत्रों में बारिश रुकने के बाद भी पानी सहायक नदियों से होकर मैदानी इलाकों में पहुंचता रहता है। कुछ घंटे बाद भी जलस्तर बढ़ सकता है। डॉ. सिंह ने कहा कि बाढ़ नियंत्रण, पूर्व चेतावनी और जीआईएस-रिमोट सेंसिंग से जोखिम पहचान में सुधार हुआ है, लेकिन प्राकृतिक जलनिकासी और नदी के फैलाव क्षेत्र में निर्माण नई चुनौती है। उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर, झील और भूस्खलन की निगरानी तथा मैदानी इलाकों में बाढ़ क्षेत्र में निर्माण नियंत्रित करने पर जोर दिया।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग की अध्यक्ष डॉ. स्वर्णिमा सिंह के मुताबिक, ऐसी घटनाओं को केवल प्राकृतिक आपदा मानना पर्याप्त नहीं है। डॉ. सिंह ने कहा कि नेपाल और उत्तर भारत की नदियों को अलग-अलग देखकर बाढ़ का आकलन नहीं किया जा सकता। पहाड़ी कैचमेंट की बारिश का पानी धाराओं और सहायक नदियों से नीचे आता है। हालांकि नेपाल में आई हर बाढ़ का पानी सीधे राप्ती या रोहिन में पहुंचे, यह जरूरी नहीं है। इसका असर संबंधित जलग्रहण क्षेत्र और नदी तंत्र पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि राप्ती, रोहिन, कुआनो और छोटी धाराओं के साथ संबंधित कैचमेंट में बारिश, जलप्रवाह और अचानक बने अवरोधों पर नजर जरूरी है। केवल नदी का मौजूदा जलस्तर नहीं, बल्कि पानी बढ़ने की गति भी खतरे का संकेत देती है।
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पहाड़ी क्षेत्रों में बारिश रुकने के बाद भी पानी सहायक नदियों से होकर मैदानी इलाकों में पहुंचता रहता है। कुछ घंटे बाद भी जलस्तर बढ़ सकता है। डॉ. सिंह ने कहा कि बाढ़ नियंत्रण, पूर्व चेतावनी और जीआईएस-रिमोट सेंसिंग से जोखिम पहचान में सुधार हुआ है, लेकिन प्राकृतिक जलनिकासी और नदी के फैलाव क्षेत्र में निर्माण नई चुनौती है। उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर, झील और भूस्खलन की निगरानी तथा मैदानी इलाकों में बाढ़ क्षेत्र में निर्माण नियंत्रित करने पर जोर दिया।
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