Ambala News: मौत से लड़ते-लड़ते टूट गई जिंदगी की लड़ी
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माई सिटी रिपोर्टर
अंबाला। 21 घंटे तक मौत से लड़ते-लड़ते आखिरकार बुधवार सुबह साढ़े तीन बजे धन्यौड़ा का निरवैर इस दुनिया से चला गया। वह अपने पीछे कुछ सबक, कुछ यादें छोड़ गया है। सबक जो सिस्टम को लेने हैं और यादें वो जो अब पूरे गांव व उसके परिजनों को ताउम्र साथ लेकर चलनी होंगी। 21 घंटे के इस बचाव अभियान में इस बार भी तमाम प्रयासों के बाद भी सिस्टम फिर से हारा है। हारा इसलिए क्योंकि वह न तो एक बच्चे की सुरक्षा को सुनिश्चित कर सका और न ही उसे बचाने में सही कौशल का प्रयोग किया गया।
अक्सर देखा जाता है कि अगर कोई ऐसी घटना होती है तो उसे बचाने की कोशिश में प्रशासन काफी देर लगा देता है। अगर समय से पहुंच भी जाए तो पता चलता है कि बचाव अभियान के लिए मशीनें ही नहीं हैं। निरवैर के मामले में ऐसा नहीं हुआ। यहां तो कौशल दक्षता की कमी के कारण 21 घंटे तक अभियान खिंच गया। दरअसल जिला प्रशासन को जैसे ही इस घटना की जानकारी लगी सुबह साढ़े 8 से 9 बजे तक को एसडीआरएफ, सेना, पुलिस, अग्निशमन विभाग की टीमें पहुंच चुकी थीं। हालात को देखते हुए जिला प्रशासन ने पंचकूला पिंजौर से एनडीआरएफ की टीम को भी बुला लिया। 20 सदस्यों से अधिक की यह टीम एक ट्रक भरकर अत्याधुनिक उपकरण से लैस होकर पहुंची थी।
सेना, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ ने मिलकर बनाई रणनीति
एनडीआरएफ, सेना और एसडीआरएफ की टीमों ने मिलकर मंगलवार सुबह रणनीति बनाई। अत्याधुनिक कैमरे और अन्य उपकरणों की मदद से काम लिया। मगर दिक्कत यह आई कि इस बोरवेल में पानी रिस रहा था जबकि ऐसे मामलों में अक्सर बंद पड़े बोरवेल में रेत आदि होती है। यहां जो भी रणनीतियां एनडीआरएफ की टीम ने लगाईं, उनमें से एक भी कामयाबी नहीं दिला सकी। यही कारण है कि शुरुआती तीन प्रयासों में विफलता मिलते-मिलते शाम के सात बज गए थे। यहां तक कि खोदाई से लेकर इस प्रकार के ऑपरेशन में प्रयोग होने वाली अन्य अत्याधुनिक मशीनों को भी मौके पर मंगा लिया गया था।
गुरिंदर को न बुलाते तो यह ऑपरेशन और देर तक खिंचता
पंजाब के संगरूर निवासी गुरिंदर सिंह न आते तो न जाने यह ऑपरेशन और कितनी देर चलता। इस ऑपरेशन में गुरिंदर ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने अपने कौशल के दम पर इस अभियान की सफलता को लिखा। उन्होंने मौके पर पहुंचकर दावा किया था कि उन्हें मौका दिया जा तो वह तीन से चार घंटे में निरवैर को बाहर निकाल देंगे। ठीक ऐसा ही हुआ। मौके पर तैनात प्रशासन के अधिकारी भी उनकी तरकीब को देखकर हैरान रह गए थे।
इन मौत के कुओं को बंद करा दो... ताकि कोई और न रोए : गुरप्रीत
निरवैर के ताऊ गुरप्रीत ने खुले बोरवेलों के खतरे पर रोष जताते हुए कहा कि बोरवेल चाहे किसी का भी हो, उसे इस तरह खुला छोड़ना लापरवाही है। इस लापरवाही की वजह से परिवार ने अपना सबसे बड़ा नुकसान झेला है। हम नहीं चाहते कि किसी और को इस नुकसान से गुजरना पड़े। इसका स्थायी समाधान हो यही हमारी प्रशासन से मांग है। अब बस एक ही बात कहता हूं कि किसान हों या प्रशासन हाथ जोड़कर विनती है कि यह मौत के बोरवेल बंद करा दें। मैं नहीं चाहता हूं किसी और को यह दर्द सहना पड़े। दादा करनैल सिंह ने बताया कि अगर मुझे पता होता कि यहां बोरवेल है तो मैं ही बच्चे को नहीं जाने देता। इस बोरवेल को बोरी से ढक रखा था।

धन्यौड़ा गांव में बोरवेल से निकले निरवैर के शव को एंबुलेंस में ले जाती हुई टीम: सोशल मीडिया- फोटो : Samvad

धन्यौड़ा गांव में बोरवेल से निकले निरवैर के शव को एंबुलेंस में ले जाती हुई टीम: सोशल मीडिया- फोटो : Samvad

धन्यौड़ा गांव में बोरवेल से निकले निरवैर के शव को एंबुलेंस में ले जाती हुई टीम: सोशल मीडिया- फोटो : Samvad

धन्यौड़ा गांव में बोरवेल से निकले निरवैर के शव को एंबुलेंस में ले जाती हुई टीम: सोशल मीडिया- फोटो : Samvad

धन्यौड़ा गांव में बोरवेल से निकले निरवैर के शव को एंबुलेंस में ले जाती हुई टीम: सोशल मीडिया- फोटो : Samvad

धन्यौड़ा गांव में बोरवेल से निकले निरवैर के शव को एंबुलेंस में ले जाती हुई टीम: सोशल मीडिया- फोटो : Samvad