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माया के प्रभाव में आकर मनुष्य अपने असली उद्देश्य को भूल जाता है : कंवर
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दिनोद राधास्वामी आश्रम में आयोजित कार्यक्रम में मौजूद संगत।
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भिवानी। दिनोद धाम स्थित राधास्वामी आश्रम में रविवार को परमसंत हुजूर कंवर साहेब महाराज के सान्निध्य में विशाल सत्संग का आयोजन हुआ। इस अवसर पर महाराज ने कहा कि वही होता है जो परमात्मा चाहता है, मनुष्य के चाहने से कुछ नहीं होता। माया के प्रभाव में मनुष्य अपने वास्तविक उद्देश्य भूल जाता है। उन्होंने बताया कि परमात्मा ने मनुष्य को सभी जीवों में श्रेष्ठ बनाया है।
मन की इच्छाएं और तृष्णाएं कभी समाप्त नहीं होतीं। यदि मनुष्य इनके पीछे भागता रहेगा तो उसे कभी शांति नहीं मिलेगी। दृढ़ विश्वास के बिना प्रेम नहीं होता और प्रेम के बिना भक्ति संभव नहीं है। मनुष्य अपने पूर्व जन्मों के कर्मों का बोझ लेकर आता है। वर्तमान जीवन में भी वह ऐसे कर्म करता है जिससे यह बोझ और बढ़ जाता है।
मनुष्य को विवेक, धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलकर जीवन सार्थक बनाना चाहिए। हालांकि, काल और माया के प्रभाव में आकर मनुष्य अपना वास्तविक उद्देश्य भूल जाता है। जब जीवन में दुख, संकट या विपत्ति आती है तो मनुष्य भक्ति, सेवा और सात्विक जीवन का संकल्प लेता है।
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कर्म और फल का महत्व बताया
समय बीतने के साथ मनुष्य फिर से सांसारिक आकर्षणों में उलझ जाता है। मनुष्य को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसे अपने प्रत्येक कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए, प्रत्येक कार्य धर्म, सत्य और सदाचार के अनुरूप होना चाहिए। मनुष्य को केवल जगत की नहीं बल्कि अपनी आत्मा की गति और परमात्मा से मिलन की चिंता करनी चाहिए।
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मन की इच्छाएं और तृष्णाएं कभी समाप्त नहीं होतीं। यदि मनुष्य इनके पीछे भागता रहेगा तो उसे कभी शांति नहीं मिलेगी। दृढ़ विश्वास के बिना प्रेम नहीं होता और प्रेम के बिना भक्ति संभव नहीं है। मनुष्य अपने पूर्व जन्मों के कर्मों का बोझ लेकर आता है। वर्तमान जीवन में भी वह ऐसे कर्म करता है जिससे यह बोझ और बढ़ जाता है।
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मनुष्य को विवेक, धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलकर जीवन सार्थक बनाना चाहिए। हालांकि, काल और माया के प्रभाव में आकर मनुष्य अपना वास्तविक उद्देश्य भूल जाता है। जब जीवन में दुख, संकट या विपत्ति आती है तो मनुष्य भक्ति, सेवा और सात्विक जीवन का संकल्प लेता है।
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कर्म और फल का महत्व बताया
समय बीतने के साथ मनुष्य फिर से सांसारिक आकर्षणों में उलझ जाता है। मनुष्य को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसे अपने प्रत्येक कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए, प्रत्येक कार्य धर्म, सत्य और सदाचार के अनुरूप होना चाहिए। मनुष्य को केवल जगत की नहीं बल्कि अपनी आत्मा की गति और परमात्मा से मिलन की चिंता करनी चाहिए।