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एनसीआरबी की रिपोर्ट: एक साल में 104 कृषि मजदूरों ने की आत्महत्या, रोजगार और न्यूनतम मजदूरी न मिलने से संकट

आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: Nivedita Updated Mon, 18 May 2026 03:29 PM IST
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सार

2011 की जनगणना के अनुसार हरियाणा में कृषि मजदूरों की संख्या करीब 15 लाख थी। इनमें लगभग 10 लाख पुरुष और करीब 4.75 लाख महिलाएं शामिल थीं। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक कृषि मजदूरों की आत्महत्या के मामलों में महाराष्ट्र सबसे ऊपर है।

NCRB Report 104 Agricultural Labourers Committed Suicide in Year in Haryana
suicide - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

हरियाणा में खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के आंकड़े चिंताजनक हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार 2024 में प्रदेश में 104 कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की। 

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विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र में बढ़ते संकट की ओर इशारा करता है। सामाजिक सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अधिकतर खेतिहर मजदूर पूरी तरह से खेती पर निर्भर हैं। उनके पास न अपनी जमीन होती और न आय का कोई स्थायी साधन।
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2011 की जनगणना के अनुसार हरियाणा में कृषि मजदूरों की संख्या करीब 15 लाख थी। इनमें लगभग 10 लाख पुरुष और करीब 4.75 लाख महिलाएं शामिल थीं। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक कृषि मजदूरों की आत्महत्या के मामलों में महाराष्ट्र सबसे ऊपर है। वहां एक साल में 1555 मजदूरों ने आत्महत्या की। इसके बाद कर्नाटक में 1201, मध्य प्रदेश में 725 और आंध्र प्रदेश में 692 मामले दर्ज किए गए। पड़ोसी राज्य राजस्थान में 285, उत्तर प्रदेश में 122 और पंजाब में केवल छह कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की।

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कर्ज में डूबे और स्थायी रोजगार भी नहीं

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. दारा सिंह और संजीव कुमार के अध्ययन में कृषि मजदूरों की खराब स्थिति सामने आई है। 480 कृषि मजदूरों पर आधारित इस अध्ययन के अनुसार करीब 61 प्रतिशत मजदूरों के पास अपनी जमीन नहीं है। आधे से अधिक परिवारों की मासिक आय करीब पांच हजार रुपये है। अध्ययन में सामने आया कि करीब 56 प्रतिशत मजदूर किसी न किसी प्रकार के कर्ज में डूबे हैं। यह कर्ज मुख्य रूप से इलाज, सामाजिक कार्यक्रमों और पुराने कर्ज को चुकाने के लिए लिया गया।

करीब 20 प्रतिशत मजदूरों पर 25 हजार रुपये तक और कुछ पर एक लाख रुपये से अधिक का कर्ज है। शोध के अनुसार करीब 30 प्रतिशत मजदूर कोई बचत नहीं कर पाते और आधे मजदूर अपनी आय का 70 प्रतिशत हिस्सा केवल बुनियादी जरूरतों पर खर्च कर देते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि मजदूरों को पूरे साल काम नहीं मिलता। मानसून की विफलता और ऑफ-सीजन में लंबे समय तक बेरोजगारी बनी रहती है। कृषि क्षेत्र में मशीनों के बढ़ते उपयोग से मजदूरों की मांग और मजदूरी दोनों प्रभावित हुई हैं। शोधकर्ताओं ने सरकार को वीबी-जीरामजी योजना के प्रभावी क्रियान्वयन, आसान ऋण सुविधा, स्वरोजगार प्रशिक्षण, वैकल्पिक रोजगार और समान काम के लिए समान वेतन सुनिश्चित करने जैसे सुझाव दिए हैं।

काम मिलने की दरकार

किसानों की हालत अच्छी नहीं है। कृषि मजदूरों की हालत तो और ज्यादा दयनीय है। उनका काफी शोषण होता है। उनकी कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। इतनी महंगाई में वे कैसे जीवन यापन करते हैं सोचने की बात है। सरकार ने मनरेगा बंद कर दी है। अब नई योजना में कैसे कृषि मजदूरों को काम मिलता है यह देखने वाली बात होगी। - देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ

कपास बेल्ट में स्थिति खराब

हरियाणा की कपास बेल्ट में सबसे ज्यादा कृषि मजदूर आत्महत्या कर रहे हैं। इन्हें न तो न्यूनतम मजदूरी मिलती है और न पूरे साल काम। इसकी वजह से ये कर्जदार हो जाते हैं और बाद में आत्महत्या कर लेते हैं। हमारी सरकार से मांग है कि इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करे और इनकी न्यूनतम मजदूरी 700 रुपये की जाए और पूरे साल काम दिलवाया जाए। -जगमाल सिंह, प्रधान खेत मजदूर यूनियन हरियाणा

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