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चार दशक की सेवा के बाद भी नियमित न करना, संस्थागत शोषण : हाईकोर्ट
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- तकनीकी वर्गीकरण का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती सरकार
- याची के दावे पर पुन: विचार का हरियाणा सरकार ने दिलाया विश्वास
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने लगभग 40 वर्षों से सफाईकर्मी के रूप में सेवाएं दे रहे कर्मचारी को नियमित न करने के हरियाणा सरकार के रवैये पर कड़ा रुख अपनाते हुए नोटिस जारी किया है। अदालत ने कहा कि बीर सिंह उर्फ भिरा से दशकों तक काम लेने के बावजूद नियमित न करना न केवल संवैधानिक सिद्धांतों के विरुद्ध है बल्कि यह राज्य सरकार की ओर से किए गए संस्थागत शोषण की श्रेणी में आता है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य जिसे एक आदर्श नियोक्ता होना चाहिए, तकनीकी वर्गीकरण का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार ने कोर्ट को विश्वास दिलाया कि अगली सुनवाई तक याची के दावे पर अदालत की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए विचार किया जाएगा और अदालत को सूचित किया जाएगा।
अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि याचिकाकर्ता का सेवा रिकॉर्ड पूरी तरह बेदाग रहा है और उसकी ईमानदारी व कार्यकुशलता पर कभी कोई सवाल नहीं उठा। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता की ओर से किया गया कार्य न तो अस्थायी है और न ही कभी-कभार का बल्कि संस्थान के रोजमर्रा के संचालन के लिए अनिवार्य और स्थायी प्रकृति का है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे कर्मचारी को वर्षों तक अस्थायी बनाए रखना न्याय, समानता और निष्पक्षता की मूल भावना के विपरीत है। कोर्ट ने कहा कि संविधान केवल औपचारिक समानता की गारंटी नहीं देता बल्कि गरिमा, आजीविका और सामाजिक न्याय का वादा करता है।
प्रस्तावना में निहित समाजवादी गणराज्य की अवधारणा तब अर्थहीन हो जाती है जब प्रशासनिक व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर कार्य करने वाले कर्मचारियों को जीवन भर की सेवा के बाद भी सुरक्षा और पहचान से वंचित रखा जाता है। कोर्ट ने कहा कि नाममात्र के लिए चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी कहे जाने के बावजूद याचिकाकर्ता ने ऐसे कार्य किए हैं जो सार्वजनिक संस्थानों के सुचारू संचालन के लिए आधार स्तंभ की तरह हैं। ऐसे श्रम की उपेक्षा करना उस मौन श्रम शक्ति की अनदेखी है जिस पर पूरा तंत्र टिका हुआ है।
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- याची के दावे पर पुन: विचार का हरियाणा सरकार ने दिलाया विश्वास
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने लगभग 40 वर्षों से सफाईकर्मी के रूप में सेवाएं दे रहे कर्मचारी को नियमित न करने के हरियाणा सरकार के रवैये पर कड़ा रुख अपनाते हुए नोटिस जारी किया है। अदालत ने कहा कि बीर सिंह उर्फ भिरा से दशकों तक काम लेने के बावजूद नियमित न करना न केवल संवैधानिक सिद्धांतों के विरुद्ध है बल्कि यह राज्य सरकार की ओर से किए गए संस्थागत शोषण की श्रेणी में आता है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य जिसे एक आदर्श नियोक्ता होना चाहिए, तकनीकी वर्गीकरण का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार ने कोर्ट को विश्वास दिलाया कि अगली सुनवाई तक याची के दावे पर अदालत की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए विचार किया जाएगा और अदालत को सूचित किया जाएगा।
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अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि याचिकाकर्ता का सेवा रिकॉर्ड पूरी तरह बेदाग रहा है और उसकी ईमानदारी व कार्यकुशलता पर कभी कोई सवाल नहीं उठा। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता की ओर से किया गया कार्य न तो अस्थायी है और न ही कभी-कभार का बल्कि संस्थान के रोजमर्रा के संचालन के लिए अनिवार्य और स्थायी प्रकृति का है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे कर्मचारी को वर्षों तक अस्थायी बनाए रखना न्याय, समानता और निष्पक्षता की मूल भावना के विपरीत है। कोर्ट ने कहा कि संविधान केवल औपचारिक समानता की गारंटी नहीं देता बल्कि गरिमा, आजीविका और सामाजिक न्याय का वादा करता है।
प्रस्तावना में निहित समाजवादी गणराज्य की अवधारणा तब अर्थहीन हो जाती है जब प्रशासनिक व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर कार्य करने वाले कर्मचारियों को जीवन भर की सेवा के बाद भी सुरक्षा और पहचान से वंचित रखा जाता है। कोर्ट ने कहा कि नाममात्र के लिए चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी कहे जाने के बावजूद याचिकाकर्ता ने ऐसे कार्य किए हैं जो सार्वजनिक संस्थानों के सुचारू संचालन के लिए आधार स्तंभ की तरह हैं। ऐसे श्रम की उपेक्षा करना उस मौन श्रम शक्ति की अनदेखी है जिस पर पूरा तंत्र टिका हुआ है।