हरियाणा में खाद की किल्लत क्यों: अधिक उत्पादन के लालच में तय मानकों से पांच गुना अधिक तक डीएपी डाल रहे किसान
खपत अधिक हो जाने से पिछले दो साल से हरियाणा में डीएपी की किल्लत सामने आ रही है। धान के बजाय गेहूं के सीजन में डीएपी की खपत हर साल अधिक हो रही है। ठेके पर जमीन लेकर खेती करने वाले अधिक से अधिक उत्पादन लेने के चक्कर में डीएपी का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं।
विस्तार
हरियाणा का किसान फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए डाई अमोनियम फास्फेट (डीएपी) का अधिक प्रयोग करने लगा है। प्रदेश में बीते छह साल में कृषि योग्य भूमि तो लगभग उतनी ही रही लेकिन 90 हजार मीट्रिक टन (एमटी) से अधिक डीएपी की खपत बढ़ गई। वर्ष 2018-19 में 4.70 लाख एमटी डीएपी की खपत हुई थी, जो अब बढ़कर साढ़े पांच लाख एमटी से ज्यादा हो गई है।
आलू के किसान बिगाड़ रहे डीएपी का समीकरण
दरअसल आलू और लहसुन की फसल का रकबा डीएपी खाद की उपलब्धता व मांग का संतुलन बिगाड़ रहा है। तय नियमों के अनुसार, प्रति एकड़ 50 किलो डीएपी पर्याप्त है, लेकिन आलू और लहसुन की फसल में किसान 100 से 250 किलो तक डीएपी डाल रहे हैं। पिछले माह से ही आलू की बिजाई भी चालू है और आलू उत्पादक किसान कई-कई बैग डीएपी खरीद रहे हैं, जिससे खरीद केंद्रों पर डीएपी नहीं मिल रही है। हरियाणा में करीब 50 हजार हेक्येटर में आलू की बिजाई की जाती है। कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक डा. प्रदीप मिल का कहना है कि किसानों को तय मानकों के अनुसार ही खाद का प्रयोग करना चाहिए।
गेहूं-सरसों में डीएपी का अधिक प्रयोग
हरियाणा में हर साल करीब 5 लाख एमटी डीएपी की खपत होती है। सबसे अधिक डीएपी का प्रयोग रबी में होता है। खरीफ में औसतन 2.26 लाख एमटी और रबी में 2.43 लाख एमटी डीएपी की खपत होती है। इसका मतलब ये है कि धान की बजाय किसान गेहूं व सरसों की फसल में डीएपी का अधिक प्रयोग करते हैं।
हरियाणा में है 89 लाख एकड़ कृषि योग्य भूमि
हरियाणा में 89 लाख एकड़ से अधिक कृषि भूमि है और 16 लाख से ज्यादा किसान परिवार हैं। औसतन हरियाणा में 25 लाख हेक्येटर (62 लाख एकड़) में गेहूं की बिजाई की जाती है और 7 लाख हेक्टेयर में सरसों की बिजाई होती है। करीब 13 लाख हेक्टेयर में धान की बिजाई की जाती है। प्रदेश में 96,000 हेक्टेयर में गन्ने की खेती की जा रही है। सब्जी वाली फसलों में आलू समेत अन्य में भी डीएपी का प्रयोग किया जाता है।
इसलिए इस्तेमाल होती है डीएपी खाद
डीएपी प्रभावशाली फास्फेटिक खाद है। इसका प्रयोग पौधों में नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी को पूरा करने के लिए किया जाता है। इस खाद में 18 प्रतिशत नाइट्रोजन और 46 फीसदी फास्फोरस होता है। यह खाद पौधों के पोषक तत्वों के लिए सबसे बढ़िया मानी जाती है। यह पौधों की जड़ों को विकसित करती है। पौधों की कोशिकाओं के विभाजन को भी प्रभावित करती है जिससे पौधों का विकास होता है।
साल डीएपी खपत (लाख एमटी)
2018-19 470327
2019-20 445211
200-21 441777
2021-22 460043
2022-23 558262
2023-24 518334
2024-25 4 लाख से अधिक (अभी तक)
हर साल दस प्रतिशत की हो रही वृद्धि : डॉ. लाठर
डीएपी की अनुशांसित मात्रा 50 किलोग्राम प्रति एकड़ डालने से धान व गेहूं की उपज 30 प्रतिशत तक अधिक होती है। डीएपी की कमी से धान, गेहूं, चना और आलू में एक तिहाई पैदावार पर असर पड़ता है। इसलिए देशभर में डीएपी की खपत में वार्षिक वृद्धि 10 प्रतिशत से अधिक हो रही है। - डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली।
