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Hindi News ›   Haryana ›   Chandigarh-Haryana News ›   The more heinous the crime, the higher the standard of proof; woman acquitted in 24-year-old rape case

Chandigarh-Haryana News: जितना घिनौना अपराध, उतना ऊंचा सबूत का मानदंड, 24 साल पुराने दुष्कर्म मामले में महिला बरी

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- साजिश साबित करने के लिए शक नहीं, ठोस सबूत जरूरी: हाईकोर्ट




- आपराधिक साजिश के मामले में अदालत ने महिला को दिया था दोषी करार


चंडीगढ़। 24 साल पुराने दुष्कर्म के मामले में आपराधिक साजिश के लिए दोषी ठहराई गई एक महिला को बरी करते हुए पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि केवल शक या सीमित भूमिका के आधार पर किसी व्यक्ति को आपराधिक साजिश का दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। इसे साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय प्रमाण जरूरी हैं। न्यायमूर्ति रुपिंद्रजीत चहल ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था का स्थापित सिद्धांत है 'जितना घिनौना अपराध, उतना ऊंचा सबूत का मानदंड।'



कोर्ट ने कहा कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर और विचलित करने वाला क्यों न हो, मात्र संदेह कानूनी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता। हाईकोर्ट ने सन 2002 के मामले में 2004 में ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई महिला की सजा और दोष सिद्धि को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि महिला ने जानबूझकर दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिलाने में सहायता की या उसकी मुख्य आरोपी के साथ पहले से कोई आपराधिक साजिश थी।
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अभियोजन के अनुसार महिला पीड़िता को साथ लेकर एक कमरे तक गई थी और उससे कहा था कि वह अंदर जाकर देखे कि सह आरोपी सुधीर कुमार (अब मृत) कमरे में मौजूद है या नहीं। जैसे ही पीड़िता कमरे में गई, आरोपी ने चाकू दिखाकर उसे धमकाया और उसके साथ दुष्कर्म किया। दुष्कर्म का सीधा आरोप सुधीर कुमार पर था, जबकि महिला को इस आधार पर आरोपी बनाया गया कि उसने कथित तौर पर घटना को संभव बनाने में मदद की और साजिश का हिस्सा थी।
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हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए कहा कि महिला के खिलाफ केवल इतना आरोप था कि वह पीड़िता को कमरे तक लेकर गई और अंदर जाकर देखने के लिए कहा। अदालत ने कहा कि इससे यह साबित नहीं होता कि उसे किसी आपराधिक योजना की जानकारी थी। कोर्ट ने कहा कि घटना के समय महिला की मौजूदगी को लेकर भी कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं है। जिरह के दौरान स्वयं पीड़िता ने स्वीकार किया था कि उसे यह नहीं पता कि महिला कमरे के बाहर खड़ी थी या वहां से जा चुकी थी। कोर्ट ने कहा कि शक कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह सबूत का विकल्प नहीं बन सकता।
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