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मनोज-बबली हत्याकांड: हाईकोर्ट ने पुलिस सिपाही की बर्खास्तगी को रखा बरकरार, दोषी को दी थी दंपती की लोकेशन

अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़ Published by: शाहिल शर्मा Updated Sat, 14 Feb 2026 09:09 AM IST
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सार

अदालत ने कहा कि दंपती की सुरक्षा की जिम्मेदारी होते हुए भी उनकी जानकारी दोषी तक पहुंचाना अत्यंत गंभीर कृत्य है। ऐसे में बर्खास्तगी का आदेश न्यायोचित है।

High Court hearing in Manoj Babli murder case
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अंतरजातीय विवाह करने पर करीब 18 वर्ष पहले मारे गए मनोज-बबली हत्याकांड में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा पुलिस के उस सिपाही की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है, जिस पर दंपती की लोकेशन दोषी तक पहुंचाने का आरोप था। अदालत ने कहा कि इस मामले में हस्तक्षेप से न्याय के हितों को आघात पहुंचेगा।

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जस्टिस जगमोहन बंसल ने जय इंदर की रिट याचिका खारिज करते हुए कहा कि विभागीय जांच और सजा में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता मनोज और बबली की सुरक्षित अभिरक्षा के लिए जिम्मेदार था। उसे उनकी लोकेशन की जानकारी थी, जिसे उसने गुरदेव सिंह को दे दिया। उसका यह कृत्य घोर निंदनीय है।

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सिपाही को दंपती की सुरक्षा के लिए किया था तैनात
 
कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता उस पुलिस टीम का हिस्सा था, जिसे दंपती की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था। उसी दिन थाना प्रभारी जगबीर सिंह ने दंपती को करनाल जाने के लिए हरियाणा रोडवेज बस में बैठने की अनुमति दी थी। इसके बाद उनकी हत्या कर दी गई थी। पुलिस अधिकारियों और दंपती के फोन रिकॉर्ड में नियमित संपर्क सामने आया था। एसएचओ जगबीर सिंह, याचिकाकर्ता और आरोपी गुरदेव सिंह के बीच कॉल डिटेल्स से यह संकेत मिला कि लोकेशन की जानकारी साझा की गई थी।

हरियाणा सरकार ने कहा कि गुरदेव सिंह को हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे मृत्युदंड सुनाया था, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। राज्य ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा लोकेशन लीक करना जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है और बर्खास्तगी उचित है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया गया था। विभागीय जांच में कोई गंभीर त्रुटि या कानूनी खामी नहीं पाई गई। अदालत ने कहा कि दंपती की सुरक्षा की जिम्मेदारी होते हुए भी उनकी जानकारी दोषी तक पहुंचाना अत्यंत गंभीर कृत्य है। ऐसे में बर्खास्तगी का आदेश न्यायोचित है। हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई को सही ठहराते हुए जय इंदर की याचिका खारिज कर दी।
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