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Hisar News: हवेलियां अतीत की पहचान, शहीदों ने बढ़ाया मान, हांसी से 15 किमी दूर बसा गांव पाली का इतिहास 300 साल पुराना
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पाली गांव की पुरानी हवेली।
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अमित रेढू
बास। हांसी से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित पाली गांव करीब 300 साल पुराना है। इस गांव की बसावट लगभग पहले जाट, ब्राह्मण और अनुसूचित जाति के कुछ परिवारों द्वारा हुई थी। धीरे-धीरे अन्य समुदायों के लोग यहां आकर बसते गए और गांव सामाजिक विविधता का प्रतीक बन गया।
गांव के पूर्व सरपंच अमरीक सिंह बताते हैं कि समय के साथ हिंदू और मुसलमान समुदाय भी साथ-साथ रहने लगे और गांव में लंबे समय तक आपसी भाईचारा और सौहार्द का माहौल रहा। आजादी से पहले गांव में विवाद भी सामने आया। कुछ लोगों ने मुस्लिम समाज के लोगों को गांव से निकालने की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह मामला उस समय की लाहौर अदालत तक पहुंचा।
अदालत ने मुसलमानों के पक्ष में फैसला सुनाया और उन्हें गांव में रहने की अनुमति दी। साथ ही सालाना 25 रुपये जमीन का किराया देने की शर्त रखी। इस फैसले के बाद विभाजन तक मुस्मिल समाज के लोग गांव में ही रहे। पाली गांव अपनी वीरता, सामाजिक सौहार्द और ऐतिहासिक घटनाओं के कारण आज भी गौरवशाली अतीत और विकास की नई राह के लिए चर्चा में बना हुआ है।
खेती मुख्य आजीविका, नौकरी बन रही नई पहचान : नहर के किनारे बसे पाली गांव के पास करीब तीन हजार एकड़ से अधिक कृषि योग्य भूमि है। किसान सरसों, गेहूं, धान और कपास की खेती करते हैं। खेती गांव की मुख्य आजीविका है लेकिन अब नई पीढ़ी शिक्षा के माध्यम से सरकारी नौकरियों की ओर भी तेजी से आगे बढ़ रही है। गांव के कई युवा सेना, पुलिस और अन्य सरकारी विभागों में सेवाएं दे रहे हैं। गांव में जलघर की सुविधा उपलब्ध है, जिससे पेयजल की समस्या नहीं है। किसानों की सुविधा के लिए सहकारी बैंक के माध्यम से खाद और ऋण भी उपलब्ध कराया जाता है।
गांव के पूर्व सरपंच अमरीक सिंह को सहकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों के लिए इफको सहकारिता बंधु पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। हरियाणा में पहली बार यह सम्मान पाली गांव के अमरीक सिंह को मिला था। संवाद
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बास। हांसी से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित पाली गांव करीब 300 साल पुराना है। इस गांव की बसावट लगभग पहले जाट, ब्राह्मण और अनुसूचित जाति के कुछ परिवारों द्वारा हुई थी। धीरे-धीरे अन्य समुदायों के लोग यहां आकर बसते गए और गांव सामाजिक विविधता का प्रतीक बन गया।
गांव के पूर्व सरपंच अमरीक सिंह बताते हैं कि समय के साथ हिंदू और मुसलमान समुदाय भी साथ-साथ रहने लगे और गांव में लंबे समय तक आपसी भाईचारा और सौहार्द का माहौल रहा। आजादी से पहले गांव में विवाद भी सामने आया। कुछ लोगों ने मुस्लिम समाज के लोगों को गांव से निकालने की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह मामला उस समय की लाहौर अदालत तक पहुंचा।
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अदालत ने मुसलमानों के पक्ष में फैसला सुनाया और उन्हें गांव में रहने की अनुमति दी। साथ ही सालाना 25 रुपये जमीन का किराया देने की शर्त रखी। इस फैसले के बाद विभाजन तक मुस्मिल समाज के लोग गांव में ही रहे। पाली गांव अपनी वीरता, सामाजिक सौहार्द और ऐतिहासिक घटनाओं के कारण आज भी गौरवशाली अतीत और विकास की नई राह के लिए चर्चा में बना हुआ है।
खेती मुख्य आजीविका, नौकरी बन रही नई पहचान : नहर के किनारे बसे पाली गांव के पास करीब तीन हजार एकड़ से अधिक कृषि योग्य भूमि है। किसान सरसों, गेहूं, धान और कपास की खेती करते हैं। खेती गांव की मुख्य आजीविका है लेकिन अब नई पीढ़ी शिक्षा के माध्यम से सरकारी नौकरियों की ओर भी तेजी से आगे बढ़ रही है। गांव के कई युवा सेना, पुलिस और अन्य सरकारी विभागों में सेवाएं दे रहे हैं। गांव में जलघर की सुविधा उपलब्ध है, जिससे पेयजल की समस्या नहीं है। किसानों की सुविधा के लिए सहकारी बैंक के माध्यम से खाद और ऋण भी उपलब्ध कराया जाता है।
गांव के पूर्व सरपंच अमरीक सिंह को सहकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों के लिए इफको सहकारिता बंधु पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। हरियाणा में पहली बार यह सम्मान पाली गांव के अमरीक सिंह को मिला था। संवाद