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Karnal News: बृहस्पति के पुत्र ऋषि कच्छ की तपोस्थली काछवा बना भाईचारे की मिसाल
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
Updated Fri, 01 May 2026 01:22 AM IST
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गांव काछवा का श्रीकृष्णा मंदिर। संवाद
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। शहर से करीब 13 किलोमीटर दूर स्थित काछवा गांव अपनी समृद्ध विरासत, सौहार्द और सामाजिक एकता के लिए मिसाल बना हुुआ है। देवगुरु बृहस्पति के पुत्र ऋषि कच्छ की तपोस्थली के रूप में प्रसिद्ध यह गांव न केवल ऐतिहासिक महत्व रखता है बल्कि 36 बिरादरी के भाईचारे का बेहतर उदाहरण पेश कर रहा है। बंटवारे से पहले यह गांव मुस्लिम बाहुल्य हुआ करता था लेकिन आज यहां कोई मुस्लिम परिवार नहीं रहता है।
ग्रामीणों ने बताया कि प्राचीन समय में यहां के तालाबों में काफी कछुआ होते थे जिससे गांव का नाम काछवा पड़ा। इतिहासकार इस क्षेत्र का संबंध कछवाहा राजपूत वंश से जोड़ते हैं जिन्होंने 11वीं शताब्दी में राजपुताना समेत कई क्षेत्रों में अपनी सत्ता स्थापित की थी। गांव की सबसे बड़ी खासियत इसकी धार्मिक एकता है। यहां श्रीकृष्ण मंदिर और पीर बाबा शहजमाल की मजार तक जाने का एक ही रास्ता है।
1962 में हुआ था चातुर्मास का आयोजन
करीब 30 हजार की आबादी वाले इस गांव में जैन समाज का भी ऐतिहासिक स्थल रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1930 में जैन समाज के स्थानक का निर्माण शुरू हुआ और 1937 में यह स्थापित हुआ। जैन समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों के अनुसार, वर्ष 1962 में यहां भव्य चातुर्मास का आयोजन हुआ था जिसमें जैन संत चार महीने तक गांव में ठहरे थे। हालांकि वर्तमान में जैन समाज के अधिकांश लोग यहां से पलायन कर चुके हैं लेकिन उनकी आस्था आज भी यहां से जुड़ी हुई है। हर वर्ष वह पीर बाबा शहजमाल की मजार पर माथा टेकने पहुंचते हैं और मनोकामनाएं मांगते हैं। काछवा गांव में गुरुद्वारा सिंह सभा, दो अन्य गुरुद्वारे, दो रविदास मंदिर, एक वाल्मीकि मंदिर, एक शनिदेव मंदिर, एक शिव मंदिर और गोगामेड़ी है। करीब 40 वर्ष पहले निर्मित गुरुद्वारा सिंह सभा सिख संगत की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
ग्रामीणों से बातचीत
पीर शहजमाल में लोगों की गहरी आस्था
काछवा गांव आपसी भाईचारे की मिसाल बना हुआ है। यहां सभी धार्मिक आयोजन होते हैं और इसमें ग्रामीण बढ़चढ़ का सहयोग करते हैं और शामिल भी होते हैं। संतों की स्थली के रूप में भी इस गांव की विशेष पहचान है। जैन समाज के प्रथम तीर्थकर भगवान आदिनाथ और अंतिम महावीर जैन रहे हैं। गांव के लोगों की पीर शहजमाल में भी गहरी आस्था है।
- नाथी राम जैन
हर बिरादरी के लोग चढ़ाते हैं प्रसाद
यहां की पीर की मजार करीब 100 साल पुरानी है। इस पीर शहजमाल में लोगों की गहरी आस्था है, इसी कारण से विदेश व गांव से बाहर रहने वाले लोग यहां आकर मन्नतें मांगते हैं। इस पीर पर हर वीरवार को सभी बिरादरी के लोग यहां आकर प्रसाद चढ़ाते हैं और पीर पर मत्था टेकते हैं। हर साल 2 जनवरी को यहां ग्रामीणों के सहयोग से विशाल भंडारा लगाया जाता है।
- पूर्णचंद, सेवक
ग्रामीणों के सहयोग से होते हैं धार्मिक आयोजन
काछवा में श्रीकृष्ण मंदिर में जन्माष्टमी का त्योहार भव्य तरीके से मनाया जाता है। महाशिवरात्रि पर इस मंदिर से भोलेनाथ की बरात गांव की गलियों से होते हुए प्राचीन शिव मंदिर में जाती है। यहां की कमेटी बरात का स्वागत करती है और ग्रामीणों के सहयोग से भगवान शिव व पार्वती के विवाह की सभी रस्म पूरी की जाती है।
- सुरेंद्र, पूर्व प्रधान श्रीकृष्ण मंदिर
40 साल पहले बनाया गुरुद्वारा बना आस्था का केंद्र
काछवा में सिख समाज की ओर से करीब 40 साल पहले बना गुरुद्वारा सिख सभा सिख संगत की आस्था का केंद्र है। यहां के भव्य गुरुद्वारे में सभी शहीदी दिवस, गुरुपूर्व, बैसाखी और बाबा बुड्डा सिंह का जन्मदिहाड़ा धूमधाम से मनाया जाता है। संतों की बरसी पर भी यहां गुरु का अटूट लंगर बरताया जाता है और सुबह-शाम गुरुघर में पाठ किया जाता है।
- पाठी भाई सरदार लाडविंद्र सिंह
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करनाल। शहर से करीब 13 किलोमीटर दूर स्थित काछवा गांव अपनी समृद्ध विरासत, सौहार्द और सामाजिक एकता के लिए मिसाल बना हुुआ है। देवगुरु बृहस्पति के पुत्र ऋषि कच्छ की तपोस्थली के रूप में प्रसिद्ध यह गांव न केवल ऐतिहासिक महत्व रखता है बल्कि 36 बिरादरी के भाईचारे का बेहतर उदाहरण पेश कर रहा है। बंटवारे से पहले यह गांव मुस्लिम बाहुल्य हुआ करता था लेकिन आज यहां कोई मुस्लिम परिवार नहीं रहता है।
ग्रामीणों ने बताया कि प्राचीन समय में यहां के तालाबों में काफी कछुआ होते थे जिससे गांव का नाम काछवा पड़ा। इतिहासकार इस क्षेत्र का संबंध कछवाहा राजपूत वंश से जोड़ते हैं जिन्होंने 11वीं शताब्दी में राजपुताना समेत कई क्षेत्रों में अपनी सत्ता स्थापित की थी। गांव की सबसे बड़ी खासियत इसकी धार्मिक एकता है। यहां श्रीकृष्ण मंदिर और पीर बाबा शहजमाल की मजार तक जाने का एक ही रास्ता है।
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1962 में हुआ था चातुर्मास का आयोजन
करीब 30 हजार की आबादी वाले इस गांव में जैन समाज का भी ऐतिहासिक स्थल रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1930 में जैन समाज के स्थानक का निर्माण शुरू हुआ और 1937 में यह स्थापित हुआ। जैन समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों के अनुसार, वर्ष 1962 में यहां भव्य चातुर्मास का आयोजन हुआ था जिसमें जैन संत चार महीने तक गांव में ठहरे थे। हालांकि वर्तमान में जैन समाज के अधिकांश लोग यहां से पलायन कर चुके हैं लेकिन उनकी आस्था आज भी यहां से जुड़ी हुई है। हर वर्ष वह पीर बाबा शहजमाल की मजार पर माथा टेकने पहुंचते हैं और मनोकामनाएं मांगते हैं। काछवा गांव में गुरुद्वारा सिंह सभा, दो अन्य गुरुद्वारे, दो रविदास मंदिर, एक वाल्मीकि मंदिर, एक शनिदेव मंदिर, एक शिव मंदिर और गोगामेड़ी है। करीब 40 वर्ष पहले निर्मित गुरुद्वारा सिंह सभा सिख संगत की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
ग्रामीणों से बातचीत
पीर शहजमाल में लोगों की गहरी आस्था
काछवा गांव आपसी भाईचारे की मिसाल बना हुआ है। यहां सभी धार्मिक आयोजन होते हैं और इसमें ग्रामीण बढ़चढ़ का सहयोग करते हैं और शामिल भी होते हैं। संतों की स्थली के रूप में भी इस गांव की विशेष पहचान है। जैन समाज के प्रथम तीर्थकर भगवान आदिनाथ और अंतिम महावीर जैन रहे हैं। गांव के लोगों की पीर शहजमाल में भी गहरी आस्था है।
- नाथी राम जैन
हर बिरादरी के लोग चढ़ाते हैं प्रसाद
यहां की पीर की मजार करीब 100 साल पुरानी है। इस पीर शहजमाल में लोगों की गहरी आस्था है, इसी कारण से विदेश व गांव से बाहर रहने वाले लोग यहां आकर मन्नतें मांगते हैं। इस पीर पर हर वीरवार को सभी बिरादरी के लोग यहां आकर प्रसाद चढ़ाते हैं और पीर पर मत्था टेकते हैं। हर साल 2 जनवरी को यहां ग्रामीणों के सहयोग से विशाल भंडारा लगाया जाता है।
- पूर्णचंद, सेवक
ग्रामीणों के सहयोग से होते हैं धार्मिक आयोजन
काछवा में श्रीकृष्ण मंदिर में जन्माष्टमी का त्योहार भव्य तरीके से मनाया जाता है। महाशिवरात्रि पर इस मंदिर से भोलेनाथ की बरात गांव की गलियों से होते हुए प्राचीन शिव मंदिर में जाती है। यहां की कमेटी बरात का स्वागत करती है और ग्रामीणों के सहयोग से भगवान शिव व पार्वती के विवाह की सभी रस्म पूरी की जाती है।
- सुरेंद्र, पूर्व प्रधान श्रीकृष्ण मंदिर
40 साल पहले बनाया गुरुद्वारा बना आस्था का केंद्र
काछवा में सिख समाज की ओर से करीब 40 साल पहले बना गुरुद्वारा सिख सभा सिख संगत की आस्था का केंद्र है। यहां के भव्य गुरुद्वारे में सभी शहीदी दिवस, गुरुपूर्व, बैसाखी और बाबा बुड्डा सिंह का जन्मदिहाड़ा धूमधाम से मनाया जाता है। संतों की बरसी पर भी यहां गुरु का अटूट लंगर बरताया जाता है और सुबह-शाम गुरुघर में पाठ किया जाता है।
- पाठी भाई सरदार लाडविंद्र सिंह

गांव काछवा का श्रीकृष्णा मंदिर। संवाद
