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Kurukshetra News: बूढ़ी माता के दर्शन को आधी रात को उमड़ी भीड़, गांवों का पारंपरिक त्योहार बासड़े शुरू
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कुरुक्षेत्र। गांव मथाना में आधी रात को बूढ़ी माता की पूजा-अर्चना करने पहुंची महिला श्रद्धालु। स
- फोटो : Samvad
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कुरुक्षेत्र। जिले में शहर से लेकर गांवों तक मान्यता रखने वाला पारंपरिक त्योहार बासड़े रविवार आधी रात को उत्साह और श्रद्धाभाव के साथ शुरू हो गया। महिला श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में एकत्रित होकर गांव की सबसे बड़ी माता यानी बूढ़ी माता के प्रतीक के समक्ष मत्था टेका और अपने बच्चों व आरोग्य के साथ परिवारजनों की सुख-समृद्धि और बेहतर स्वास्थ्य का आशीर्वाद लिया।
पिपली खंड के सबसे बड़े गांव मथाना में रविवार रात 12 बजते ही श्रद्धालु माता के दर्शनों के लिए अपने घरों से निकल पड़े। देखते ही देखते नवनिर्मित भवन में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लग गई। सेवादार संजू और मोहित ने पूजा के दौरान बेहतर व्यवस्था बनाने में सहयोग दिया। रातभर गलियों में पैदल और वाहनों से महिलाओं, पुरुषों और बच्चों की आवाजाही लगी रही।
सोमवार अलसुबह और उसके बाद दिन में भी पूजा-अर्चना की गई। माताओं, दादियों ने बच्चों को साथ लेकर बूढ़ी माता के समक्ष शीश झुकाया और चेचक, फोड़े-फुंसी, त्वचा रोग और विभिन्न प्रकार की मौसमी बीमारियों से बचाए रखने की कामना की। कई बच्चे अपने पिता और भाई के साथ भी पहुंचे। पूजा-अर्चना के दौरान ग्रामीणों ने माता को प्रसन्न करने के लिए दीप जलाकर आराधना की। साथ ही हल्दी, चने, रोटी, चावल, गुलगुले सहित अन्य सामग्री का माता को भोग भी लगाया। तिलक और ज्योत लगाकर माता का जलार्पण किया। हल्दी का तिलक लगा घर के मुख्य द्वार पर सतिया यानी स्वास्तिक बनाकर शुभकामना का संदेश दिया।
परंपरा वर्षों पुरानी, शीतला माता को समर्पित : पंडित ओमप्रकाश
गांव मथाना के पंडित ओमप्रकाश ने बताया कि बूढ़ी माता की आराधना की यह परंपरा वर्षों पुरानी है। यह त्योहार मूल रूप से चैत्र कृष्ण अष्टमी माता शीतला को समर्पित है। बड़ा पर्व 11 मार्च को होगा। इस दौरान माता की आराधना करके एक दिन पहले बना यानी बासी भोजन करने की भी परंपरा है। विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग दिन आराधना की जाती है। इसे कहीं बासड़े तो कहीं बसोड़े भी कहा जाता है। मान्यता है कि बासड़े की पूजा-अर्चना करने से बच्चे स्वस्थ रहते हैं। चमड़ी से संबंधित दिक्कतें दूर रहती हैं।
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पिपली खंड के सबसे बड़े गांव मथाना में रविवार रात 12 बजते ही श्रद्धालु माता के दर्शनों के लिए अपने घरों से निकल पड़े। देखते ही देखते नवनिर्मित भवन में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लग गई। सेवादार संजू और मोहित ने पूजा के दौरान बेहतर व्यवस्था बनाने में सहयोग दिया। रातभर गलियों में पैदल और वाहनों से महिलाओं, पुरुषों और बच्चों की आवाजाही लगी रही।
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सोमवार अलसुबह और उसके बाद दिन में भी पूजा-अर्चना की गई। माताओं, दादियों ने बच्चों को साथ लेकर बूढ़ी माता के समक्ष शीश झुकाया और चेचक, फोड़े-फुंसी, त्वचा रोग और विभिन्न प्रकार की मौसमी बीमारियों से बचाए रखने की कामना की। कई बच्चे अपने पिता और भाई के साथ भी पहुंचे। पूजा-अर्चना के दौरान ग्रामीणों ने माता को प्रसन्न करने के लिए दीप जलाकर आराधना की। साथ ही हल्दी, चने, रोटी, चावल, गुलगुले सहित अन्य सामग्री का माता को भोग भी लगाया। तिलक और ज्योत लगाकर माता का जलार्पण किया। हल्दी का तिलक लगा घर के मुख्य द्वार पर सतिया यानी स्वास्तिक बनाकर शुभकामना का संदेश दिया।
परंपरा वर्षों पुरानी, शीतला माता को समर्पित : पंडित ओमप्रकाश
गांव मथाना के पंडित ओमप्रकाश ने बताया कि बूढ़ी माता की आराधना की यह परंपरा वर्षों पुरानी है। यह त्योहार मूल रूप से चैत्र कृष्ण अष्टमी माता शीतला को समर्पित है। बड़ा पर्व 11 मार्च को होगा। इस दौरान माता की आराधना करके एक दिन पहले बना यानी बासी भोजन करने की भी परंपरा है। विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग दिन आराधना की जाती है। इसे कहीं बासड़े तो कहीं बसोड़े भी कहा जाता है। मान्यता है कि बासड़े की पूजा-अर्चना करने से बच्चे स्वस्थ रहते हैं। चमड़ी से संबंधित दिक्कतें दूर रहती हैं।