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Kurukshetra News: न वो सांग रहे, न वो सांगी... सांग देख पुराने दौर में लौटे बुजुर्ग

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 27 Feb 2026 02:55 AM IST
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Neither the song remains, nor the musician... The elders are transported back to the old times after watching the song.
कुरुक्षेत्र।  राजा नल दमयंती सांग का मंचन करते हुए कलाकार। संवाद
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कुरुक्षेत्र। कला परिषद की भरतमुनि रंगशाला में पांच दिवसीय सांग महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस दौरान वीरवार का दिन भावनाओं और यादों से भरा रहा। मंच पर सांग की प्रस्तुतियों ने लोकसंस्कृति की छटा बिखेरी। उन्हें देखकर बुजुर्ग दर्शकों की पुराने दौर की यादें ताजा हुईं। उन्होंने कहा कि अब न वो सांग रहे और न ही सांगी। कार्यक्रम में धनपत सिंह की ओर से रचित बणदेवी सांग को सांगी सोनू ने और सूरजभान की ओर से रचित सांग राजा नल-दमयंती की प्रस्तुति उस्मान ने दी।
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सांग देखने आए बुजुर्गों ने अपने समय को याद करते हुए कहा कि पहले सांग खुले मैदानों और चौपालों में हुआ करते थे। कई-कई दिन तक सांग चलता था और उसकी गूंज सुनकर लोग अपने घरों से निकल पड़ते थे। आज वही सांग हॉल व सभागार तक सीमित होता जा रहा है जिसके कारण सांग में पहले जैसा प्रभाव कम दिखता है। सांग कार्यक्रम में महिलाओं की उपस्थिति अपेक्षाकृत कम रही। इस पर भी सांगियों ने तंज कसते हुए चिंता व्यक्त की।
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कार्यक्रम में पशुधन विभाग के चेयरमैन धर्मवीर मिर्जापुर ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। उन्होंने कहा कि सांग हरियाणा की संस्कृति का अभिन्न अंग है। यह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि हरियाणा की प्राचीन लोकनाट्य परंपरा का जीवंत स्वरूप है। उन्होंने कहा कि इस विधा को जीवित रखना आवश्यक है, ताकि समाज अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा रहे। इस मौके पर पद्मश्री डाॅ. महावीर गुड्डू, राष्ट्रपति अवार्डी प्रेम देहाती, प्रोफेसर रामनिवास सहरावत, डाॅ. हनीफ खान भी सांग देखने पहुंचे।
तीन-तीन कोस दूर तक सुनाई देती थी आवाज - नन्ना राम
गांव जांबा से आए बुजुर्ग नन्ना राम ने कहा कि आजकल के सांग का पता ही नहीं चलता है कि कहीं आसपास में सांग हो रहा है। पहले के समय में सांग की आवाजें स्पीकर से तीन-तीन कोस दूर तक सुनाई देती थीं और दूर-दराज के लोग भी इन्हीं आवाजों को सुनकर सांग देखने आते थे। आज का सांग उस तरह का नहीं बचा है। बस सांग से लगाव होने के कारण इन्हें देखने आते हैं। कलाकारों को पुराने सांगियों को देखकर उनसे कुछ सीखने की जरूरत है और अपने सांग में उन जैसा रस लाने का प्रयास करें तो आने वाली पीढ़ियों को असली सांग देखने को मिलेंगे। उन्होंने कहा कि पहले कलाकारों की टोलियां संगठित रूप से आती थीं, विशेषकर दांगी समुदाय के कलाकार एक साथ प्रस्तुति देते थे। अब विभिन्न स्थानों से कलाकार मिलकर मिश्रित टोली बना लेते हैं जिससे पारंपरिक स्वरूप प्रभावित हो रहा है।
घंटों चलता था सांग, अब एक घंटे में समाप्त : वीरभान
गांव बेलरखा से आए वीरभान ने बताया कि बणदेवी सांग को बार-बार दोहराया जा रहा है। इसकी शिकायत भी उन्होंने आयोजनकर्ताओं से की। उन्होंने बताया कि पहले सांग कई घंटों तक चलता था। लोग 15 से 20 किलोमीटर दूर से पैदल या अन्य साधनों से पहुंचते थे और रिश्तेदारों के घर ठहरकर कार्यक्रम देखते थे। उन्होंने कहा कि पहले चंदगी और चंदर बेदी के सांग अद्भुत माने जाते थे। आजकल सांगी एक घंटे में सांग खत्म कर देते हैं जिससे न तो कहानी समझ आती है और न ही पहले जैसा देखने में आनंद आता है।

सांग महोत्सव में ये प्रस्तुतियां भी बनीं आकर्षण का केंद्र
सांग महोत्सव में वीरवार को हीरा-मलजमाल सांग की प्रस्तुति सांगी इंद्रसिंह ने दी, गोपीचंद सांग सांगी राजेश कुमार ने प्रस्तुत किया, इन दोनों सांग की रचना धनपत सिंह की ओर से की गई है। इसके अलावा सेठ ताराचंद सांग रतन भारती की ओर से मंचित किया गया, जिसके रचनाकार पंडित जयनारायण हैं।



प्रथम टीम को एक लाख रुपये का दिया जाएगा पुरस्कार : डॉ. नरेंद्र



जनसंपर्क अधिकारी डॉ. नरेंद्र ने बताया कि यह सांग महोत्सव प्रसिद्ध सांगी धनपत सिंह की स्मृति में आयोजित किया जा रहा है। इस सांग की प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पर रहने वाली टीम को मुख्यमंत्री एक लाख रुपये की राशि देकर सम्मानित करेंगे और अन्य सांग महोत्सव में भाग लेने वाली टीमों को 30-30 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी।
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